
इज़राइल-लेबनान समझौता: हिज़्बुल्लाह का विरोध, सुरक्षा क्षेत्र पर इज़राइल अडिग
अमेरिकी मध्यस्थता में हस्ताक्षरित समझौते को हिज़्बुल्लाह ने 'अमान्य' बताया, जबकि नेतन्याहू ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि कहा और दक्षिणी लेबनान में सैन्य मौजूदगी बनाए रखने की बात दोहराई।
शुक्रवार को वाशिंगटन में इज़राइल, लेबनान और अमेरिका के बीच एक ढांचा समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसका लक्ष्य दोनों देशों के बीच दशकों से चली आ रही शत्रुता को समाप्त कर शांति की प्रक्रिया शुरू करना है। इसके तहत इज़राइल दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना वापस बुलाएगा, लेकिन यह वापसी पूरी तरह हिज़्बुल्लाह और अन्य गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण पर निर्भर होगी। इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे 'ऐतिहासिक उपलब्धि' बताते हुए कहा कि जब तक हिज़्बुल्लाह निहत्था नहीं होता, तब तक इज़राइली सेना लेबनानी सीमा के पास 10 किलोमीटर के सुरक्षा क्षेत्र में डटी रहेगी। दूसरी ओर, हिज़्बुल्लाह प्रमुख नईम क़ासिम ने समझौते को 'अमान्य' और 'संप्रभुता का समर्पण' करार दिया।
समझौते को लेकर लेबनानी राजनीति में गहरा विभाजन उभर कर सामने आया है। लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ फोन वार्ता में आश्वासन दिया कि राज्य अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेगा और लेबनानी सेना दो 'पायलट जोन' में सुरक्षा की कमान संभालेगी। वहीं, हिज़्बुल्लाह के सांसद हसन फदलल्लाह ने चेतावनी दी कि हथियार न छोड़ने की स्थिति में यह प्रक्रिया गृह युद्ध का कारण बन सकती है। बेरूत में हिज़्बुल्लाह समर्थकों ने समझौते के विरोध में सड़कें जाम कीं और हवाई अड्डे की ओर ले जाने वाले रास्तों पर टायर जलाए, जो समूह की जमीनी स्तर पर अस्थिरता फैलाने की क्षमता को दर्शाता है।
समझौते का क्रियान्वयन बीते अनुभवों के मद्देनज़र बेहद चुनौतीपूर्ण नज़र आता है। वर्ष 2006 के युद्ध के बाद पारित संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 1701 हिज़्बुल्लाह को लितानी नदी के उत्तर रखने में विफल रहा, और समूह ने लगभग दो दशकों तक अपनी सैन्य ताकत फिर से खड़ी कर ली। इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ ने सेना को 'लंबी अवधि तक डटे रहने' के आदेश दिए हैं। हालाँकि, फ्रांस ने कहा है कि वह समझौते के कार्यान्वयन में मदद को तैयार है, और जॉर्डन व संयुक्त अरब अमीरात जैसे क्षेत्रीय देशों ने इसका स्वागत किया है।
वैश्विक कूटनीति के स्तर पर यह समझौता अमेरिका-ईरान के बीच हुए हालिया समझौता ज्ञापन (एमओयू) के साथ विरोधाभास पैदा करता है, जिसमें लेबनान के लिए एक अलग संघर्ष-निवारण तंत्र बनाया गया है और उसमें ईरान को शामिल किया गया है। हिज़्बुल्लाह उसी एमओयू को लागू करने की मांग कर रहा है। फिलहाल, दो परीक्षण क्षेत्रों में लेबनानी सेना की तैनाती और इज़राइल की वापसी पर सभी की निगाहें हैं। यह प्रक्रिया तय करेगी कि क्या बेरूत सरकार हिज़्बुल्लाह को निहत्था करने में सक्षम है, या क्षेत्र में तनाव भड़कने की आशंका बरकरार रहेगी।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| इज़राइली प्रेस | +0.30 | aligned |
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | 0.00 | neutral |
ईरान इसराइली उल्लंघनों की निंदा करता है और सुरक्षा के अपने अधिकार का दावा करता है।
यह समझौते को अवैध ठहराने और इसराइल को आक्रामक के रूप में पेश करने के लिए इसराइली क्षेत्रीय कार्रवाइयों (अपहरण, आगजनी) पर जोर देता है।
हिजबुल्लाह द्वारा निरस्त्रीकरण की अस्वीकृति और संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता भूमिका को छोड़ देता है।
इज़राइल समझौते का समर्थन करता है लेकिन सुरक्षा के लिए स्पष्ट शर्तें निर्धारित करता है।
यह समझौते के महत्व को स्वीकार करता है लेकिन कार्यान्वयन की कठिनाइयों के प्रति आगाह करता है, आशावाद और यथार्थवाद को संतुलित करता है।
समझौते के बाद लेबनान में इज़राइली हवाई हमलों और ईरान द्वारा रिपोर्ट किए गए उल्लंघनों को छोड़ देता है।
यह समझौते को ईरान के डर का उत्पाद बताता है, और इज़राइली हमलों की रिपोर्ट करता है।
यह समझौते को ईरानी खतरे से जोड़ता है, एक भू-राजनीतिक व्याख्या प्रदान करता है जो दोनों पक्षों के कार्यों को उचित ठहराता है।
हिजबुल्लाह द्वारा निरस्त्रीकरण की अस्वीकृति या ईरान द्वारा रिपोर्ट किए गए इज़राइली उल्लंघनों का उल्लेख नहीं करता है।
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