
गोली, गोली और गोलियाँ: निर्भरता की तीन कहानियाँ जो दुनिया को झकझोर रही हैं
कुमिल्ला की सड़क से लेकर अकरा के दवाखानों और ढाका की परामर्श सभाओं तक, एक ही सवाल गूँज रहा है—क्या हम अपनी सुरक्षा और सेहत की डोर दूसरों के हाथ में छोड़ चुके हैं?
कुमिल्ला नगर के टाउन हॉल गेट के सामने हाथों में प्लेकार्ड लिए खड़ी भीड़ में एक नाम बार-बार गूँज रहा था—इथान अहमद। छठी कक्षा का यह छात्र कुछ दिन पहले मादक पदार्थों के कारोबार और आधिपत्य को लेकर हुई झड़प में गोली का शिकार हो गया था। अंतरराष्ट्रीय मादक द्रव्य निरोधक दिवस पर आयोजित इस मानवबंधन में खड़े लोग ‘মादককে না বলো’ और ‘নেশা ছাড়ো, দেশ গড়ো’ जैसे नारों के साथ एक साथ दो युद्धों की बात कर रहे थे—एक नशे के खिलाफ, और दूसरा उस खामोश निर्भरता के खिलाफ जो पूरे समाज को अंदर से खोखला कर रही है।
यह निर्भरता सिर्फ नशे की गोलियों तक सीमित नहीं है। पश्चिम अफ्रीका के घाना में इसी सप्ताह एक दूसरे ही किस्म की आयातित गोली ने राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस छेड़ दी। कुमासी के मनहिया पैलेस में फार्मास्युटिकल सोसाइटी ऑफ घाना के 90वें स्थापना दिवस पर सोसाइटी के अध्यक्ष फार्म. पॉल ओवसु डोंकोर ने चेतावनी दी कि देश की 70 प्रतिशत दवाएँ आयातित हैं, और यह निर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बन चुकी है। उन्होंने कहा, “अगर हम अपनी दवाओं के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर रहे, तो हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं।” स्थानीय उत्पादन को 70 प्रतिशत तक ले जाने की उनकी पुकार केवल आर्थिक नीति नहीं थी; वह एक ऐसे देश की सामूहिक चिंता थी जो नकली दवाओं और रोगाणुरोधी प्रतिरोध से जूझ रहा है, और जहाँ ग्रामीण इलाकों में दवाओं की जगह झोलाछाप विक्रेता भरते हैं।
इसी सुर में सुर मिलाती हुई एक आवाज़ ढाका के धानमंडी स्थित एक सभागार से आई, जहाँ प्रथम आलो ट्रस्ट की 168वीं मादक-विरोधी परामर्श सभा में मनोचिकित्सक डॉ. फरज़ाना रहमान ने एक और निर्भरता की ओर इशारा किया—डिजिटल लत और तुलनात्मक मानसिकता। उन्होंने कहा कि बच्चे पल भर में दूर देश के माता-पिता के व्यवहार को देखकर अपने जीवन से अदृश्य तुलना शुरू कर देते हैं, और यहीं से मन खराब होने का सिलसिला शुरू होता है। यह नशा नसों में नहीं, स्क्रीन पर उतरता है, लेकिन बच्चों के सामान्य विकास को उसी तरह बाधित करता है जैसे कोई रासायनिक पदार्थ।
इन तीनों छवियों के समानांतर, अफ्रीकी कारोबारी गलियारों में एक और बहस चल रही है—सूचना प्रौद्योगिकी उपकरणों की निर्भरता पर। दक्षिण अफ्रीका स्थित क्यूरेंट जैसी कंपनियाँ अब नए हार्डवेयर खरीदने के बजाय पुराने उपकरणों के पुनर्चक्रण और जीवन-चक्र प्रबंधन को व्यावसायिक अनिवार्यता बता रही हैं। उनका तर्क है कि यह केवल पर्यावरणीय मजबूरी नहीं, बल्कि मुद्रा अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला के झटकों से बचने का व्यावहारिक रास्ता है। यहाँ भी सवाल वही है—क्या हम बाहरी चीज़ों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं?
कुमिल्ला के मानवबंधन में शामिल एक वक्ता ने कहा था, “সরকার পরিবর্তन হয়, किन्तु मादक सेवन ও मादक व्यवसायের কোনো পরিবর্তन আসে না।” यह वाक्य सिर्फ बांग्लादेश के लिए नहीं था। घाना की फार्मेसी सोसाइटी भी यही कह रही थी कि नियामक संस्थाएँ चाहें तो नकली दवाओं की आपूर्ति रोक सकती हैं, और ढाका की परामर्शदाता भी यही कह रही थीं कि माता-पिता चाहें तो बच्चों को स्क्रीन से दूर रख सकते हैं। निर्भरता के ये तीनों चेहरे—रासायनिक, औषधीय और डिजिटल—एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं की नहीं, आपूर्ति श्रृंखलाओं, आदतों और सोच की भी है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ
आयातित दवाओं पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए स्थानीय उत्पादन को 70% तक बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है। युवाओं में मादक पदार्थों का सेवन सामाजिक कमजोरी को और बढ़ाता है।
नशाखोरी एक सामाजिक और राजकीय बीमारी है जिसके खिलाफ युद्ध घोषित करने की जरूरत है। डिजिटल लत बच्चों के स्वस्थ विकास में बाधा डालती है। केवल सामूहिक प्रयास और सांस्कृतिक आंदोलन ही समाज को मुक्त कर सकते हैं।
अपना नज़रिया बढ़ाएँ
यूक्रेनी ड्रोन हमलों से रूस में ईंधन संकट, पुतिन ने पहली बार स्वीकारी कमी
12 भाषाएँ · 37 स्रोत
Economy & Markets सेअमेरिका-ईरान तनाव के बीच कच्चे तेल में उछाल, होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति जोखिम बरकरार
6 भाषाएँ · 15 स्रोत
Technology सेवेनेज़ुएला भूकंप में गूगल के एंड्रॉइड अलर्ट सिस्टम ने 1.14 करोड़ लोगों को सेकंडों पहले चेताया, पर डेटा प्राइवेसी पर सवाल उठे
4 भाषाएँ · 6 स्रोत