
सड़कों पर कम हुई हिंसा, घरों में बढ़ा सन्नाटा: ब्राज़ील का विरोधाभासी अंधेरा
2025 में सड़कों पर हत्याएं ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर आ गईं, लेकिन पुलिस मुठभेड़, स्त्री-हत्या और बाल दुर्व्यवहार ने नए रिकॉर्ड बनाए।
रियो डी जेनेरियो के पेन्हा कॉम्प्लेक्स की तंग गलियों में 29 अक्टूबर 2025 की दोपहर गोलियों की गूंज घंटों थमी नहीं। जब धुआं छंटा तो 122 शव बिखरे पड़े थे—117 पुलिस की गोलियों से मारे गए, 5 वर्दीधारी भी। ‘ऑपरेशन कंटेन्शन’ नाम का यह अभियान ब्राज़ील के इतिहास की सबसे ख़ूनी पुलिस कार्रवाई बन गया, कारंदिरू कांड से भी आगे। नशीली दवाओं के ख़िलाफ़ छेड़ी यह लड़ाई अपने पीछे गोलियों से भारी ख़ामोशी छोड़ गई।
यह ख़ूनी मंज़र ब्राज़ीलियाई सार्वजनिक सुरक्षा मंच (FBSP) द्वारा जारी 20वीं वार्षिक रिपोर्ट का सिर्फ़ एक पन्ना था। रिपोर्ट ने एक गहरा विरोधाभास उजागर किया: 2025 में देश की सड़कों पर हिंसक मौतें 8.2% घटकर 40,775 पर आ गईं, जो 2012 के बाद का न्यूनतम स्तर है। मगर घरों की चहारदीवारी के भीतर एक शांत, कहीं ज़्यादा अंतरंग हिंसा पनप रही थी। बाल दुर्व्यवहार के मामले 14.6% बढ़कर 38,986 हो गए, 2021 की तुलना में दोगुने से भी अधिक। स्त्री-हत्या (फेमिनिसाइड) के मामले 4% बढ़कर रिकॉर्ड 1,571 पर पहुंच गए, जबकि महिलाओं की समग्र हिंसक मौतें घट रही थीं। पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की संख्या भी नए शिखर पर पहुंची: 6,602 मौतें, पिछले वर्ष से 5.4% अधिक।
एक शोधकर्ता की टिप्पणी इस माहौल को समेट सकती है, ‘डामर पर हर कदम आगे बढ़ाने पर हम बंद दरवाज़ों के पीछे दो कदम पीछे खिसक गए।’ FBSP की कार्यकारी निदेशक समीरा बुएनो के अनुसार बाल दुर्व्यवहार की बढ़ती रिपोर्टों में कुछ योगदान समाज की उस बदलती सोच का भी है जो ऐसे अपराधों को सहन नहीं करती और शिक्षक-पड़ोसी अब चुप नहीं रहते। लेकिन यूनिसेफ़ की लुइज़ा टेक्सेरा आगाह करती हैं कि ब्राज़ील बच्चों के लिए बेहद ख़तरनाक बना हुआ है और उनका अपना घर ही सबसे असुरक्षित जगह है। ‘मारकर सुधारने’ की सांस्कृतिक स्वीकार्यता आज भी मौजूद है, और यह माता-पिता के तनाव और आर्थिक विषमताओं से गुँथी हुई है। दूसरी ओर, ऑनलाइन ‘मैकोस्फियर’ और ‘फेमोस्फियर’—विषैले डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र—पुरुषत्व और स्त्रीत्व के आधारभूत खाँचों का व्यापार कर रहे हैं, नियंत्रण और आर्थिक निर्भरता को हवा देकर चरम स्थिति में स्त्री-हत्या तक पहुँचा रहे हैं।
इन स्याह परछाइयों के बीच अपराध के स्वरूप में एक अजीब परिवर्तन दिखा। सड़क पर डकैती का ख़ौफ़ एक शांत ख़तरे में बदल रहा था: बिना झड़प के मोबाइल फ़ोन चोरी। इतिहास में पहली बार ‘फ़ुर्तो’ (बिना हिंसा के चोरी) के मामले ‘रूबो’ (धमकी या मारपीट के साथ लूट) से ज़्यादा हो गए। किसी अनमने हाथ से डिवाइस ग़ायब हुआ, भीड़ में किसी की जेब साफ़ हुई—हर घंटे औसतन 95 फ़ोन उड़ाए गए। वित्तीय लेन-देन का डिजिटलीकरण फ़ोन को सोने की खान बना चुका था और अपराधियों ने विनीत, जोखिम-रहित चोरी को अपना लिया। अकेला साओ पाउलो शहर ही ऐसे सभी अपराधों का 20% समेटे हुआ था।
साल के आँकड़ों ने एक ऐसे समाज की तस्वीर खींची जहाँ हिंसा पलायन कर रही थी: सार्वजनिक से निजी की ओर, भौतिक से डिजिटल की ओर। पेन्हा की गोलियाँ थम चुकी थीं, पर आँकड़े बैठकों, फ़ोन स्क्रीनों और राज्य द्वारा जानलेवा बल के धीमे सामान्यीकरण की और कहानियाँ सुना रहे थे। एक छवि ठहर जाती है: एक बच्चे की वह ड्रॉइंग, जो उसने स्कूल में शिक्षक को दी, एक ऐसे घर की पहली गवाही बनी जो बाहर से बिल्कुल आम नज़र आता था। ब्राज़ील के ख़ामोश कोनों में चीख़ें अभी सुनी जाने लगी थीं।
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