
जीवनशैली में बदलाव से रोकी जा सकती हैं आधी बीमारियाँ, लेकिन आदतें बदलना बड़ी चुनौती
वैश्विक अध्ययन बताते हैं कि भोजन और दिनचर्या में बदलाव से मनोभ्रंश, गुर्दे की बीमारी और हृदय रोग का ख़तरा काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है, फिर भी जागरूकता अभियान व्यवहार परिवर्तन में विफल साबित हो रहे हैं।
द लैंसेट हेल्दी लॉन्गएविटी और क्लिनिकल न्यूट्रिशन में प्रकाशित दो अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, दुनिया भर में मनोभ्रंश के लगभग 45 प्रतिशत मामलों को जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों में सुधार कर टाला जा सकता है। इनमें शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, सामाजिक अलगाव और मोटापा शामिल हैं। लेकिन आठ देशों में चले सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों की समीक्षा से पता चला कि केवल जानकारी देने से स्थायी व्यवहार परिवर्तन नहीं होता। ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि समय, लागत और प्रेरणा की कमी जैसी बाधाएँ लोगों को ठोस कदम उठाने से रोकती हैं।
इस अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिक अब आहार और सूजन के बीच गहरे संबंधों पर ध्यान दे रहे हैं। स्वीडन के ओरेब्रो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट ब्रूमर बताते हैं कि आंत का स्वास्थ्य सीधे मस्तिष्क में सेरोटोनिन जैसे खुशहाली वाले रसायनों को प्रभावित करता है, और शरीर में सूजन इस प्रक्रिया को बाधित करती है। इसी तरह, चीन के दक्षिणी चिकित्सा विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में 1,79,508 प्रतिभागियों के 12 वर्षों के आँकड़ों से पता चला कि ईएटी-लैंसेट ग्रहीय आहार – जो फल, सब्ज़ियाँ, साबुत अनाज और दालों पर ज़ोर देता है – गुर्दे की पुरानी बीमारी के जोखिम को कम करता है, और इसका 20 प्रतिशत सुरक्षात्मक प्रभाव सूजन में कमी से जुड़ा है।
क्षेत्रीय स्तर पर ये निष्कर्ष अलग-अलग बीमारियों पर लागू होते दिख रहे हैं। अर्जेंटीना में हृदय रोग विशेषज्ञ जॉर्ज टार्टाग्लियोन ने बताया कि हर तीन में से एक अर्जेंटीनी को फैटी लिवर है, जो अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ता है और दिल के दौरे का ख़तरा बढ़ाता है; इसके लिए भूमध्यसागरीय आहार और उच्च फ्रक्टोज़ कॉर्न सिरप से परहेज़ की सलाह दी गई। ब्राज़ील में नेफ़्रोलॉजिस्ट पैट्रीशिया गोल्डनस्टीन ने कहा कि 7 से 10 प्रतिशत वयस्क गुर्दे की बीमारी से ग्रस्त हैं, जिसमें पादप-आधारित आहार सूजनरोधी और प्रतिऑक्सीकारक प्रभावों से बचाव करता है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में, जहाँ मधुमेह और हृदय रोग का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है, पारंपरिक दाल-चावल और मौसमी सब्ज़ियों वाला भोजन इन वैश्विक सिफ़ारिशों से मेल खाता है, लेकिन प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता चलन चिंता का विषय है।
दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के एक पशु अध्ययन (चूहों पर) ने संकेत दिया कि केवल कैलोरी की मात्रा नहीं, बल्कि प्रोटीन का स्रोत और मेथियोनीन जैसे अमीनो एसिड की मात्रा दीर्घायु निर्धारित करती है। पादप-आधारित और मछली युक्त आहार पर रहने वाले चूहों ने समान कैलोरी खाने के बावजूद कम वसा और बेहतर मांसपेशी द्रव्यमान बनाए रखा। 2,00,000 से अधिक लोगों के आँकड़ों ने भी इसकी पुष्टि की कि अधिक पशु प्रोटीन लेने वालों में मोटापा और टाइप-2 मधुमेह का ख़तरा दोगुना तक था।
विशेषज्ञ अब व्यक्तिगत जोखिम आकलन और स्थानीय सहायता प्रणालियों पर ज़ोर दे रहे हैं। इंडोनेशिया में पोषण विशेषज्ञों ने बताया कि रात के खाने के बाद बिना चीनी की हरी चाय कोलेस्ट्रॉल चयापचय में मदद कर सकती है, लेकिन यह अकेली आदत बड़ा अंतर नहीं लाएगी। अगला ठोस कदम ऐसे हस्तक्षेपों का परीक्षण है जो जानकारी को व्यावहारिक सहायता से जोड़ते हैं – जैसे सामुदायिक पोषण कार्यक्रम और चिकित्सकीय निगरानी वाली जीवनशैली सलाह – ताकि यह देखा जा सके कि क्या ये आदतों में स्थायी बदलाव ला सकते हैं।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | +0.70 | aligned |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | 0.00 | neutral |
Russia projects its actions as defensive and legitimate, while accusing Ukraine of aggression and terrorism.
By repeating Ukrainian attacks and downplaying its own losses, a victim narrative is constructed that justifies military escalation.
Europe universalizes the event as an episode of conflict, without taking a clear stance, but highlighting the novelty of the attack.
The use of unverified sources and data creates an aura of objectivity, while the choice of neutral headlines masks subtle attention to escalation.
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