
ईरान को तत्काल तेल बिक्री की अनुमति, हॉरमुज खुलेगा: अमेरिका से ऐतिहासिक समझौते की बड़ी बातें
19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर के बाद ईरान पर से प्रतिबंध हटेंगे, जलडमरूमध्य से जहाजरानी फिर शुरू होगी और 60 दिनों तक परमाणु समझौते पर बातचीत चलेगी।
लगभग चार महीने से जारी पश्चिम एशिया के संघर्ष को विराम देने वाला अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन 19 जून को स्विट्जरलैंड के ब्यूरगेनस्टॉक रिसॉर्ट में औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित होगा, हालांकि इसे 14 जून को ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अंतिम रूप दिया जा चुका है। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से तैयार इस सहमति का सबसे ठोस और तत्काल प्रभाव यह होगा कि ईरान बिना किसी देरी के कच्चा तेल और ईंधन बेच सकेगा। ब्लूमबर्ग, वॉल स्ट्रीट जर्नल और अल-अरबिया जैसे मीडिया प्रतिष्ठानों के अनुसार प्रतिबंधों में वह सारी ढील दी जाएगी जो बिक्री के लिए जरूरी है—बैंकिंग लेन-देन, जहाजरानी और बीमा सेवाएं सब शामिल होंगी। इस खबर के साथ ही वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट दर्ज की गई और जर्मनी में पेट्रोल-डीज़ल के दाम युद्ध-पूर्व स्तर की ओर लौटने लगे।
पश्चिमी और रूसी मीडिया स्रोतों से प्राप्त विवरण आर्थिक प्रोत्साहनों की व्यापक रूपरेखा खींचते हैं। समझौते के मसौदे में 300 अरब डॉलर से कम नहीं के एक विकास कोष तक ईरान की भविष्य की पहुंच का जिक्र है, साथ ही अमेरिका 30 दिनों के भीतर अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाकर आसपास के क्षेत्रों से सेनाएं वापस बुलाएगा। यूरोपीय बाजारों के लिए राहत का आलम यह है कि जर्मन अखबारों ने ईंधन की कीमतों में आ रही नरमी को सीधे हॉरमुज खुलने की उम्मीद से जोड़ा है। मीडिया रिपोर्टों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तेल बिक्री की अनुमति हॉरमुज जलडमरूमध्य को खोलने और परमाणु मुद्दे पर ईरान के सहयोग पर निर्भर रहेगी, यानी राहत सशर्त है।
पश्चिम एशिया के भीतर से आ रही प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। खाड़ी देशों के मीडिया ने हॉरमुज के दोबारा खुलने को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी बताया है, क्योंकि दुनिया का पांचवां हिस्सा कच्चा तेल और 46 प्रतिशत उर्वरक इसी मार्ग से गुजरता है। लेकिन इजरायल का रुख चिंता पैदा करता है। समझौते में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम की घोषणा है, फिर भी दक्षिण लेबनान पर इजरायली हमले जारी रहे। ईरान की केंद्रीय सैन्य कमान खातम अल-अंबिया ने चेतावनी दी कि अगर इजरायल नहीं रुका तो उसे “कठोर जवाब” का सामना करना पड़ेगा। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल की सैन्य रणनीति पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते हुए पूरी इमारतों को बम से उड़ाने को अनावश्यक बताया, जो वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच असहज दूरी का संकेत है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की लागत से सीधे जुड़ा है। हॉरमुज की नाकेबंदी के दौरान भारत को न केवल कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान झेलना पड़ा, बल्कि उर्वरकों की किल्लत और महंगाई ने कृषि लागत को भी बढ़ाया। जलडमरूमध्य के खुलने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भरोसा लौटेगा और मुंबई-दिल्ली जैसे उपभोक्ता बाजारों में कीमतों पर दबाव कम होगा। भारतीय विदेश नीति के लिए यह घटनाक्रम इस मायने में भी अहम है कि पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता ने एक ऐसे कूटनीतिक मॉडल को सामने रखा है जिसमें क्षेत्रीय शक्तियां वैश्विक संकट सुलझाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
आगे की राह 60 दिनों की गहन परमाणु वार्ता पर टिकी है, जिसमें ईरान ने कभी परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई है और अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की वापसी का रास्ता खुला है। फिर भी स्थायी शांति का सवाल इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों, अमेरिकी घरेलू राजनीति और ईरान के अनुपालन पर अटका रहेगा। अगले दो महीने तय करेंगे कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी स्थिरता की नींव बनता है या महज एक सामरिक विराम साबित होता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रम्प ने ईरान के साथ एक समझौता किया है, जो उन्हें तेल अवीव से दूर और तेहरान के करीब ले जाता है। ज्ञापन पर स्विस रिसॉर्ट में हस्ताक्षर होंगे, हॉरमुज़ जलडमरूमध्य फिर से खुलेगा, प्रतिबंध हटेंगे और 60 दिनों की परमाणु वार्ता शुरू होगी।
अमेरिका-ईरान समझौते में सभी प्रतिबंधों को हटाने, हॉरमुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और तेल निर्यात फिर से शुरू करने का प्रावधान है। एक आर्थिक कोष की योजना है, और जर्मनी में ईंधन की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंच रही हैं, जबकि हिज़बुल्लाह इजरायली सैनिकों पर हमला करता है और नेतन्याहू ने लेबनान में सैनिकों के बने रहने पर जोर दिया है।
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