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गाज़ा के डॉक्टर की रिहाई की अपील खारिज, इज़राइली सुप्रीम कोर्ट ने गुप्त सामग्री को बनाया आधार

हुसाम अबू सफ़िया समेत कम से कम 14 फ़लस्तीनी चिकित्सक बिना किसी आरोप के एक साल से अधिक समय से इज़राइली जेलों में बंद हैं, मानवाधिकार संगठनों ने इसे 'गहरी नैतिक विफलता' करार दिया।

इज़राइल के सर्वोच्च न्यायालय ने गाज़ा के कमाल अदवान अस्पताल के निदेशक डॉ. हुसाम अबू सफ़िया की रिहाई की अपील खारिज कर दी है। दिसंबर 2024 में जबरन विस्थापन के आदेशों की अवहेलना कर अस्पताल में मरीज़ों के साथ रहने वाले इस बाल रोग विशेषज्ञ को इज़राइली सेना ने गिरफ़्तार कर लिया था। तब से वह बिना किसी आरोप या मुक़दमे के 'ग़ैरक़ानूनी लड़ाकू क़ानून' के तहत एकांत कारावास में हैं। अदालत ने अपना फ़ैसला 'गुप्त सामग्री' पर आधारित किया, जिसे न तो अबू सफ़िया को दिखाया गया और न ही उनके वकील को। फ़िज़िशियंस फ़ॉर ह्यूमन राइट्स इज़राइल (पीएचआरआई) के अनुसार, यह मामला प्रशासनिक हिरासत के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है, जिसमें कम से कम 14 गाज़ा के डॉक्टर एक वर्ष से अधिक से बिना आरोपों के जेल में हैं।

डॉ. अबू सफ़िया की गिरफ़्तारी उस दौर की है जब इज़राइल ने उत्तरी गाज़ा में चिकित्सा सुविधाओं को खाली करने के लिए व्यापक सैन्य दबाव बनाया था। उन्होंने अस्पताल छोड़ने से इनकार कर दिया और बाद में उन्हें हमास की सैन्य चिकित्सा शाखा का कर्नल बताकर हिरासत में ले लिया गया—एक ऐसा आरोप जिसे न तो अदालत में साबित किया गया और न ही बचाव पक्ष को चुनौती देने का मौक़ा मिला। उनके वकील और कई ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि लगभग दो साल की क़ैद के दौरान उन्हें पिटाई और यातना झेलनी पड़ी है। पीएचआरआई ने इस न्यायिक निर्णय को 'गहरी नैतिक विफलता' बताया, क्योंकि यह जिनेवा कन्वेंशनों के तहत चिकित्साकर्मियों को मिलने वाली सुरक्षा को दरकिनार करता है और बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के अनिश्चितकालीन हिरासत को वैध ठहराता है।

यह मामला अकेला नहीं है। 7 अक्टूबर 2023 के बाद से 446 फ़लस्तीनी स्वास्थ्य पेशेवरों को बिना ठोस सबूतों के हिरासत में लिए जाने की ख़बरें हैं, जो चिकित्सा तटस्थता के सिद्धांत पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इज़राइली क़ानून के तहत 'ग़ैरक़ानूनी लड़ाकू' की श्रेणी विदेशी नागरिकों को बिना मुक़दमे के हिरासत में रखने की अनुमति देती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के विशेषज्ञ जिनेवा कन्वेंशनों की भावना के विपरीत मानते हैं। यूरोपीय मीडिया में इस फ़ैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई है, जहाँ इसे चिकित्सा बुनियादी ढाँचे पर व्यवस्थित हमले के रूप में देखा जा रहा है।

दक्षिण एशियाई संदर्भ में देखें तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भी निवारक निरोध क़ानूनों की आलोचना होती रही है, लेकिन गाज़ा का यह मामला संघर्ष क्षेत्रों में चिकित्साकर्मियों की सुरक्षा के वैश्विक संकट को उजागर करता है। भारत ने स्वयं कश्मीर जैसे इलाक़ों में सुरक्षा क़ानूनों के तहत लंबी हिरासतों का सामना किया है, फिर भी यहाँ अंतर यह है कि इज़राइल एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का पक्षकार होते हुए भी चिकित्सा मिशनों को निशाना बना रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से चिंता जताई गई है, लेकिन ठोस कार्रवाई का अभाव इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है।

