
वन्नाची का उदय और यूरोपीय दक्षिणपंथ का नया समीकरण: जर्मनी में एएफडी की छलांग, इटली में गठबंधन की बेचैनी
रॉबर्टो वन्नाची का फ्यूचूरो नाज़ियोनाले इटली में साल्विनी की लीगा को पीछे छोड़ रहा है, जबकि जर्मनी में एएफडी ने सीडीयू-सीएसयू पर नौ अंकों की ऐतिहासिक बढ़त बना ली है—दोनों घटनाक्रम पारंपरिक केंद्र-दक्षिणपंथी खेमों को अस्तित्व के संकट में डाल रहे हैं।
इटली के पूर्व पैराशूट जनरल रॉबर्टो वन्नाची का राजनीतिक उभार अब केवल मीडिया की सनसनी नहीं, बल्कि चुनावी गणित को हिला देने वाला झटका बन चुका है। स्वतंत्र सर्वेक्षणों के अनुसार, उनकी पार्टी फ्यूचूरो नाज़ियोनाले ने महज कुछ हफ्तों में 5.3 प्रतिशत मत हासिल कर लीगा को छू लिया है, जो लगातार गिरावट के साथ इसी स्तर पर आ गिरी है। यह आँकड़ा मात्तेओ साल्विनी के लिए विशेष रूप से भयावह है, क्योंकि वन्नाची को राजनीति में उतारने वाले वही थे, लेकिन अब उनका अपना दल पूर्व सहयोगी के हाथों अप्रासंगिकता की ओर धकेला जा रहा है।
इस बदलाव ने इटली के सत्तारूढ़ केंद्र-दक्षिणपंथी गठबंधन के भीतर गहरी दरारें पैदा कर दी हैं। फिनइन्वेस्ट की अध्यक्ष मरीना बेर्लुस्कोनी वन्नाची की पहली राष्ट्रीय सभा में दिखे ‘कैमरेटी’ और ‘गंदगी’ से इतनी क्षुब्ध हैं कि वे जॉर्जिया मेलोनी को पूर्ण आनुपातिक चुनाव प्रणाली अपनाने का सुझाव देने पर विचार कर रही हैं, ताकि फोर्ज़ा इटालिया को वन्नाची के साथ किसी ‘असंभव गठजोड़’ में न बँधना पड़े। दूसरी ओर, वन्नाची स्वयं को ‘सच्चा नेता’ बताते हुए पारंपरिक दलों के समझौतावादी रवैये से दूरी बनाए हुए हैं और अवैध आप्रवासन तथा संप्रभुता जैसे मुद्दों पर कठोर रुख अपना रहे हैं।
जर्मनी से आ रही तस्वीर इस यूरोपीय प्रवृत्ति को और व्यापक बनाती है। यूगॉव के ताज़ा सर्वेक्षण में धुर-दक्षिणपंथी एएफडी 29 प्रतिशत पर पहुँच गई है, जबकि चांसलर फ्रीडरिष मेर्ज़ की सीडीयू-सीएसयू 20 प्रतिशत पर गिरकर अब तक के सबसे बड़े नौ अंकों के अंतर का सामना कर रही है। यह केवल पाँच सप्ताह पहले के छह अंकों के फासले से बड़ा उछाल है, जो मुख्यधारा की कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर को भी चिह्नित करता है। विश्लेषक इसे केवल विरोध की लहर नहीं, बल्कि पारंपरिक दक्षिणपंथी मतदाताओं के कट्टरपंथी विकल्पों की ओर स्थायी पलायन के रूप में देख रहे हैं।
इटली में वामपंथी खेमे की प्रतिक्रिया भी उलझन भरी है। दार्शनिक मास्सिमो काच्चारी ने सार्वजनिक रूप से वन्नाची को ‘बकवास करने वाला’ और ‘बेकार’ करार देते हुए मीडिया से उनका प्रचार बंद करने की अपील की, जबकि पूर्व डेमोक्रेटिक पार्टी नेता स्तेफ़ानो बोनाच्चिनी ने स्वीकार किया कि ‘फासीवाद-विरोध के नारे से दक्षिणपंथ को नहीं हराया जा सकता।’ यह आत्ममंथन इस वास्तविकता से उपजा है कि वन्नाची का आधार उन मतदाताओं से बन रहा है जो कभी स्वयं उनकी आलोचना करते थे—जैसे त्रिएस्ते के नगर पार्षद उगो रिच्ची, जो पहले वन्नाची को ‘हमारी लड़ाइयों का प्रतिनिधि नहीं’ कहते थे, अब उनके आंदोलन का हिस्सा हैं।
यूरोपीय संदर्भ में देखें तो यह घटनाक्रम दक्षिण एशिया के लिए भी संकेत लेकर आता है। भारत जैसे देश, जहाँ गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय दलों का उभार केंद्रीय धारा को लगातार चुनौती देता है, वहाँ इटली और जर्मनी का अनुभव दिखाता है कि कैसे एक करिश्माई बाहरी व्यक्ति पारंपरिक गठबंधनों को तोड़ सकता है और चुनावी समीकरणों को अप्रत्याशित मोड़ दे सकता है। वन्नाची का मामला यह भी रेखांकित करता है कि मीडिया द्वारा किसी हाशिए की आवाज़ को मुख्यधारा में लाने की प्रक्रिया—चाहे वह आलोचना के लिए ही क्यों न हो—अंततः उसी आवाज़ को चुनावी ताकत में बदल सकती है। आने वाले महीनों में यदि जर्मनी में एएफडी की बढ़त कायम रही और इटली में वन्नाची ने लीगा को पीछे छोड़ दिया, तो यूरोपीय केंद्र-दक्षिणपंथ को अपनी रणनीति पर मूलभूत पुनर्विचार करना होगा—और इसकी गूँज ब्रुसेल्स से लेकर नई दिल्ली तक सुनाई देगी।
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