
लार के नमूने से थकान पकड़ने का मॉडल, बोरियत और मौन की मानसिक शक्ति पर नई बहस
शोधकर्ताओं ने लार परीक्षण के जरिए 94% सटीकता से नींद की कमी का पता लगाया, वहीं मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि पुरानी पीढ़ी बोरियत और खामोशी से मानसिक लचीलापन हासिल करती थी।
स्विस और अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक प्रारंभिक अध्ययन में लार में ऐसे आणविक चिन्हक (बायोमार्कर) खोज निकाले हैं जो बेहद कम नींद लेने वाले व्यक्ति की पहचान 94% सटीकता से कर सकते हैं। 20 स्वस्थ युवाओं पर किए गए इस शोध के अनुसार, बिना नींद के 24 घंटे जागने पर लार में 10 विशेष मेटाबोलाइट्स का पैटर्न बदल जाता है—इसे ‘नींद की कमी का फिंगरप्रिंट’ कहा जा रहा है। हालाँकि यह अभी प्रारंभिक दौर की तकनीक है, पर इसे सड़क सुरक्षा या चिकित्सकीय जाँच में इस्तेमाल करने के लिए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय परीक्षण की योजना बन रही है।
नींद की कमी का दुष्प्रभाव मात्र थकान नहीं है। न्यूरोसाइंटिस्ट मैथ्यू वॉकर के अनुसार, प्रतिदिन छह घंटे से कम सोने से याददाश्त, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और मूड पर असर पड़ता है। इसी कड़ी में अमेरिका के राष्ट्रीय निद्रा फाउंडेशन के 3100 वयस्कों पर हुए सर्वेक्षण में सामने आया कि जो लोग अपनी असली उम्र से अधिक बूढ़ा महसूस करते हैं, वे वास्तव में बदतर नींद और दिन में अधिक थकान की रिपोर्ट करते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि पर्याप्त नींद न लेने पर दैनिक काम भी भारी लगने लगते हैं और धीरे-धीरे समय-पूर्व वृद्धावस्था का अहसास घर कर जाता है।
मनोवैज्ञानिक इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि स्मार्टफोन और लगातार उत्तेजनाओं के दौर ने एक ऐसी मानसिक आदत से हमें दूर कर दिया है जो पहले की पीढ़ियों में स्वाभाविक थी: बोरियत और मौन को बिना घबराए सह लेना। 1960-70 के दशक में बड़े होने वाले बच्चे सड़कों पर खेलते थे, घंटों बिना किसी डिवाइस के रहते थे, जिससे उनमें स्वायत्तता, हताशा सहने की क्षमता और रचनात्मकता का विकास हुआ। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, बोरियत को सहने और स्वीकार करने से मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय होते हैं जो सृजनात्मकता और भावनात्मक नियंत्रण से जुड़े हैं। मनोवैज्ञानिक पीटर ग्रे का कहना है कि मुक्त खेल और बिना वयस्क हस्तक्षेप के झगड़े सुलझाने से बच्चों में सामाजिक-भावनात्मक कौशल पनपते हैं। दिलचस्प यह कि इसी तरह की विशेषता अंतर्मुखी लोगों में आज भी देखी जाती है, जो एकांत से ऊर्जा लेते हैं और गहरी सुनने की शक्ति रखते हैं।
लेकिन मनोवैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ पुराने तरीके अपनाने से काम नहीं चलेगा—संतुलन जरूरी है। अति-स्वायत्तता वाले माहौल में भावनाएँ दबाने या मदद न माँगने की आदत भी पड़ सकती है। आज के विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि बोरियत और मौन को फिर से जीवन में शामिल करने के लिए स्वैच्छिक डिजिटल डिटॉक्स, ध्यान, और खाली वक्त में बिना लक्ष्य के सोचने-विचारने जैसी गतिविधियाँ अपनाई जा सकती हैं। 55 वर्ष से अधिक आयु के लोगों पर हुए अध्ययन संकेत देते हैं कि वे मौन को सहजता से झेल लेते हैं, जबकि युवा पीढ़ी चुप्पी को रिक्तता और बेचैनी से जोड़ती है। अगला ठोस कदम: जर्नल ऑफ प्रोटिओम रिसर्च के लार-परीक्षण के लेखक 1000 से अधिक नमूनों के साथ एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सत्यापन अध्ययन की तैयारी कर रहे हैं, जिसमें शिफ्ट कर्मियों और बार-बार गाड़ी चलाने वालों को भी शामिल किया जाएगा। तब तक, नींद को प्राथमिकता देना और कभी-कभी बिना कुछ किए बैठे रहने का अभ्यास, मानसिक लचीलेपन की दिशा में कारगर हो सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Developmental psychology shows that those who grew up in the 60s and 70s developed remarkable mental resilience thanks to boredom and silence. This generation learned to solve problems without technological distractions, which today marks a difference compared to young people accustomed to constant stimuli. Silence and pause, far from being empty, were formative tools.
Psychology suggests that introverts and those with an 'old soul' possess a unique ability to enjoy solitude and silence, which strengthens their mental resilience. In a digital age full of noise, these individuals draw energy from quiet moments and deep reflection. This perspective challenges the modern glorification of constant activity and social engagement.
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