
आईएईए प्रमुख की दो टूक: अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते में सत्यापन की भूमिका होगी अनिवार्य
राफेल ग्रॉसी ने स्पष्ट किया कि कोई भी समझौता तभी सार्थक होगा जब एजेंसी को औपचारिक निगरानी का अधिकार मिले; यह बयान दोनों देशों के बीच युद्धविराम और वार्ता की खबरों के बीच आया है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर एक अहम शर्त रख दी है। उन्होंने कहा कि एजेंसी किसी भी परमाणु समझौते की निगरानी और सत्यापन के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन इसके लिए उसे औपचारिक रूप से शामिल किया जाना अनिवार्य है। यह बयान दक्षिण कोरियाई समाचार एजेंसी योनहाप को एक सेमिनार के दौरान दिया गया, जब पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान और वाशिंगटन के बीच चल रही गुप्त वार्ताओं पर टिकी हैं। ग्रॉसी ने ज़ोर देकर कहा, 'एजेंसी के लिए सबसे अहम चीज़ सत्यापन ही है, और यह तथ्य कि हम समाधान का हिस्सा होंगे, एक बहुत ज़रूरी औपचारिकता है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।'
ईरानी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, दोनों देश पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक प्रारंभिक समझौता ज्ञापन पर पहुँच सकते हैं, जिसमें पहले 60 दिनों के युद्धविराम की बात कही गई है। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके यूरेनियम भंडार पर बातचीत शुरू होगी। ईरानी पक्ष के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि यह प्रारंभिक समझौता ज्ञापन परमाणु मुद्दों को शामिल नहीं करता; उन्हें बाद की 60-दिवसीय वार्ता का विषय बताया गया है। हालाँकि, इस ख़बर के बाद ही ग्रॉसी का बयान आया, जिससे संकेत मिलता है कि आईएईए किसी भी ढीले-ढाले इंतज़ाम के पक्ष में नहीं है।
ग्रॉसी ने यह भी याद दिलाया कि यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं और एजेंसी से सत्यापन का अनुरोध करते हैं, तो उन्हें एजेंसी के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स से अनुमति लेनी होगी। इस प्रक्रिया को उन्होंने एक आवश्यक क़ानूनी कदम बताया। इससे साफ़ होता है कि भले ही राजनीतिक समझौता हो जाए, तकनीकी और क़ानूनी पहलुओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। रूसी अख़बार वेदोमोस्ती में भी इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि आईएईए की भूमिका सिर्फ़ तकनीकी नहीं, बल्कि समझौते की विश्वसनीयता की गारंटी होगी।
वैश्विक और क्षेत्रीय नज़रिए से देखें तो ग्रॉसी का यह रुख़ भारत और दक्षिण एशिया के लिए भी अहम है। अगर अमेरिका-ईरान तनाव कम होता है, तो खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति स्थिर होगी और तेल की क़ीमतों पर दबाव घटेगा। भारत जैसे बड़े आयातक के लिए यह आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद होगा। साथ ही, पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष आईएईए की शर्तों को स्वीकारेंगे? जेसीपीओए (2015 का परमाणु समझौता) के अनुभव से सबक लेते हुए, इस बार निगरानी तंत्र को और मज़बूत बनाने की ज़रूरत है ताकि कोई भी पक्ष बाद में मुकर न सके।
ग्रॉसी का ताज़ा बयान एक तरह से समय से पहले की चेतावनी है कि बिना पारदर्शी सत्यापन ढाँचे के कोई भी समझौता अधूरा और टिकाऊ नहीं होगा। आने वाले हफ़्तों में, जैसे-जैसे वार्ता आगे बढ़ेगी, आईएईए की औपचारिक भागीदारी पर सहमति ही इस प्रक्रिया की असली कसौटी साबित होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरानी स्रोतों का कहना है कि अमेरिका-ईरान के बीच प्रारंभिक ज्ञापन में परमाणु मुद्दे शामिल नहीं हैं, जिन पर 60 दिनों में अलग वार्ता होगी। IAEA प्रमुख ने भविष्य के किसी भी परमाणु समझौते के सत्यापन के लिए तत्परता व्यक्त की, लेकिन तेहरान का कहना है कि वर्तमान समझौता केवल शत्रुता समाप्त करने के बारे में है। यह कहानी परमाणु पहलू को कम करके पेश करती है और IAEA की भूमिका को केवल बाद के चरणों में स्वीकार करती है।
रूसी राज्य मीडिया रिपोर्ट करता है कि IAEA के महानिदेशक ग्रॉसी किसी भी संभावित अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते की निगरानी में एजेंसी को आधिकारिक रूप से शामिल करने का आग्रह कर रहे हैं, इस बात पर जोर देते हुए कि सत्यापन केंद्रीय भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि समझौता होने पर उन्हें शासी बोर्ड से अनुमति लेनी होगी। स्वर प्रक्रियात्मक और तटस्थ है, जो एजेंसी के तकनीकी जनादेश पर केंद्रित है।
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