
ओपेक+ ने अगस्त के लिए तेल उत्पादन कोटा 1.88 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाया
होर्मुज जलडमरूमध्य के आंशिक रूप से खुलने और तेल कीमतों में गिरावट के बीच सात प्रमुख उत्पादक देशों ने अगस्त से उत्पादन में 1.88 लाख बैरल प्रतिदिन की और बढ़ोतरी का निर्णय लिया।
पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) और सहयोगी देशों के समूह ओपेक+ के सात सदस्य देशों— सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कज़ाख़स्तान, अल्जीरिया और ओमान— ने 5 जुलाई को वर्चुअल बैठक में अगस्त 2026 से अपने सामूहिक उत्पादन कोटे में 1,88,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि करने पर सहमति दी। यह लगातार पाँचवाँ महीना है जब समूह ने उत्पादन बढ़ाया है, जिससे अप्रैल के बाद से कुल बढ़ोतरी लगभग 8,00,000 बैरल प्रतिदिन तक पहुँच गई है। यह निर्णय अप्रैल 2023 में घोषित 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की स्वैच्छिक अतिरिक्त कटौतियों को धीरे-धीरे वापस लेने की योजना का हिस्सा है।
उत्पादन में यह विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब फ़रवरी में अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद बंद हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य आंशिक रूप से फिर से खुल गया है। 17 जून को ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही में बाधाएँ दूर करने पर सहमति बनी थी। फिर भी, उत्पादन पूर्व-युद्ध स्तरों पर लौटने में समय लग रहा है। मई में ओपेक+ का कुल उत्पादन गिरकर 3.313 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया था, जो फ़रवरी के 4.277 करोड़ बैरल प्रतिदिन से काफ़ी कम था। सऊदी अरब, इराक और कुवैत का संयुक्त उत्पादन लगभग 60 लाख बैरल प्रतिदिन घट गया था।
तेल बाज़ार पर इसका मिलाजुला असर हुआ है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें युद्ध के दौरान 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई थीं, लेकिन अब गिरकर लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं— ठीक वैसे ही जैसे युद्ध से पहले थीं। इस गिरावट के पीछे चीनी आयात में कमी, ग़ैर-मध्य पूर्वी उत्पादकों से अधिक निर्यात और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के समन्वय में रणनीतिक भंडारों से रिकॉर्ड निकासी जैसे कारक हैं। यूबीएस के विश्लेषक जियोवानी स्टौनोवो के अनुसार, अभी उत्पादन संभवतः लक्ष्य से नीचे बना हुआ है, और जल्द ही बाज़ार का ध्यान इस पर होगा कि कितने टैंकर होर्मुज पार कर पाते हैं और चीनी माँग कितनी तेज़ी से लौटती है।
भारत, जो अपनी ज़रूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, के लिए ये घटनाक्रम महत्वपूर्ण हैं। कीमतों में स्थिरता या नरमी से आयात बिल घट सकता है और मुद्रास्फीति दबाव कम हो सकता है। हालाँकि, ओपेक+ के समक्ष चुनौतियाँ बरक़रार हैं। मई में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के संगठन से बाहर निकलने और इराक द्वारा युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए अधिक उत्पादन कोटे की माँग करने से गुट की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। सैक्सो बैंक के ओले हैनसेन का कहना है कि फिलहाल अधिक कोटे की ज़रूरत अत्यावश्यक नहीं है, परंतु इराक़ का अनुरोध 2027 की क्षमता समीक्षा का हिस्सा बन सकता है।
आगे का रास्ता बाज़ार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। ओपेक+ ने स्पष्ट किया है कि यदि ज़रूरी हुआ तो यह बढ़ोतरी रोकी या वापस ली जा सकती है। अब सबकी निगाहें 2 अगस्त को होने वाली अगली बैठक पर होंगी, जहाँ सितंबर के उत्पादन स्तर पर फ़ैसला होना है। यदि तब भी इतनी ही बढ़ोतरी तय हुई तो 2023 की सभी अतिरिक्त कटौतियाँ पूरी तरह समाप्त हो जाएँगी।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | +0.30 | aligned |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.20 | neutral |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.40 | critical |
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