
अमेरिकी दूतों की मास्को यात्रा पर यूरोप की चिंता, ईरान समझौते के बाद खुलेगा रास्ता
यूरोपीय संघ को डर है कि ट्रंप प्रशासन यूक्रेन संकट पर रूस से सीधी बातचीत कर यूरोपीय रणनीति को दरकिनार कर सकता है, जबकि क्रेमलिन ने अमेरिकी वार्ताकारों की मास्को यात्रा को ईरान के साथ होने वाले समझौते से जोड़ दिया है।
यूरोपीय संघ के अधिकारियों में इस बात को लेकर गहरी बेचैनी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीवन विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर जल्द ही मास्को पहुंच सकते हैं। पोलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रसेल्स में यह आशंका व्याप्त है कि ट्रंप प्रशासन यूक्रेन विवाद के समाधान के लिए रूस के साथ सीधी बातचीत का रास्ता अपनाएगा और यूरोपीय सहयोगियों को हाशिये पर रखेगा। यूरोपीय नीति-निर्माता अब तक वाशिंगटन को अपनी रणनीति की ओर झुकाने में जुटे थे, लेकिन ट्रंप के नए सिरे से जगे यूक्रेन हित में यूरोप की भूमिका कमजोर पड़ती दिख रही है।
रूसी पक्ष ने इस यात्रा की संभावना को स्वीकार करते हुए इसे ईरान परमाणु समझौते से जोड़ दिया है। क्रेमलिन के सहायक यूरी उशाकोव और प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने अलग-अलग बयानों में कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच रविवार को हुई फोन वार्ता के बाद यह सहमति बनी कि पहले अमेरिका-ईरान मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर होंगे, जो 19 जून को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित है। उसके बाद ही विटकॉफ और कुशनर के मास्को आने का रास्ता खुलेगा। पेस्कोव ने स्पष्ट किया कि अभी कोई निश्चित तारीख तय नहीं है, क्योंकि अमेरिकी पक्ष ईरान समझौते की तैयारियों में व्यस्त है।
यह कूटनीतिक कड़ी यूक्रेन संघर्ष के समाधान को एक व्यापक भू-राजनीतिक पैकेज का हिस्सा बनाती दिख रही है। ट्रंप ने 15 जून को कहा था कि वह ईरान मसले के स्थिर होने के बाद रूस-यूक्रेन मामले पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। पुतिन और ट्रंप के बीच एंकोरेज में हुई मुलाकात के दौरान बनी सहमति का हवाला देते हुए उशाकोव ने यह भी संकेत दिया कि यूरोपीय दबाव के बावजूद वे समझौतों से पीछे हटने की संभावना नहीं देखते। इससे यूरोपीय नेताओं की चिंता और गहरा गई है कि ट्रंप प्रशासन एक ऐसे समाधान की ओर बढ़ रहा है जिसमें यूरोपीय सुरक्षा ढांचे की भूमिका सीमित होगी।
दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम कई आयाम रखता है। भारत के ईरान के साथ गहरे ऊर्जा और व्यापारिक संबंध हैं, और चाबहार बंदरगाह परियोजना अमेरिकी प्रतिबंधों से अक्सर प्रभावित होती रही है। यदि अमेरिका-ईरान समझौता सफल होता है, तो इससे क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है और भारत को मध्य एशिया से जुड़ने का एक स्थिर गलियारा मिल सकता है। साथ ही, रूस-यूक्रेन वार्ता में प्रगति वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर कर सकती है, जिसका सीधा लाभ भारत जैसे बड़े आयातक को होगा। लेकिन यदि यूरोप को दरकिनार कर कोई सौदा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है, जिसका असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा।
आगे की राह इस बात पर टिकी है कि 19 जून को स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच कितना ठोस समझौता होता है। यदि हस्ताक्षर होते हैं, तो विटकॉफ और कुशनर की मास्को यात्रा यूक्रेन संकट के समाधान की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। यूरोपीय संघ के लिए यह अपनी कूटनीतिक प्रासंगिकता बचाने की आखिरी घड़ी होगी, जबकि भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस त्रिकोणीय खेल के नतीजों पर करीबी नजर रखेंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ
मास्को खुद को अपरिहार्य केंद्र के रूप में पेश करता है: अमेरिकी दूतों की यात्रा ईरान समझौते पर हस्ताक्षर पर निर्भर है, और यूरोप यूक्रेन वार्ता से बाहर होने की संभावना से कांप रहा है।
यूरोपीय राजधानियाँ चेतावनी बजा रही हैं: कुशनर और विटकॉफ को मास्को भेजना संकेत है कि ट्रम्प सहयोगियों को दरकिनार कर यूक्रेन पर बातचीत कर सकते हैं, जिससे द्विपक्षीय बंटवारे का पुराना डर फिर जाग उठा है।
संबंधित लेख
रोनाल्डो का सूखा, कांगो का इतिहास: पुर्तगाल को विश्व कप 2026 में पहला झटका
8 भाषाएँ · 50 स्रोत
Media & Entertainmentलिलो एंड स्टिच और द रिंग की मशहूर अभिनेत्री डेवी चेज़ का 35 वर्ष की आयु में निधन
6 भाषाएँ · 25 स्रोत
खेलविश्व कप 2026: मैच फिक्सिंग, साइबर हमले और फर्जी साख—मैदान के बाहर बढ़ती चुनौतियाँ
7 भाषाएँ · 11 स्रोत