
संयुक्त राष्ट्र का वित्तीय संकट टला नहीं, सूडान और गाजा में मानवीय चुनौतियाँ बरकरार
बकाया भुगतान न करने वाले देशों को रिफंड रोकने के नियम बदलाव से संयुक्त राष्ट्र ने तत्कालिक संकट टाला, लेकिन फिलिस्तीनी शरणार्थी एजेंसी और सूडान में मानवीय अभियानों पर दबाव बरकरार है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंगलवार को एक नियम परिवर्तन को मंजूरी दी जिसके तहत अब वह उन सदस्य देशों को वर्ष के अंत में अव्ययित धनराशि वापस नहीं करेगी जो अपना निर्धारित योगदान नहीं चुका रहे। यह कदम संगठन के 'वित्तीय पतन' की चेतावनियों के बीच उठाया गया, क्योंकि अगस्त-सितंबर तक इसके पास नकदी समाप्त होने की आशंका थी। संयुक्त राष्ट्र के बजट अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका पर लगभग 4.3 अरब डॉलर और चीन पर 1.3 अरब डॉलर का बकाया है, जो कुल बजट का 42 प्रतिशत है। पश्चिमी राजनयिक सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख रखता है, जबकि चीन भुगतान में विलंब को संस्था के भीतर अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के दबाव के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। नए नियम से अगले चार वर्षों तक सालाना करोड़ों डॉलर की बचत होगी, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
इस वित्तीय दबाव का सीधा असर फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करने वाली यूएन एजेंसी यूएनआरडब्ल्यूए पर पड़ा है। महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने दाता देशों के एक सम्मेलन में चेताया कि एजेंसी 10 करोड़ डॉलर की कमी के कारण 'पतन के कगार' पर है और लाखों लोगों की आजीविका खतरे में है। उन्होंने कहा कि एजेंसी को 'दुष्प्रचार अभियानों, विधायी कार्रवाइयों और परिचालन प्रतिबंधों' के जरिये कमजोर करने के लगातार प्रयास हो रहे हैं। इज़राइल लंबे समय से यूएनआरडब्ल्यूए का विरोध करता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के हमले में एजेंसी के कुछ कर्मचारियों की संलिप्तता के आरोप लगाए हैं। एजेंसी गाजा, पश्चिमी तट, लेबनान, जॉर्डन और सीरिया में 26 लाख फिलिस्तीनियों को स्वास्थ्य, शिक्षा और राहत सेवाएं देती है।
सूडान में तीन साल से जारी गृह युद्ध ने मानवीय संकट को और गहरा कर दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक नई रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) ने 2024-25 के दौरान अल-फशीर शहर पर कब्जे के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध और जातीय सफाए को अंजाम दिया। रिपोर्ट के अनुसार, आरएसएफ ने गैर-अरब समुदायों, विशेषकर जघावा जातीय समूह को निशाना बनाकर हत्या, बलात्कार, यौन दासता और बच्चों की जबरन भर्ती जैसे अपराध किए। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने उत्तरी कोर्दोफान के अल-ओबेद में 5 लाख नागरिकों पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए तत्काल बैठक बुलाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि युद्धग्रस्त इलाकों में हैजा के नए प्रकोप से 120 लोगों की मौत हो चुकी है और 1,100 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जबकि 40 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह बंद हैं।
पश्चिमी देशों के एक समूह (जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड, नॉर्वे, ब्रिटेन) ने मानवाधिकार परिषद में एक प्रस्ताव पेश करने की योजना बनाई है। एमनेस्टी ने तत्काल युद्धविराम और नागरिकों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय बल की तैनाती की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय सीमाएं सूडान और गाजा दोनों जगह सहायता अभियानों को बाधित कर रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सूडान में युद्ध अर्थव्यवस्था सोने की तस्करी और ईरान जैसे बाहरी सहयोगियों से ड्रोन आपूर्ति के सहारे चल रही है, जिससे संघर्ष लंबा खिंच रहा है। फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र का वित्तीय ढांचा अस्थायी राहत पर टिका है और सदस्य देशों के बकाया भुगतान पर निर्भर है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.50 | critical |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | −0.40 | critical |
Gaza patients wait in vain for medical evacuation while the system stalls.
By telling the personal story of a mother who died waiting, empathy is generated and responsibility is shifted onto the bureaucratic system, without explicitly naming UN funding cuts.
The piece does not link the delays to UN funding shortfalls, focusing instead on Israeli bureaucracy and local difficulties.
Israeli forces continue to strike civilians in Gaza, killing women and children.
The use of precise casualty numbers and details of attacks on displacement tents creates a picture of systematic violence, attributing the crisis solely to Israeli actions.
It does not mention the role of the UN funding freeze, attributing the crisis exclusively to Israeli military actions.
The withdrawal of Mali, Burkina Faso and Niger from the International Criminal Court undermines global justice.
By framing the decision as an act of 'imperialism' from the countries, but then counterposing the ICC's position as a defender of justice, a dichotomy is created that marginalises the African countries' reasons.
It does not link the African countries' withdrawal from the ICC to the UN financial crisis, treating them as separate issues and not exploring possible synergies between disengagement and funding cuts.
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