
एआई का श्रम बाज़ार पर दोहरा असर: स्नातकों की नौकरियाँ घटीं, पर समग्र बेरोज़गारी स्थिर
अमेरिका और चीन में नए स्नातकों की बेरोज़गारी दर बढ़ी है, जबकि यूरोपीय सर्वेक्षण तेज़ एआई अपनाने के बावजूद बड़े पैमाने पर छंटनी के संकेत नहीं दिखाते।
अमेरिकी श्रम आँकड़ों में एक नई दरार उभरी है: उच्च शिक्षा प्राप्त समूह में, नए स्नातकों की बेरोज़गारी दर और समग्र दर के बीच का अंतर हाल के महीनों में बढ़ा है। विश्लेषक इसका प्रमुख कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को मान रहे हैं। चीन में युवा विश्वविद्यालय स्नातकों की बेरोज़गारी दर कई वर्षों से ऊपर जा रही है और अब और अधिक है। इसके विपरीत, ब्राज़ील, यूरोपीय संघ और अमेरिका में कुल बेरोज़गारी दरें दशकों के निचले स्तर के आसपास बनी हुई हैं। यह संकेत है कि एआई फ़िलहाल पूरे व्यवसायों को ख़त्म करने के बजाय प्रवेश-स्तर के संज्ञानात्मक कार्यों को स्वचालित कर रही है, जिसका सबसे पहला झटका नए रोज़गार चाहने वालों पर पड़ रहा है।
यह पैटर्न ऐतिहासिक तकनीकी बदलावों से भिन्न नहीं है, लेकिन इसकी गति भिन्न है। ओपनएआई के मुख्य अर्थशास्त्री रॉनी चटर्जी ने यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) के एक कार्यक्रम में कहा कि किसी कार्य का एआई के संपर्क में आने का अर्थ यह नहीं कि वह समाप्त हो जाएगा; उन्होंने अपने पिता का उदाहरण दिया जिनके अर्थशास्त्री के काम को पर्सनल कंप्यूटर ने ख़त्म नहीं किया बल्कि अधिक उत्पादक बना दिया। ईसीबी के मुख्य अर्थशास्त्री फ़िलिप लेन ने बताया कि यूरोपीय कंपनियाँ और उपभोक्ता पिछली सामान्य-उद्देश्यीय प्रौद्योगिकियों की तुलना में एआई को तेज़ी से अपना रहे हैं, फिर भी अभी तक एआई के कारण नौकरियों में कटौती के संकेत नहीं मिले हैं। दूसरी ओर, पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी और रचनात्मक लेखन जैसे क्षेत्रों में एआई उपकरणों का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है—कॉमनवेल्थ लघु कहानी पुरस्कार 2026 के क्षेत्रीय विजेताओं पर एआई के इस्तेमाल के आरोप इस बदलाव की गहराई दिखाते हैं।
भू-राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण का आयाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अमेरिका ने उन्नत चिप्स पर निर्यात नियंत्रण कड़े किए हैं और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों को विदेशी नागरिकों की मॉडल तक पहुँच सीमित करने का निर्देश दिया है। भारत के लिए यह एक रणनीतिक चुनौती है: विशाल डिजिटल बुनियादी ढाँचे और डेवलपर समुदाय के बावजूद, वह अधिकांश मूल्यवान एआई परतों—मॉडल, चिप, क्लाउड—में उपभोक्ता बना हुआ है। भारतीय स्टार्टअप विदेशी फ़ाउंडेशन मॉडलों पर एपीआई के ज़रिए निर्भर हैं, और बड़ी आईटी कंपनियाँ वैश्विक क्लाउड प्रदाताओं पर। यह निर्भरता मूल्य निर्धारण से लेकर सेवा उपलब्धता तक को बाहरी कारकों के प्रभाव में ला सकती है।
विपणन और ब्रांड जगत में एक अलग ही रुझान दिख रहा है। रेडिट के मुख्य विपणन अधिकारी जिम स्क्वायर्स और ऑटोडेस्क की डारा ट्रेसेडर जैसे वैश्विक विपणन नेताओं ने कान फ़िल्मोत्सव में कहा कि एआई उत्पादकता बढ़ाकर मानवीय निर्णय, रुचि और विवेक पर ध्यान केंद्रित करने का समय दे रही है। किम्बर्ली-क्लार्क के थियो रिकेट्स ने तर्क दिया कि जैसे-जैसे एआई उपकरण सबके लिए सुलभ होंगे, प्रतिस्पर्धी लाभ मानवीय अंतर्दृष्टि और बेहतर परिणामों में होगा। कोलंबिया जैसे देशों में डिजिटल उत्पाद बाज़ार 2024 में 10.8 अरब डॉलर का था और 2030 तक 98 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जो ज्ञान-आधारित उद्यमिता के लिए एआई द्वारा खोले गए नए रास्ते दिखाता है।
अगला ठोस पड़ाव नियामकीय होगा। यूरोपीय संघ का एआई अधिनियम लागू हो चुका है, और उच्च-जोखिम श्रेणियों के लिए अनुपालन की समय-सीमाएँ नज़दीक आ रही हैं। भारत जैसे देशों के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वे कितनी तेज़ी से घरेलू फ़ाउंडेशन मॉडल और संप्रभु कंप्यूट अवसंरचना खड़ी कर पाते हैं, ताकि रोज़गार बाज़ार में हो रहे इस संरचनात्मक बदलाव के बीच रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकें।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
तकनीकी कर्मचारी प्रथम पुरुष में बताता है कि कैसे उसका अपना उपकरण युवा सहकर्मियों को अनावश्यक बना रहा है।
व्यक्तिगत अनुभव सुनाकर, लेखक तकनीकी बेरोजगारी के खतरे को ठोस और अपरिहार्य बनाता है।
यह AI के संभावित लाभों और पुनर्प्रशिक्षण के अवसरों को छोड़ देता है, केवल नौकरी के नुकसान पर ध्यान केंद्रित करता है।
अमेरिकी सरकार AI मॉडलों पर निर्यात नियंत्रण में ढील देती है, नवाचार को बढ़ावा देती है।
समाचार को एक नौकरशाही तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, बिना सामाजिक परिणामों का आकलन किए, इस प्रकार विनियमन को सामान्य बनाया जाता है।
यह श्रम बाजार प्रभाव और AI प्रसार से संबंधित नैतिक चिंताओं को पूरी तरह से छोड़ देता है, जो भारतीय ब्लॉक में मौजूद हैं।
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