
दिमागी सेहत 90 साल तक सुधर सकती है: नए शोध से गिरावट की धारणा टूटी
ब्रिटिश बायोबैंक के आंकड़ों के अनुसार शारीरिक फिटनेस डिमेंशिया का जोखिम 57% तक घटा सकती है, जबकि संज्ञानात्मक प्रशिक्षण और पोषण भी उम्रदराज़ दिमाग को मज़बूत रखते हैं।
उम्र के साथ दिमागी कमज़ोरी को अटल मानने वाली सोच को एक साथ कई अध्ययनों ने चुनौती दी है। ब्रिटिश बायोबैंक के विशाल आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि अच्छी ग्रिप स्ट्रेंथ, पर्याप्त नींद और कम बैठे रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का जोखिम 57 प्रतिशत तक कम रहा। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट डलास के तीन वर्षीय अध्ययन में लगभग 4,000 प्रतिभागियों (19 से 94 वर्ष) के ब्रेनहेल्थ इंडेक्स पर संज्ञानात्मक अभ्यासों से मापने योग्य सुधार दर्ज हुआ, जो बुज़ुर्गों में भी दिखा। शिकागो विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट एमिली रोगाल्स्की के 'सुपरएजर' शोध में 80 पार के ऐसे लोग सामने आए जिनकी स्मृति 50-60 वर्ष के बराबर तीक्ष्ण है; उनके दिमाग का सेरिब्रल कॉर्टेक्स और हिपोकैम्पस बड़ा पाया गया और कुछ में अल्ज़ाइमर के जैविक चिह्न होने के बावजूद संज्ञानात्मक गिरावट नहीं थी।
इन नतीजों के पीछे कई क्रियाविधियाँ काम करती हैं। शारीरिक सक्रियता और नियमित, चुनौतीपूर्ण मानसिक अभ्यास दिमागी लचीलापन बढ़ाते हैं। पोषण का योगदान भी स्पष्ट हो रहा है: जापान की हिरोसाकी यूनिवर्सिटी ने 2,000 से अधिक वृद्धों के प्लाज़्मा विश्लेषण से दिखाया कि विटामिन सी का उच्च स्तर बेहतर स्मृति और ग्रे मैटर की मात्रा से जुड़ा है, जबकि कमी से तंत्रिका संयोजकता बिगड़ती है। ब्रिटिश चिकित्सक टिम स्पेक्टर ज़ोर देते हैं कि प्रोटीन के लिए केवल अंडे-मांस पर निर्भर न रहकर दालें, मशरूम और साबुत अनाज जैसे वनस्पति स्रोत अपनाने से आंत के सूक्ष्मजीवों को फ़ाइबर मिलता है, जिसकी 90 प्रतिशत लोगों में कमी है। यह फ़ाइबर कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में भी सहायक है, जैसा कि हृदय रोग विशेषज्ञ साबुत अनाज, हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, क्रूसिफ़ेरस सब्ज़ियाँ, दालें, मेवे और फलों की सिफ़ारिश करते हैं। त्वचा के लिए लाभकारी बताए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट-युक्त खाद्य पदार्थ जैसे बेरीज़, एवोकाडो, मेवे और पपीता भी दिमागी कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में भूमिका निभा सकते हैं।
भूलने की सामान्य घटनाओं को लेकर भी नई समझ विकसित हुई है। मनोवैज्ञानिक 'दरवाज़ा प्रभाव' को दिमाग की संदर्भ-आधारित सूचना पुनर्गठन की क्षमता मानते हैं, स्मृतिदोष नहीं। नाम भूलना अक्सर स्मृति से पुनर्प्राप्ति की समस्या है, चेहरा पहचानने में नहीं, क्योंकि नाम प्रसंगविहीन होते हैं। लेकिन बार-बार परिचित चेहरे न पहचानना या जानी-पहचानी जगहों में भटकना विशेषज्ञ परामर्श की माँग करता है। दूसरी ओर, येल यूनिवर्सिटी के इमेजिंग अध्ययनों में जमाखोरी विकार (2-6 प्रतिशत वयस्कों में) के दौरान निर्णय-द्वंद्व और सामाजिक पीड़ा से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्र अतिसक्रिय पाए गए; यह संज्ञानात्मक प्रसंस्करण की जटिलता को रेखांकित करता है।
शोधकर्ता अगले चरण में सुपरएजरों के मस्तिष्क दान के ज़रिए कोशिकीय स्तर पर सुरक्षा कारकों की पहचान कर रहे हैं। फ़िलहाल, विभिन्न भौगोलिक केंद्रों से मिल रहे संकेत एक ही दिशा में इशारा करते हैं: शारीरिक गतिविधि, संज्ञानात्मक चुनौतियाँ और फ़ाइबर-विटामिन युक्त विविध आहार का नियमित पालन दिमागी सेहत को नौवें दशक तक संवार सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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विज्ञान 'सुपरएजर्स' का अध्ययन कर रहा है, जो अस्सी साल की उम्र में भी पचास साल के लोगों जैसी याददाश्त रखते हैं, ताकि समझा जा सके कि उनका दिमाग उम्र बढ़ने का प्रतिरोध कैसे करता है। एमिली रोगाल्स्की जैसे शोधकर्ता इस असाधारण संज्ञानात्मक लचीलेपन के जैविक रहस्यों की खोज कर रहे हैं।
नाम या चेहरे भूल जाना एक आम स्मृति चूक है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कुछ प्रकार की भूल मस्तिष्क स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकती है। यदि आपको अक्सर परिचित नाम याद करने में कठिनाई होती है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श करने का समय आ सकता है।
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