
इटली में 'एंटीफासिस्ट प्रमाणपत्र' पर सियासी जंग: अभिव्यक्ति की आज़ादी या संवैधानिक अनिवार्यता?
रोम पुस्तक मेले में प्रकाशकों के लिए फ़ासीवाद-विरोधी घोषणा अनिवार्य करने पर प्रधानमंत्री मेलोनी ने इसे सेंसरशिप बताया, जबकि वामपंथी इसे संविधान का सम्मान बता रहे हैं—यह विवाद अब फ़्रांस तक गूँज रहा है।
रोम की वार्षिक पुस्तक प्रदर्शनी 'पियू लिब्री पियू लिबेरी' (अधिक किताबें, अधिक स्वतंत्रता) ने 2026 संस्करण के लिए एक ऐसी शर्त रखी जिसने इटली की राजनीति में भूचाल ला दिया: हर भाग लेने वाले प्रकाशक को एक लिखित घोषणा पर हस्ताक्षर करने होंगे कि वे फ़ासीवाद और सभी अधिनायकवादी विचारधाराओं को अस्वीकार करते हैं। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इसे तुरंत 'एंटीफासिस्ट प्रमाणपत्र' (पेटेंटिनो एंटीफासिस्टा) करार दिया और सोशल मीडिया पर लिखा कि यह सेंसरशिप है—'आप तभी स्वतंत्र हैं जब वही कहें जो वामपंथी अनुमति देते हैं।' न्याय मंत्री कार्लो नोर्दियो ने एक क़ानूनी विडंबना उजागर की: 'शायद आयोजकों को पता नहीं कि हमारी न्याय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण किताब, दंड संहिता, पर मुसोलिनी के हस्ताक्षर हैं।'
इटली के वामपंथी खेमे ने इस आरोप को संविधान की रक्षा का प्रश्न बताया। राष्ट्रीय पार्टिज़न संघ (एएनपीआई) के अध्यक्ष जियानफ्रैंको पालियारूलो ने कहा कि यह सेंसरशिप नहीं, बल्कि 'संविधान और क़ानून का सम्मान' है। वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष स्टेफ़ानो बोनाच्चीनी ने एक अलग सुर अपनाया—वे गहरे एंटीफासिस्ट हैं, लेकिन मानते हैं कि 'एंटीफासिज़्म से हमने मेलोनी को नहीं हराया और न ही वान्नाच्ची को हरा पाएँगे।' कुछ वामपंथी टिप्पणीकारों ने इसे स्टालिनवादी मानसिकता बताया, जबकि दक्षिणपंथी अख़बारों ने लिखा कि यह 'सांस्कृतिक नागरिकता पर मुहर लगाने' जैसा है। पाँच सितारा आंदोलन के नेता जूसेप्पे कोंते ने इस पूरे विवाद को 'अतियथार्थवादी रविवारीय बहस' कहकर ख़ारिज किया।
यह बहस अब इटली की सीमाओं से बाहर भी सुर्ख़ियों में है। फ़्रांस में ज्याँ-ल्यूक मेलोंशों की अगुआई वाली वामपंथी पार्टी 'ला फ़्रांस इंसूमीज़' पर खुले यहूदी-विरोध का आरोप लगा है, जिसने चुनावी गठबंधन को तोड़ दिया है और धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए रास्ता खोल दिया है। स्वीडिश अख़बार डागेंस न्यहेटर के स्तंभकार ओले स्वेनिंग के अनुसार, मेलोंशों की 'यहूदी-विरोधी प्रेरित चुनावी रणनीति' ने वामपंथी एकता को चूर-चूर कर दिया है। यह इटली की स्थिति से एक समानांतर सबक़ प्रस्तुत करता है: जब वैचारिक शुद्धता की परीक्षाएँ राजनीतिक औज़ार बन जाती हैं, तो वे अक्सर अपने ही गठबंधन को कमज़ोर कर देती हैं और विपक्षी ध्रुवीकरण को मज़बूत करती हैं।
दक्षिण एशियाई संदर्भ में देखें तो यह प्रकरण भारत जैसे लोकतंत्रों के लिए भी प्रासंगिक है, जहाँ राष्ट्रवाद और वैचारिक अनुरूपता को लेकर सांस्कृतिक आयोजनों में अक्सर तनाव उभरता है। इटली का विवाद दिखाता है कि फ़ासीवाद-विरोध को संस्थागत रूप देने की कोशिश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ किस तरह टकरा सकती है। आयोजकों का तर्क है कि पिछले साल एक दक्षिणपंथी प्रकाशक की उपस्थिति से उपजे विवाद के बाद यह क़दम पारदर्शिता के लिए ज़रूरी था, लेकिन आलोचक इसे 'सेंसरशिप का स्व-लक्ष्य' मान रहे हैं जिसने दक्षिणपंथी दलों को एकजुट होने का मौक़ा दे दिया।
आगे की राह में यह सवाल और गहराएगा कि क्या सांस्कृतिक मंचों को राजनीतिक घोषणाओं का प्रवेशद्वार बनना चाहिए। मेलोनी सरकार के तेवर से साफ़ है कि वह इसे वैचारिक भेदभाव के रूप में पेश करेगी, जबकि वामपंथी इसे संवैधानिक मूल्यों की न्यूनतम शर्त बताते रहेंगे। यूरोपीय अनुभव बताता है कि जब ध्रुवीकरण चरम पर हो, तो 'अधिक स्वतंत्रता' का नारा देने वाले आयोजन भी अनजाने में 'कम स्वतंत्रता' के औज़ार बन सकते हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इतालवी प्रेस पुस्तक मेले में भाग लेने के लिए प्रकाशकों द्वारा फ़ासीवाद-विरोधी प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करने की अनिवार्यता पर उपजे बवाल को विस्तार से रिपोर्ट करता है। सरकारी शख्सियतें इसे स्टालिनवादी निष्ठा परीक्षण करार देती हैं, व्यंग्यपूर्वक यह रेखांकित करते हुए कि दंड संहिता पर अब भी मुसोलिनी के हस्ताक्षर हैं, जबकि वामपंथ जोर देता है कि फ़ासीवाद-विरोध एक अपरिहार्य लोकतांत्रिक मूल्य है।
दूर से देखते हुए, भारतीय प्रेस इतालवी विवाद को यूरोप के व्यापक संघर्ष का प्रतीक मानता है जहाँ पुनरुत्थानशील दक्षिणपंथी ताकतें और जुझारू वामपंथी आंदोलन आमने-सामने हैं, जिसकी मूर्ति जाँ-ल्यूक मेलोंशों हैं। 'फ़ासीवाद-विरोधी प्रमाणपत्र' को एक आवश्यक लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है, जबकि इतालवी सरकार के विरोध को व्यंग्यपूर्ण तटस्थता से देखा जाता है।
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