आगे का रास्ता क़ानूनी और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। यदि गुप्त सामग्री के आधार पर हिरासत को सर्वोच्च न्यायालय की मंज़ूरी मिलती रही, तो गाज़ा में बचे हुए चिकित्सकों के लिए मानवीय सहायता प्रदान करना और भी जोखिम भरा हो जाएगा। मानवाधिकार संगठन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय सहित अन्य मंचों पर क़ानूनी उपाय तलाश रहे हैं, ताकि चिकित्सा तटस्थता के उल्लंघन को युद्ध अपराध के रूप में चिह्नित किया जा सके। डॉ. अबू सफ़िया की क़ैद अब एक प्रतीक बन चुकी है—यह तय करेगी कि संघर्ष के बीच चिकित्सा नैतिकता की रक्षा के लिए वैश्विक समुदाय कितना तैयार है।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ

50%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa atlantica / anglosfera
Stampa europea continentale/ mediterranea
indignazionevittimismoallarme

इज़राइल के सर्वोच्च न्यायालय ने गाज़ा के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हुसाम अबू सफ़िया की बिना आरोप के हिरासत को 536 दिनों से अधिक बढ़ा दिया। यह निर्णय एक ऐसे कानून पर आधारित है जो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और उचित प्रक्रिया को दरकिनार करता है, जबकि डॉक्टर और सैकड़ों अन्य स्वास्थ्यकर्मी बिना सबूत के बंदी हैं, कुछ को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया।

Stampa atlantica / anglosfera
distaccopragmatismo

इज़राइल के सर्वोच्च न्यायालय ने गाज़ा के एक अस्पताल निदेशक डॉ. हुसाम अबू सफ़िया की रिहाई की अपील खारिज कर दी, जिन्हें 2024 के अंत से बिना आरोप के हिरासत में रखा गया है। अदालत ने अपना निर्णय गोपनीय सामग्री पर आधारित किया जो बचाव पक्ष को नहीं दी गई, और यह डॉक्टर कम से कम 14 गाज़ा चिकित्सकों में से एक हैं जो समान परिस्थितियों में बंदी हैं।

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गाज़ा के डॉक्टर की रिहाई की अपील खारिज, इज़राइली सुप्रीम कोर्ट ने गुप्त सामग्री को बनाया आधार

हुसाम अबू सफ़िया समेत कम से कम 14 फ़लस्तीनी चिकित्सक बिना किसी आरोप के एक साल से अधिक समय से इज़राइली जेलों में बंद हैं, मानवाधिकार संगठनों ने इसे 'गहरी नैतिक विफलता' करार दिया।

इज़राइल के सर्वोच्च न्यायालय ने गाज़ा के कमाल अदवान अस्पताल के निदेशक डॉ. हुसाम अबू सफ़िया की रिहाई की अपील खारिज कर दी है। दिसंबर 2024 में जबरन विस्थापन के आदेशों की अवहेलना कर अस्पताल में मरीज़ों के साथ रहने वाले इस बाल रोग विशेषज्ञ को इज़राइली सेना ने गिरफ़्तार कर लिया था। तब से वह बिना किसी आरोप या मुक़दमे के 'ग़ैरक़ानूनी लड़ाकू क़ानून' के तहत एकांत कारावास में हैं। अदालत ने अपना फ़ैसला 'गुप्त सामग्री' पर आधारित किया, जिसे न तो अबू सफ़िया को दिखाया गया और न ही उनके वकील को। फ़िज़िशियंस फ़ॉर ह्यूमन राइट्स इज़राइल (पीएचआरआई) के अनुसार, यह मामला प्रशासनिक हिरासत के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है, जिसमें कम से कम 14 गाज़ा के डॉक्टर एक वर्ष से अधिक से बिना आरोपों के जेल में हैं।

