
अमेरिका-ईरान समझौते और फेड की नई नीति के बीच सोने की चमक बरकरार
युद्धविराम और तेल आपूर्ति बहाली की उम्मीदों से मुद्रास्फीति का दबाव घटा, जिससे सोने की कीमतों को सहारा मिला, लेकिन फेड के नए अध्यक्ष का पहला निर्णय बाजार की दिशा तय करेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक सोने के बाजार को एक नई लय दे दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस संकेत के बाद कि होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द ही खुल सकता है और ईरानी तेल की बिक्री फिर शुरू होगी, कच्चे तेल की कीमतें तीन महीने के निचले स्तर पर आ गईं। इससे मुद्रास्फीति की आशंका कम हुई और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की संभावना घट गई। नतीजतन, सोने की कीमतों को सहारा मिला और हाल के दिनों में आई गिरावट से उबरकर यह कीमती धातु स्थिरता की ओर लौट आई।
वैश्विक हाजिर बाजार में सोना बुधवार को 4,340 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा था, जो सप्ताह के उच्चतम स्तर के करीब है। दुबई के सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोना 521.25 दिरहम प्रति ग्राम पर स्थिर रहा, जबकि 22 कैरेट 482.50 दिरहम पर बना रहा। हालांकि जून के शुरू में 24 कैरेट 492.50 दिरहम तक लुढ़क गया था, लेकिन इसके बाद से कीमतों ने मजबूत वापसी की है। भारतीय बाजारों में भी इसी प्रवृत्ति का असर दिखा, जहां केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी ने पीली धातु को निचले स्तरों पर सहारा दिया।
निवेशकों की निगाहें अब फेडरल रिजर्व की नीतिगत बैठक पर टिकी हैं, जो नए अध्यक्ष केविन वॉर्श के नेतृत्व में पहली बैठक है। व्यापक रूप से उम्मीद है कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन आगे की मौद्रिक नीति के संकेत सोने की दिशा तय करेंगे। यदि फेड मुद्रास्फीति में नरमी और आर्थिक अनिश्चितता का हवाला देकर दरों को स्थिर रखने का रुख अपनाता है, तो सोने के लिए माहौल और अनुकूल हो सकता है।
भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए यह घटनाक्रम दोहरा महत्व रखता है। तेल की कीमतों में गिरावट से आयात बिल घटेगा और चालू खाते का घाटा कम होगा, जिससे रुपये को मजबूती मिल सकती है। वहीं, सोने की स्थिर कीमतें त्योहारी सीजन से पहले मांग को बनाए रख सकती हैं। हालांकि, विश्लेषक मानते हैं कि यदि ईरानी तेल की आपूर्ति वास्तव में बहाल होती है और भू-राजनीतिक तनाव कम होता है, तो सोने की सुरक्षित निवेश की अपील कुछ फीकी पड़ सकती है।
आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी है। समझौते का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है और अमेरिकी सहयोगी देश ऊर्जा प्रवाह फिर शुरू होने की गति को लेकर कम आशावादी हैं। ऐसे में सोना न तो तेजी से ऊपर जाएगा और न ही नीचे गिरेगा, बल्कि फेड के संकेतों और भू-राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक संतुलित दायरे में कारोबार करता रहेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते ने सोने में जबरदस्त तेजी और तेल की कीमतों में भारी गिरावट को जन्म दिया है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति की चिंताएँ कम हुई हैं। बाजार अब केंद्रीय बैंकों के आगामी निर्णयों पर नज़र रख रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि सस्ती ऊर्जा और कम भू-राजनीतिक जोखिम ब्याज दरों में बढ़ोतरी को नरम करेंगे।
अमेरिका-ईरान समझौते के पूर्ण विवरण की प्रतीक्षा में निवेशकों के साथ, प्रारंभिक उछाल के बाद सोने की कीमतें स्थिर हो गईं। हालांकि आशावाद है कि यह समझौता मुद्रास्फीति और ब्याज दर के दबाव को कम कर सकता है, लेकिन हस्ताक्षर समारोह और ठोस शर्तों के सार्वजनिक होने तक सावधानी हावी है।
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