
अमेरिका ने इज़राइल को ईरान समझौते की जानकारी देने से इनकार किया, स्विट्ज़रलैंड में शुक्रवार को हस्ताक्षर
वाशिंगटन और तेहरान के बीच 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर से पहले इज़राइल की जानकारी की मांग ठुकराई गई, जिससे क्षेत्रीय तनाव और संभावित शांति प्रक्रिया पर नई बहस छिड़ गई है।
अमेरिका ने इज़राइल के उस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है जिसमें उसने ईरान के साथ होने वाले समझौता ज्ञापन (एमओयू) का मसौदा देखने की मांग की थी। यह समझौता शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षरित होने की उम्मीद है। इज़राइली चैनल 12 की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन ने तेल अवीव को इस बहुपक्षीय समझौते के विवरण साझा करने से साफ इनकार कर दिया, जिससे इज़राइल अभी भी उन 14 बिंदुओं से अनभिज्ञ है जिन पर सहमति बन चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह समझौते को "शब्द दर शब्द" पढ़ेंगे, लेकिन उन्होंने इसका समय स्पष्ट नहीं किया।
पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुए इस समझौते का उद्देश्य तीन महीने से अधिक समय से जारी सैन्य संघर्ष को स्थायी रूप से रोकना है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसमें दक्षिणी लेबनान से इज़राइली सेना की वापसी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और ईरान के 24 अरब डॉलर के प्रतिबंधित धन को जारी करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। यह समझौता ज्ञापन एक व्यापक ढांचा तैयार करेगा, जिसके तहत 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम समझौते के लिए बातचीत होगी। हालाँकि, अभी तक इसके आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
इज़राइल में इस गोपनीयता से गहरी चिंता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कथित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ तत्काल बैठक की मांग कर रहे हैं। इज़राइली कैबिनेट के कुछ सदस्यों ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता उनके लिए बाध्यकारी नहीं है और उन्होंने लेबनान से सेना न हटाने की बात दोहराई है। दूसरी ओर, ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ़ ने पहले ही समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जबकि अमेरिकी पक्ष से ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस के हस्ताक्षर होने की सूचना है। यह विरोधाभास क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में गहरी दरार को दर्शाता है।
दक्षिण एशिया के लिए यह समझौता महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक हैसियत को मजबूत किया है। वहीं, भारत के लिए यह घटनाक्रम ईरान के साथ उसके ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह संबंधों को प्रभावित कर सकता है, खासकर यदि प्रतिबंधों में ढील दी जाती है। वैश्विक स्तर पर, यदि यह समझौता सफल होता है तो यह पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और परमाणु अप्रसार के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, लेकिन इज़राइल का विरोध और अमेरिकी प्रशासन की गोपनीयता इसे जटिल बनाती है।
आने वाले दिनों में स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर के बाद समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक होने पर स्थिति स्पष्ट होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इज़राइल और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया, तो यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता के बजाय नए तनाव पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, सफल कार्यान्वयन से न केवल युद्धविराम सुनिश्चित होगा, बल्कि ईरान के परमाणु मुद्दे पर व्यापक वार्ता का मार्ग भी खुल सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें शुक्रवार के हस्ताक्षर समारोह पर टिकी हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका ने कथित तौर पर ईरान के साथ समझौता ज्ञापन का पाठ देखने के इज़राइल के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिससे शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर से पहले तेल अवीव विवरणों से अनभिज्ञ है। समझौते की सामग्री के बारे में अटकलों में लेबनान से इज़राइली बलों की वापसी और प्रतिबंधों को हटाना शामिल है, लेकिन कोई आधिकारिक विवरण जारी नहीं किया गया है। अमेरिकी इनकार समझौते के आगे बढ़ने पर इज़राइली मांगों से व्यावहारिक दूरी को रेखांकित करता है।
अमेरिका ने स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर समारोह से पहले इज़राइल को ईरान समझौते तक पहुंच से वंचित कर दिया, एक स्रोत पुष्टि करता है, जिससे यरुशलम में चिंता बढ़ गई है। समझौते में कथित तौर पर दक्षिणी लेबनान से आईडीएफ की वापसी और अरबों डॉलर की जमी हुई ईरानी संपत्तियों को जारी करने के खंड शामिल हैं, फिर भी इज़राइल अनभिज्ञ है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने पाठ को ज़ोर से पढ़ने का वादा किया है, लेकिन पारदर्शिता की कमी संभावित सुरक्षा प्रभावों पर आक्रोश को बढ़ावा देती है।
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