
मानसून की मार: पूर्वी भारत में बाढ़, इंडोनेशिया में सूखा और आग
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भारी बारिश से बाढ़ के हालात, जबकि इंडोनेशिया के जावा में सूखे ने 42 हेक्टेयर जंगल को जलाकर राख कर दिया और 23,000 से अधिक लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में भारी मानसूनी बारिश ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है, वहीं इंडोनेशिया के मध्य जावा में सूखे की वजह से जंगलों में आग लगने की 37 घटनाओं ने 42 हेक्टेयर भूमि को जलाकर राख कर दिया है। रूस के चेल्याबिंस्क क्षेत्र में भी भीषण बारिश से बाढ़ आ गई है, जिसके चलते 42 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, बंगाल की खाड़ी के ऊपर बने कम दबाव के क्षेत्र के कारण ओडिशा, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में अगले सप्ताह तक व्यापक वर्षा होने की संभावना है। ओडिशा में 21 सेंटीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई, जबकि अरुणाचल प्रदेश, असम और बिहार में भी भारी बारिश हुई। तेलंगाना के 12 जिलों में आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की गई है। दूसरी ओर, उत्तर-पश्चिम, पश्चिम-मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में मानसून की गतिविधियां सामान्य से कम रहने की आशंका है, जिससे असमान वर्षा वितरण की चिंता बढ़ गई है। तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा और तमिलनाडु में लू जैसे हालात बने रहने का अनुमान है।
इंडोनेशिया के मध्य जावा प्रांत में सूखे की वजह से पिछले दो महीनों में 16 जिलों में जंगल की आग की 37 घटनाएं हुईं, जिसमें 42 हेक्टेयर भूमि जल गई। स्थानीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (बीपीबीडी) के अनुसार, आग का मुख्य कारण सूखी पत्तियों और तनों का घर्षण, बीड़ी-सिगरेट के जलते टुकड़े फेंकना और किसानों द्वारा फसल अवशेष जलाना है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (बीएनपीबी) ने बताया कि देश के 13 प्रांतों में सूखे से 23,937 लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें सबसे अधिक प्रभावित पश्चिम जावा और मध्य जावा हैं। बीएनपीबी ने कृत्रिम वर्षा कराने और सूखाग्रस्त इलाकों में बोरवेल खोदने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन बादलों की कमी के कारण कृत्रिम वर्षा का प्रयास सीमित रहा।
रूस के चेल्याबिंस्क क्षेत्र में जून से जारी भारी बारिश ने बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी है। स्थानीय मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, 21 जुलाई के बाद मौसम में सुधार की संभावना है, लेकिन तब तक रुक-रुक कर बारिश जारी रह सकती है। वेरखनी उफाले शहर में 14 भूखंड पानी में डूब गए, जिसके बाद 42 लोगों को निकालकर अस्थायी शिविरों में रखा गया है। रूस के 20 से अधिक क्षेत्रों में अगले दो दिनों तक भारी बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं की चेतावनी जारी की गई है।
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस वर्ष अल नीनो की स्थिति के कारण एशिया के कई हिस्सों में मानसून का वितरण असमान रहा है। भारत में जुलाई में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि इंडोनेशिया में सूखे का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। रूस के यूराल क्षेत्र में निम्न दबाव के कारण असामान्य बारिश हो रही है। सभी प्रभावित देशों में स्थानीय प्रशासन राहत और बचाव कार्यों में जुटे हैं, लेकिन मौसम की अनिश्चितता के कारण स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | +0.10 | neutral |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
L'Indonesia subisce una siccità prolungata e incendi devastanti, mentre le autorità locali corrono ai ripari con misure d'emergenza.
Concentrandosi esclusivamente sui dati locali e sulle dichiarazioni ufficiali, la copertura crea un'impressione di crisi isolata, omettendo il contesto continentale delle piogge torrenziali altrove.
Non menziona le piogge torrenziali in India e Russia, che avrebbero potuto inquadrare la siccità indonesiana come parte di un pattern climatico asimmetrico.
L'India accoglie le piogge monsoniche come un sollievo atteso, con previsioni ufficiali che rassicurano la popolazione.
Trattando le forti piogge come un evento stagionale normale e benefico, la copertura neutralizza la loro potenziale eccezionalità, ignorando il contrasto con le aree colpite da siccità.
Non fa alcun cenno alla siccità e agli incendi in Indonesia, che avrebbero evidenziato la disparità climatica all'interno dell'Asia.
La Russia affronta piogge torrenziali e allagamenti, con i servizi meteorologici che forniscono allerte dettagliate per la gestione dell'emergenza.
Adottando un tono puramente tecnico e citando fonti ufficiali, la copertura presenta le inondazioni come un fenomeno gestibile, senza collegarle al quadro climatico asiatico più ampio.
Non menziona la siccità indonesiana o le piogge indiane, che avrebbero mostrato la divisione climatica dell'Asia.
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