
पायलट जोन वापसी पर अमेरिकी दल की लेबनान में बैठक, रोम वार्ता से पहले इज़रायली प्रस्तावों ने बढ़ाई मुश्किलें
अमेरिकी सैन्य प्रतिनिधिमंडल पहले प्रायोगिक क्षेत्र से इज़रायली सेना की वापसी के तंत्र पर चर्चा कर रहा है, जबकि इज़रायल के विस्तारित क्षेत्रीय प्रस्ताव और हिज़बुल्लाह के पूर्ण विरोध ने आगामी रोम वार्ता को जटिल बना दिया है।
लेबनान में एक अमेरिकी सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने सेना कमान के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं, जिसका केंद्रीय उद्देश्य 26 जून के ढाँचागत समझौते के तहत पहले ‘पायलट जोन’ से इज़रायली वापसी के कार्यान्वयन की रूपरेखा तय करना है। यह समझौता दक्षिण लेबनान में इज़रायल की क्रमिक वापसी और लेबनानी सेना की तैनाती की रूपरेखा रखता है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) इन क्षेत्रों पर दोनों पक्षों के साथ समन्वय करेगी, और वाशिंगटन के अनुसार पहला पायलट जोन कुछ ही दिनों में शुरू होगा। यह प्रक्रिया 15-16 जुलाई को रोम में होने वाली छठे दौर की त्रिपक्षीय वार्ता और राष्ट्रपति जोसेफ औन की 21 जुलाई को प्रस्तावित वाशिंगटन यात्रा से ठीक पहले हो रही है।
लेबनानी पक्ष का रुख स्पष्ट है कि वापसी केवल अधिकृत क्षेत्रों से हो, जबकि अल-दियार और अन-नहर जैसे मीडिया स्रोतों के अनुसार इज़रायल पायलट जोन में अधिकृत न होने वाली और लीतानी नदी के उत्तर की बस्तियाँ शामिल करने का प्रस्ताव दे रहा है। लेबनानी सैन्य सूत्र इसे ‘फँसाने वाला’ मानते हैं, क्योंकि इससे इज़रायल बाद में अन्य क्षेत्रों को सैन्य परिचालन नियंत्रण का हवाला देकर खाली करने से इनकार कर सकता है। इज़रायल पहले ही 10 किलोमीटर गहरे सुरक्षा क्षेत्र में बने रहने की घोषणा कर चुका है, और आईडीएफ अधिकारी हिज़बुल्लाह के पुनर्संगठन को लेकर लेबनानी सेना की क्षमता पर संदेह जता रहे हैं। लेबनानी सेना ने साफ कर दिया है कि वह इज़रायली प्रस्तावों के आगे नहीं झुकेगी और किसी आंतरिक टकराव से बचने पर जोर दे रही है।
हिज़बुल्लाह ने इस पूरे ढाँचागत समझौते को ‘असंवैधानिक और अपमानजनक’ करार देते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। शिया द्वय के एक सूत्र ने अल-दियार को बताया कि हिज़बुल्लाह न तो पायलट जोन की प्रक्रिया को मान्यता देगा और न ही इस समझौते से निकलने वाले किसी कदम को स्वीकार करेगा। उसकी एकमात्र शर्त बिना किसी पूर्व शर्त के समूचे अधिकृत दक्षिणी क्षेत्र से इज़रायली वापसी है। वहीं, वाशिंगटन इन बैठकों और रोम वार्ता के जरिये लेबनान मोर्चे को ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनावों से पूरी तरह अलग करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसे आशंका है कि यदि ईरान के साथ टकराव बढ़ता है तो हिज़बुल्लाह फिर से हस्तक्षेप कर सकता है, जिससे इज़रायल को लेबनान के खिलाफ और बहाने मिलेंगे।
अमेरिकी दबाव के बावजूद इज़रायली हवाई और तोपखाने के हमले दक्षिण लेबनान में जारी हैं, जिससे विस्थापितों की वापसी प्रभावित हो रही है—संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 4.30 लाख से अधिक लोग अभी भी विस्थापित हैं। लेबनान ने रोम वार्ता में भागीदारी के लिए पहले दो पायलट जोन से इज़रायली वापसी की शर्त रखी है, और वार्ता का मुख्य एजेंडा सुरक्षा एवं सैन्य पहलू होंगे। अल-अखबार के अनुसार, इज़रायल ने राजनीतिक, सुरक्षा और ‘अच्छे पड़ोसी संबंध’ संबंधी संयुक्त समितियाँ बनाने की माँग रखी है, जिस पर लेबनानी प्रतिनिधिमंडल अपना जवाब लेकर रोम पहुँचेगा। अमेरिकी जनरल क्लियरफील्ड के नेतृत्व में त्रिपक्षीय केंद्रीय समिति का गठन भी प्रस्तावित है। यह पूरी प्रक्रिया औन की वाशिंगटन यात्रा की पूर्व पीठिका तैयार करेगी, जहाँ समझौते के ठोस कार्यान्वयन का प्रदर्शन लेबनान की स्थिति मजबूत करेगा।
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.40 | critical |
| इज़राइली प्रेस | −0.50 | critical |
The Lebanese government and the United States implement a mutually agreed gradual withdrawal.
The report confines itself to official facts, omitting political and military context, thereby presenting the agreement as a technical procedure.
It omits Israeli skepticism about the Lebanese army's capability and Lebanese criticisms of Israeli terms.
We Lebanese expose Israeli traps and defend national sovereignty.
Repeated warnings about 'Israeli concepts' and 'traps' construct a cunning enemy, while the anticipated army deployment is presented as proof of good faith.
Omits Israeli security concerns over Hezbollah's rearmament and IDF skepticism about the Lebanese army's capability.
We, the Israeli military, assess the agreement with practical skepticism: the Lebanese army is no match for Hezbollah.
The direct testimony of a brigade commander lends authority, and the contrast between Hezbollah's power and the Lebanese army's weakness establishes a hierarchy of threats.
Omits the Lebanese perspective on 'Israeli traps' and criticisms of the pilot zone concept, and does not present Hezbollah's refusal as legitimate.
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