
जब स्क्रीन पर उभरे बच्चों के नाम: डेटा, शिक्षा और इंसानियत की कशमकश
बातम के डेटा लीक से लेकर बांग्लादेश की समावेशी कक्षाओं तक, शिक्षा में आंकड़ों का इस्तेमाल अवसर और ख़तरे दोनों लेकर आता है।
रात का सन्नाटा था, बातम शहर की नमी भरी हवा में सिर्फ पंखे की घरघराहट सुनाई दे रही थी। एक पिता ने व्हाट्सएप ग्रुप में आए लिंक पर क्लिक किया—एक डार्क वेब फोरम का पन्ना खुला। स्क्रॉल करते हुए उनकी उंगली अचानक रुक गई। स्क्रीन की नीली रोशनी में उनकी बेटी का नाम, पता, स्कूल का ब्योरा साफ पढ़ा जा सकता था। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि बातम की एसपीएमबी प्रवेश प्रणाली से 1,495 छात्रों के डेटा लीक होने का आरोप है, जिसकी डिजिटल फोरेंसिक जांच बीएसएसएन कर रही है। यह घटना बताती है कि शिक्षा के डिजिटलीकरण की होड़ में वही आंकड़े भेद्यता बन सकते हैं, जिन्हें सशक्तिकरण का औजार माना जा रहा था।
इसके ठीक उलट, कुछ हज़ार किलोमीटर दूर इंडोनेशिया के एक दूरस्थ 3टी इलाके के स्कूल में एक अलग ही डेटा-कहानी लिखी जा रही है। एक शिक्षक कक्षा में पापन इंटरैक्टिफ डिजिटल (पीआईडी) लेकर आते हैं। बच्चे पहली बार सौरमंडल का चलायमान चित्र देखते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 99.5 प्रतिशत विद्यार्थियों ने पीआईडी से पढ़ाई को अधिक रोचक पाया और 98 प्रतिशत ने पाठ्य सामग्री को बेहतर समझा। यह कार्यक्रम 2,88,865 स्कूलों तक पहुँच चुका है, जिनमें 13,838 स्कूल सबसे पिछड़े इलाकों में हैं। सरकार का लक्ष्य 2026 में 16,557 और स्कूलों को इंटरनेट से जोड़ना है। यहाँ डेटा एक पुल है, सेंध नहीं।
यह दोहरापन सिर्फ इंडोनेशिया का नहीं है। बांग्लादेश में एक शांत क्रांति प्रतिशतों में मापी जा रही है। ब्रैक इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, दिव्यांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा कार्यक्रम ‘शिखब सबाई’ (हम सब सीखेंगे) के तहत स्कूलों में भागीदारी 15 प्रतिशत बढ़ी और बुलिंग की घटनाओं में 8 प्रतिशत की कमी आई। फिर भी, 5 से 17 साल के 60 प्रतिशत दिव्यांग बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। आंकड़े प्रगति और गहरी खाई, दोनों दिखाते हैं। अर्जेंटीना के एक शिक्षाविद् ला नासियोन में लिखते हैं कि शिक्षा में डेटा का सही इस्तेमाल इंसानियत को कम नहीं करता, बल्कि इंसानी नज़र को विस्तार देता है—अदृश्य विद्यार्थियों को दृश्य बनाता है। लेकिन वही डेटा अगर महज संख्या बनकर रह जाए, तो उस बच्चे को ढक सकता है जो सात साल का होने पर भी पढ़ नहीं पाता।
चेतावनियाँ भी तीखी हैं। इंडोनेशिया के एक स्तंभकार का कहना है कि आंकड़ों की बाढ़ में तर्क डूब रहा है। छात्र अपने तर्कों के समर्थन में आंकड़े चुन-चुनकर लाते हैं, और एआई उपकरण बिना समझे ग्राफ बना देते हैं। इस्लामी अवधारणा ‘हिफ्ज अल-अक्ल’ (बुद्धि का संरक्षण) की याद दिलाई जाती है: एल्गोरिदम के युग में दिमाग की हिफाजत का मतलब है सूचना की पड़ताल करना, तबय्युन करना और फिल्टर बबल का विरोध करना। इस बीच, इंडोनेशिया में 39.6 लाख बच्चे पूरी तरह स्कूल से बाहर हैं। उपाध्यक्ष लेस्तारी मोएरदिजात कहती हैं कि सटीक आंकड़ों के आधार पर लक्षित हस्तक्षेप जरूरी है, न कि सिर्फ रिपोर्टों में दर्ज आंकड़े। बातम का डेटा लीक, 3टी के डिजिटल बोर्ड, ढाका की समावेशी कक्षाएँ—सब एक ही चादर के ताने-बाने हैं।
बांग्लादेश की एक कक्षा में, एक शारीरिक रूप से अक्षम लड़की, जो कभी घर में कैद थी, अब दूसरी पंक्ति में बैठी है। उसकी व्हीलचेयर बेंच के पास खड़ी है। वह उस 15 प्रतिशत वृद्धि का हिस्सा है। बातम में एक पिता अब भी जवाब का इंतजार कर रहा है, उसकी बेटी का डेटा शायद अंधेरे में घूम रहा है। जिस स्क्रीन ने सुदूर गाँव में सौरमंडल उतारा, वही तकनीक एक बच्चे की पहचान उजागर कर सकती है। चुनौती डेटा को नकारने की नहीं, बल्कि उसमें वह आलोचनात्मक तर्क और नैतिक सावधानी भरने की है, जो अकेले अंक कभी नहीं दे सकते। जैसा कि अर्जेंटीना की आवाज याद दिलाती है, स्कूल को मापने की मशीन नहीं, बल्कि खुद से सीखने वाली संस्था बनना चाहिए। असली सवाल यही है कि क्या हम डेटा पॉइंट के पीछे के बच्चे को देख पा रहे हैं।
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
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| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
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