
ट्रंप की रणनीतिक चुप्पी के बीच ताइवान ने अमेरिकी हथियार सौदे पर दबाव बढ़ाया, चीन ने कहा—‘यह रास्ता बंद’
राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने कहा कि ताइवान सौदेबाजी की मोहरा नहीं बनेगा, जबकि एक सर्वेक्षण में द्वीप के लोगों ने चीन के प्रति सद्भावना को अमेरिकी रक्षा सहयोग से अधिक तरजीह दी।
ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव का केंद्र इस बार 14 अरब डॉलर का अमेरिकी हथियार पैकेज बन गया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के बाद से अधर में लटका है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने वाशिंगटन से इस सौदे को शीघ्र मंजूरी देने की अपील करते हुए स्पष्ट किया कि उनका द्वीप “बलि का बकरा नहीं बनेगा और न ही किसी सौदेबाजी की मोहरा।” यह बयान ट्रंप के उस रुख की प्रतिक्रिया है, जिसमें उन्होंने ताइवान को “बातचीत का प्यादा” बताया था और शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद नए हथियार सौदों पर संयम बरतने के संकेत दिए थे। चीन ने तुरंत कड़ी प्रतिक्रिया दी, ताइवान की अमेरिकी सैन्य शक्ति के सहारे स्वतंत्रता की कोशिशों को “बंद रास्ता” करार दिया। वाशिंगटन में ताइवान के शीर्ष राजनयिक अलेक्जेंडर युई ने भी द्वीप की आत्मरक्षा की गंभीर जरूरत पर जोर दिया, हालांकि स्वीकार किया कि ट्रंप प्रशासन की नीति में कोई औपचारिक बदलाव नहीं आया है।
इस गतिरोध के बीच ताइवान की आंतरिक राय भी बदलती दिख रही है। एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, 44.9 प्रतिशत नागरिकों ने आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, जबकि 29.7 प्रतिशत ने चीन के प्रति सद्भावना बढ़ाने को बेहतर मार्ग बताया; मात्र 11.8 प्रतिशत ने अमेरिकी रक्षा सहयोग गहराने का समर्थन किया। यह आंकड़ा बताता है कि शी-ट्रंप वार्ता के बाद उपजे क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल में द्वीपवासी बाहरी गारंटियों से अधिक अपनी क्षमता और संवाद पर भरोसा कर रहे हैं। इसी दौरान लाई ने अमेरिकी सांसदों से मुलाकात कर रक्षा, प्रौद्योगिकी और दोहरे कराधान से बचाव जैसे ठोस सहयोग की पैरवी की, जो दर्शाता है कि ताइपे कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर विकल्प खुले रखना चाहता है।
क्षेत्रीय समुद्री समीकरण भी इस खींचतान में नए आयाम जोड़ रहे हैं। जापान और फिलीपींस के बीच विशेष आर्थिक क्षेत्रों के सीमांकन की योजना पर ताइवान ने कानूनी आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा कि वियना संधि के तहत किसी तीसरे देश के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे और चीन का इन जलक्षेत्रों पर कोई दावा नहीं है। दूसरी ओर, चीन के अमेरिकी राजदूत शी फेंग ने वाशिंगटन में व्यापार परिषद के सम्मेलन में शुल्क-मुक्त व्यापार की सीमा को 30 अरब से बढ़ाकर 300 अरब डॉलर करने का आह्वान किया—यह संकेत कि सैन्य तनाव के समानांतर आर्थिक संबंधों को स्थिर रखने की कोशिशें भी जारी हैं।
यह पूरा घटनाक्रम हिंद-प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण एशिया के लिए गहरे मायने रखता है। भारत जैसे देश, जो स्वयं चीन के साथ सीमा विवाद और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, ताइवान के संतुलनकारी कौशल को ध्यान से देख रहे हैं। ताइवान की सेमीकंडक्टर उद्योग पर वैश्विक निर्भरता इसे केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न बनाती है। आगे की राह में ट्रंप प्रशासन की ओर से किसी फोन कॉल या नए हथियार सौदे की संभावना फिलहाल क्षीण है, लेकिन ताइवान की आत्मनिर्भरता की आकांक्षा और चीन का अडिग रुख यह सुनिश्चित करते हैं कि जलडमरूमध्य की शांति किसी एक पक्ष की मंशा पर नहीं, बल्कि सामूहिक संयम और पारदर्शी संवाद पर टिकी होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लैटिन अमेरिकी प्रेस ताइवान को एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक द्वीप के रूप में चित्रित करती है जो बीजिंग के दबाव का विरोध कर रहा है। वाशिंगटन की दुविधा और शी जिनपिंग की ट्रम्प को चेतावनी भू-राजनीतिक बलिदान की आशंकाओं को फिर से जगाती है। राष्ट्रपति लाई अमेरिका के साथ सैन्य संबंधों का बचाव करते हुए कहते हैं कि यह द्वीप सौदेबाजी की वस्तु नहीं बनेगा।
चीनी प्रेस अमेरिका के साथ शुल्क-मुक्त व्यापार को दस गुना बढ़ाने की बीजिंग की इच्छा पर जोर देती है। एक सर्वेक्षण दिखाता है कि अधिक ताइवानी वाशिंगटन के साथ संबंध गहरा करने के बजाय मुख्य भूमि चीन के प्रति सद्भावना पसंद करते हैं। कथा सुझाव देती है कि आर्थिक स्थिरता और आपसी सद्भावना सही रास्ता है, हथियार बिक्री के मुद्दे को कम करके आंका गया है।
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