
दक्षिण कोरिया के वायु रक्षा क्षेत्र में चीनी-रूसी विमानों का प्रवेश, सियोल ने भेजे लड़ाकू जेट
दस से अधिक चीनी और रूसी सैन्य विमानों ने शनिवार को दक्षिण कोरिया के वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (काडीज़) में उड़ान भरी, जिसके बाद सियोल ने एहतियातन लड़ाकू विमान तैनात किए।
दक्षिण कोरिया की संयुक्त चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ ने पुष्टि की कि 27 जून 2026 को दस से अधिक चीनी और रूसी सैन्य विमान—जिनमें बमवर्षक और लड़ाकू जेट शामिल थे—पूर्वी सागर और दक्षिणी सागर के ऊपर स्थित कोरियाई वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (काडीज़) में दाख़िल हुए और कुछ देर बाद बाहर निकल गए। सियोल ने स्पष्ट किया कि विमानों ने दक्षिण कोरिया की संप्रभु वायु सीमा का उल्लंघन नहीं किया, फिर भी एहतियात के तौर पर वायु सेना के लड़ाकू विमानों को हवा में भेजा गया।
दक्षिण कोरियाई सैन्य बयान के अनुसार, चीनी और रूसी विमानों की गतिविधि का पता उनके काडीज़ में प्रवेश से पहले ही लगा लिया गया था। टोक्यो ने भी दिसंबर 2025 में इसी तरह की घटना पर “गंभीर चिंता” व्यक्त की थी, हालाँकि इस बार जापान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई। बीजिंग के रक्षा मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान में बताया कि यह जापान सागर, पूर्वी चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर के ऊपर 11वाँ संयुक्त सामरिक वायु गश्ती अभियान था, जो “क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने की साझा प्रतिबद्धता और क्षमता” प्रदर्शित करता है। मॉस्को की ओर से तत्काल कोई टिप्पणी नहीं आई, लेकिन रूसी मीडिया ने पुतिन के उस बयान को रेखांकित किया जिसमें चीन के साथ सैन्य सहयोग को “पारंपरिक” और वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से असंबद्ध बताया गया था।
काडीज़ कोई संप्रभु हवाई क्षेत्र नहीं है, बल्कि एक बफ़र ज़ोन है जहाँ विदेशी विमानों से अपनी पहचान बताने की अपेक्षा की जाती है ताकि अनजाने टकराव से बचा जा सके। अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत ऐसी सूचना देना अनिवार्य नहीं है, लेकिन बिना पूर्व सूचना के सैन्य विमानों का प्रवेश क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाता है। दक्षिण कोरियाई सैन्य अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक़, यह अल्पकालिक प्रवेश संभवतः चीन-रूस संयुक्त वायु अभ्यास का हिस्सा था। दोनों देश 2019 से सालाना एक या दो बार बिना किसी पूर्व सूचना के काडीज़ में अपने सैन्य विमान भेजते रहे हैं, जिसे सियोल और टोक्यो नियमित रूप से विरोध का विषय बनाते हैं।
दक्षिण एशियाई सुरक्षा प्रतिष्ठानों की नज़र में, प्रशांत क्षेत्र में इस तरह के संयुक्त गश्ती अभियान चीन और रूस के बीच गहराते सैन्य समन्वय को रेखांकित करते हैं, जिसका व्यापक हिंद-प्रशांत संतुलन पर असर पड़ता है। नई दिल्ली के रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह साझेदारी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की सक्रियता और क्वाड जैसे ढाँचों की प्रासंगिकता को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। हालाँकि यह घटना सीधे तौर पर दक्षिण एशिया से नहीं जुड़ी, लेकिन यह उस सैन्य मुद्रा का हिस्सा है जो पूर्वी एशिया से लेकर हिंद महासागर तक नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता रखती है।
फ़िलहाल इस घटना पर किसी पक्ष ने औपचारिक राजनयिक विरोध दर्ज नहीं कराया है, और न ही किसी टकराव की सूचना है। पिछले अनुभवों को देखते हुए, सियोल और टोक्यो के आने वाले दिनों में बीजिंग और मॉस्को के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराने की संभावना है, जबकि चीन और रूस इस गतिविधि को नियमित संयुक्त अभ्यास का हिस्सा बताते रहेंगे।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | +0.20 | neutral |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.50 | critical |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.70 | critical |
The joint patrol is a standard operation that threatens no one; South Korea overreacts for domestic political reasons.
The incident is trivialized as routine practice, while the counterpart's reaction is framed as emotional and unjustified.
It omits that entering an ADIZ without notice is often seen as provocative, and does not mention Seoul's sovereignty concerns.
The West, with South Korea as its shield, tries to stifle the natural expansion of Russia and China; the patrol is an act of resistance.
It builds a narrative of bloc confrontation, attributing aggressive intentions to the counterpart and presenting the Russian action as defensive and legitimate.
It does not acknowledge that the South Korean ADIZ is an internationally recognized identification zone, nor does it discuss Seoul's right to protect its airspace.
Moscow and Beijing openly challenge the international order; South Korea has the right to defend itself from these intrusions.
The event is framed as a direct security threat, using alarmist language and emphasizing the need for a firm response to prevent future escalation.
It does not consider the possibility that the patrol was indeed in international airspace and that the ADIZ is not sovereign territory, omitting the technical distinction.
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