
बांग्लादेश के राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया, संवैधानिक प्रक्रिया शुरू
राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के इस्तीफे के बाद स्पीकर कार्यवाहक राष्ट्रपति बने, 90 दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव अनिवार्य।
बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए संसद अध्यक्ष हफीज उद्दीन अहमद को सौंपे त्यागपत्र में कहा कि ‘ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी’ नामक बीमारी के कारण उन्हें क्षणिक बेहोशी के दौरे पड़ते हैं, जिससे संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन संभव नहीं रहा। संविधान के अनुच्छेद 54 के अनुसार, स्पीकर को कार्यवाहक राष्ट्रपति का दायित्व सौंप दिया गया है, और अगले 90 दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव किया जाएगा।
ढाका में राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, शहाबुद्दीन का इस्तीफा लंबे समय से अपेक्षित था। वे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के निकट सहयोगी माने जाते थे, और 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद भी वे अकेले ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी थे जो पूर्व शासन से जुड़े हुए थे। हसीना की अगुवाई वाली अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और उसके अनेक नेता जेल में हैं या भूमिगत हैं। शेख हसीना के भारत में निर्वासन से स्वदेश लौटने की दिसंबर 2026 की घोषणा के बाद, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर शहाबुद्दीन को हटाने का दबाव बढ़ गया था। गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने पहले कहा था कि सरकार इस्तीफे की योजना से अनभिज्ञ थी, लेकिन अनेक रिपोर्टों में सरकारी असहजता का हवाला दिया गया। स्वयं शहाबुद्दीन ने मीडिया से बातचीत में हसीना से फोन पर संपर्क के आरोपों को नकारा और कहा कि उनका इस्तीफा पूर्णतः चिकित्सकीय परामर्श पर आधारित है।
शहाबुद्दीन का राष्ट्रपति पद मुख्यतः औपचारिक था, लेकिन 2024 की हिंसक छात्र क्रांति के बाद जब शेख हसीना को सत्ता छोड़कर भारत भागना पड़ा, इस पद का राजनीतिक महत्व बढ़ गया था। तत्कालीन अंतरिम सरकार, जिसकी अगुआई नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे थे, ने शहाबुद्दीन पर इस्तीफे का दबाव बनाया था और राजनयिक मिशनों से उनके चित्र हटा दिए गए थे। हालांकि, उन्होंने तब नए चुनाव कराने के संवैधानिक दायित्व का हवाला देते हुए पद पर बने रहने का निर्णय लिया था। फरवरी 2026 में हुए आम चुनावों के पश्चात, अब तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार है।
दक्षिण एशियाई कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शहाबुद्दीन का इस्तीफा हसीना की वापसी की संभावनाओं को और कमजोर करेगा, क्योंकि अब शीर्ष संवैधानिक पदों पर उनका कोई सहयोगी नहीं है। हसीना के खिलाफ युद्धापराध अधिकरण ने मृत्युदंड सुनाया हुआ है, लेकिन भारत ने अभी तक प्रत्यर्पण पर कोई निर्णय नहीं लिया है। संसदीय अध्यक्ष हफीज उद्दीन अहमद, जो स्वयं बीर मुक्तियोद्धा हैं और चिकित्सा के लिए बैंकॉक में थे, तुरंत ढाका लौटकर कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाल चुके हैं। अब संविधान के अनुसार, 90 दिनों के भीतर राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी, जिससे राजनीतिक स्थिरता की परीक्षा होगी।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.50 | critical |
|---|---|---|
| चीनी प्रेस | −0.70 | critical |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
Hasina's regime is now abandoned even by its institutional allies; the president's resignation is proof.
By presenting the resignation as a consequence of progressive political isolation, a causal link is created between the individual act and the fate of the fallen leader.
The reference to the president's health problems, which other outlets cite as official motivation, is omitted.
The president was pushed to resign because he was too close to the old leadership; now Hasina is completely alone.
By attributing the resignation to implicit pressures 'from sources', a climate of political reckoning is insinuated without revealing the real mechanisms.
The president's medical condition and his official statement are omitted, focusing solely on political pressures.
The president leaves for health reasons; the constitutional procedure takes its course.
By emphasizing the medical motivation and the ceremonial nature of the office, the political significance of the resignation is defused, reducing it to an administrative fact.
Any mention of political pressure or rift between the president and the government is omitted.
The president says he is ill and leaves; that's the whole story.
By reporting only the president's statement without context, the news is reduced to a bare fact, avoiding any political interpretation.
The broader political context, Hasina's return, and any reference to pressure are omitted.
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