डॉ. अबू सफ़िया की गिरफ़्तारी उस दौर की है जब इज़राइल ने उत्तरी गाज़ा में चिकित्सा सुविधाओं को खाली करने के लिए व्यापक सैन्य दबाव बनाया था। उन्होंने अस्पताल छोड़ने से इनकार कर दिया और बाद में उन्हें हमास की सैन्य चिकित्सा शाखा का कर्नल बताकर हिरासत में ले लिया गया—एक ऐसा आरोप जिसे न तो अदालत में साबित किया गया और न ही बचाव पक्ष को चुनौती देने का मौक़ा मिला। उनके वकील और कई ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि लगभग दो साल की क़ैद के दौरान उन्हें पिटाई और यातना झेलनी पड़ी है। पीएचआरआई ने इस न्यायिक निर्णय को 'गहरी नैतिक विफलता' बताया, क्योंकि यह जिनेवा कन्वेंशनों के तहत चिकित्साकर्मियों को मिलने वाली सुरक्षा को दरकिनार करता है और बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के अनिश्चितकालीन हिरासत को वैध ठहराता है।

यह मामला अकेला नहीं है। 7 अक्टूबर 2023 के बाद से 446 फ़लस्तीनी स्वास्थ्य पेशेवरों को बिना ठोस सबूतों के हिरासत में लिए जाने की ख़बरें हैं, जो चिकित्सा तटस्थता के सिद्धांत पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इज़राइली क़ानून के तहत 'ग़ैरक़ानूनी लड़ाकू' की श्रेणी विदेशी नागरिकों को बिना मुक़दमे के हिरासत में रखने की अनुमति देती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के विशेषज्ञ जिनेवा कन्वेंशनों की भावना के विपरीत मानते हैं। यूरोपीय मीडिया में इस फ़ैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई है, जहाँ इसे चिकित्सा बुनियादी ढाँचे पर व्यवस्थित हमले के रूप में देखा जा रहा है।

दक्षिण एशियाई संदर्भ में देखें तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भी निवारक निरोध क़ानूनों की आलोचना होती रही है, लेकिन गाज़ा का यह मामला संघर्ष क्षेत्रों में चिकित्साकर्मियों की सुरक्षा के वैश्विक संकट को उजागर करता है। भारत ने स्वयं कश्मीर जैसे इलाक़ों में सुरक्षा क़ानूनों के तहत लंबी हिरासतों का सामना किया है, फिर भी यहाँ अंतर यह है कि इज़राइल एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का पक्षकार होते हुए भी चिकित्सा मिशनों को निशाना बना रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से चिंता जताई गई है, लेकिन ठोस कार्रवाई का अभाव इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है।

आगे का रास्ता क़ानूनी और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। यदि गुप्त सामग्री के आधार पर हिरासत को सर्वोच्च न्यायालय की मंज़ूरी मिलती रही, तो गाज़ा में बचे हुए चिकित्सकों के लिए मानवीय सहायता प्रदान करना और भी जोखिम भरा हो जाएगा। मानवाधिकार संगठन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय सहित अन्य मंचों पर क़ानूनी उपाय तलाश रहे हैं, ताकि चिकित्सा तटस्थता के उल्लंघन को युद्ध अपराध के रूप में चिह्नित किया जा सके। डॉ. अबू सफ़िया की क़ैद अब एक प्रतीक बन चुकी है—यह तय करेगी कि संघर्ष के बीच चिकित्सा नैतिकता की रक्षा के लिए वैश्विक समुदाय कितना तैयार है।

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इज़राइल के सर्वोच्च न्यायालय ने गाज़ा के एक अस्पताल निदेशक डॉ. हुसाम अबू सफ़िया की रिहाई की अपील खारिज कर दी, जिन्हें 2024 के अंत से बिना आरोप के हिरासत में रखा गया है। अदालत ने अपना निर्णय गोपनीय सामग्री पर आधारित किया जो बचाव पक्ष को नहीं दी गई, और यह डॉक्टर कम से कम 14 गाज़ा चिकित्सकों में से एक हैं जो समान परिस्थितियों में बंदी हैं।

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