
वर्साय की सोने की चमक में मैक्रों ने ट्रंप को मनाया, विरोधियों ने कहा- 'चापलूसी'
जी7 शिखर सम्मेलन के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने ऐतिहासिक वर्साय महल में भव्य रात्रिभोज से अमेरिकी राष्ट्रपति को रिझाने की कोशिश की, जिसे यूरोपीय संघ के भीतर ही आलोचना का सामना करना पड़ा।
फ्रांस के एवियां में संपन्न जी7 शिखर सम्मेलन का सबसे चर्चित क्षण नीतिगत घोषणाएं नहीं, बल्कि वर्साय के महल में आयोजित एक आलीशान राजकीय रात्रिभोज बना। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस ऐतिहासिक स्थल पर विशेष आतिथ्य सत्कार किया, जहां 1783 में अमेरिकी स्वतंत्रता संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। मैक्रों का स्पष्ट उद्देश्य ट्रंप को यूरोपीय सहयोगियों के करीब लाना और 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के कारण उपजे तनाव को कम करना था। फ्रांसीसी पक्ष ने इस मुलाकात को 'वस्तुनिष्ठ रूप से सफल' करार दिया, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि यूक्रेन, ईरान और लेबनान पर हुए वादों को अमल में लाना ही असली कसौटी होगी।
वर्साय का चयन महज एक भव्य आयोजन स्थल नहीं था, बल्कि फ्रांसीसी कूटनीति का एक सोचा-समझा प्रतीक था। लुई चतुर्दश के इस महल ने पहले भी एलिजाबेथ द्वितीय, जॉन एफ कैनेडी और मिखाइल गोर्बाचेव जैसी हस्तियों की मेजबानी की है। मैक्रों ने इसी विरासत का लाभ उठाते हुए ट्रंप को यह संदेश दिया कि फ्रांस दुनिया को अपनी भव्यता से अभिभूत करने की क्षमता अब भी रखता है। ट्रंप, जो सोने की चमक-दमक के जाने-माने प्रशंसक हैं, ने भी इस प्रयास को सराहा और पत्रकारों से कहा, 'यह सोने की परत नहीं, असली चीज है।' उन्होंने वर्साय के गेट पर लगी एक लाख सोने की पत्तियों की ओर इशारा करते हुए अपनी प्रशंसा जाहिर की, जिससे स्पष्ट हुआ कि मैक्रों की रणनीति कारगर रही।
हालांकि, इस भव्य आयोजन ने फ्रांस के भीतर ही राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया। विपक्षी दलों ने मैक्रों पर 'चापलूसी' करने का आरोप लगाया और उन्हें 'ट्रंप का जूता चाटने वाला' तक कहा। आलोचकों का मानना था कि अमेरिकी राष्ट्रपति को रिझाने के लिए इतना खर्चीला आयोजन अनावश्यक था, खासकर तब जब ट्रंप यूरोपीय संघ और खुद मैक्रों पर लगातार तंज कसते रहे हैं। दूसरी ओर, इतालवी मीडिया ने इस कदम को मैक्रों की 'गंभीर चाल' बताया, जिसमें उन्होंने जी7 की तारीखें तक बदल दीं ताकि ट्रंप का जन्मदिन समारोह से न टकराए और वे रात्रिभोज में शामिल हो सकें।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह रात्रिभोज केवल द्विपक्षीय संबंधों का मामला नहीं था। ऑस्ट्रेलियाई और ब्रिटिश प्रेस ने इसे ट्रांसअटलांटिक गठबंधन की मरम्मत के प्रयास के रूप में देखा। ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' रुख ने यूरोप के साथ व्यापार और सुरक्षा संबंधों में दरार डाल दी है, और मैक्रों इस ऐतिहासिक क्षण का उपयोग करके अमेरिका को बहुपक्षीय मंच पर वापस लाना चाहते थे। शिखर सम्मेलन में ईरान शांति समझौते और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों पर चर्चा हावी रही, लेकिन ठोस नतीजों की घोषणा नहीं हुई।
आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि वर्साय की मेज पर किए गए मौखिक वादे कितनी जल्दी ठोस कार्रवाई में बदलते हैं। मैक्रों ने एक 'क्षण' को 'सफलता' में बदलने की चुनौती स्वीकार की है, लेकिन ट्रंप की अप्रत्याशित शैली को देखते हुए यूरोपीय राजधानियों में सतर्क आशावाद है। भारत जैसे उभरते दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह घटनाक्रम इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पश्चिमी गठबंधन में स्थिरता वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक संतुलन को सीधे प्रभावित करती है। यदि ट्रंप प्रशासन यूरोप के साथ तालमेल बिठाता है, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के मुकाबले एक अधिक समन्वित पश्चिमी रुख देखने को मिल सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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मैक्रों ने वर्साय के रात्रिभोज को एक सॉफ्ट-पावर हथियार में बदल दिया, ताकि ट्रंप को रिझाकर सहयोगी खेमे में वापस लाया जा सके और फ्रेंको-अमेरिकी ऐतिहासिक बंधन का जश्न मनाया जा सके। विपक्ष ने चापलूसी का आरोप लगाया, लेकिन महाद्वीपीय टिप्पणीकार इसे एक व्यावहारिक सफलता मानते हैं—एक कूटनीतिक निवेश जिसने लाभ दिया।
वर्साय का भव्य रात्रिभोज मैक्रों की एक सोची-समझी चाल थी, जिसमें उन्होंने ठोस सोने और भव्यता से ट्रंप को रिझाने की कोशिश की, तनाव कम करने की उम्मीद में। आलोचक इसे निरी चापलूसी करार देते हैं, और यह इशारा एक ऐसे रिश्ते की लेन-देन वाली प्रकृति को उजागर करता है जो सार के बजाय तमाशे पर टिका है।
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