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अर्थव्यवस्थासोमवार, 15 जून 2026

खाद्य कीमतों का वैश्विक विरोधाभास: विकासशील देशों में दबाव, स्वीडन में राहत

एक ओर स्वीडन में कर कटौती से खाद्य कीमतें गिरी हैं, वहीं भारत, ईरान, कोलंबिया और अर्जेंटीना में मौसम व मुद्रा के झटकों से मुद्रास्फीति बढ़ रही है।

दुनिया के अलग-अलग कोनों से आ रहे खाद्य मूल्यों के आंकड़े एक गहराते विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं। जहाँ स्वीडन में पेंशनभोगियों के संगठन प्रो के सर्वेक्षण में मक्खन, संतरे और दुग्ध उत्पादों की कीमतों में स्पष्ट गिरावट दर्ज हुई है, वहीं भारत से लेकर लैटिन अमेरिका और मध्य-पूर्व तक अधिकतर विकासशील अर्थव्यवस्थाएं खाद्य महंगाई की चपेट में हैं। इस दोहरी तस्वीर के केंद्र में जलवायु अनिश्चितता, मुद्रा विनिमय दरों के झटके और नीतिगत सीमाएं हैं।

दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व में दबाव विशेष रूप से गहरा है। भारत में मई की खुदरा मुद्रास्फीति 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो मौजूदा सूचकांक शृंखला का सर्वोच्च स्तर है, और खाद्य मुद्रास्फीति की रफ्तार बढ़कर 4.78 प्रतिशत हो गई। माल ढुलाई की लागत में 7.63 प्रतिशत का उछाल संकेत देता है कि कीमतों का दबाव अब परिवहन जैसे सेवा क्षेत्रों में भी फैल रहा है। ईरान में हालात कहीं अधिक चिंताजनक हैं। पिछले पांच वर्षों में खाद्य तेल के दाम 20 गुना बढ़ चुके हैं, और इस कमोडिटी की 90 प्रतिशत से अधिक आयात निर्भरता इसे हर मुद्रा झटके के सामने बेहद कमज़ोर बना देती है। आधी सदी के उच्चतम स्तर पर पहुंची ईरान की समग्र मुद्रास्फीति आम नागरिकों की थाली तक सिमट कर रह गई है।

लैटिन अमेरिका में कोलंबिया और अर्जेंटीना अलग-अलग तरीके से कीमतों की मार झेल रहे हैं। कोलंबिया में बारिश और सूखे के अदला-बदली भरे मौसम ने फल-सब्जी जैसी जल्द खराब होने वाली वस्तुओं की कीमतों में इस वर्ष 14.8 प्रतिशत का उछाल दिया, जबकि मुख्य मुद्रास्फीति छह प्रतिशत के पार पहुंचकर बैंको डे ला रिपब्लिका पर ब्याज दरों को सख्त बनाए रखने का दबाव डाल रही है। अर्जेंटीना में मई में एक औसत चार सदस्यीय परिवार को गरीबी रेखा से ऊपर रहने के लिए लगभग 15 लाख पेसो की आवश्यकता पड़ी, और बुनियादी खाद्य टोकरी के दाम में दो प्रतिशत की मासिक वृद्धि आम बजट पर लगातार दबाव बना रही है।

इसके विपरीत स्वीडन एक दुर्लभ राहत की तस्वीर पेश करता है। इस वर्ष एक अप्रैल से खाद्य पदार्थों पर मूल्य वर्धित कर (वैट) को 12 प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत कर देने के बाद प्रो की खाद्य टोकरी की औसत कीमत छह महीनों में छह प्रतिशत से अधिक गिर गई। प्रो के उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ इस गिरावट को अपने अब तक के सर्वेक्षणों में सबसे स्पष्ट मूल्य कटौती बताते हैं, हालांकि उन्हें आशंका है कि कुछ उत्पादों में अंतर बरकरार रह सकता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि नीतिगत हस्तक्षेप उपभोक्ता की थाली को राहत दे सकता है, परंतु अधिकांश विकासशील देशों की राजकोषीय सीमाएं ऐसे कर रियायतों की गुंजाइश नहीं देतीं।

आगे की राह असमान बनी रहेगी। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मौसमी अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को झटके देते रहेंगे। विकसित देश जहाँ कर नीतियों के ज़रिए कीमतों की गर्मी कम करने की कोशिश कर सकते हैं, वहीं बोगोटा से मुंबई तक केंद्रीय बैंक मुख्य मुद्रास्फीति के लगातार बने रहने वाले दूसरे दौर के प्रभावों पर कड़ी निगाह रखे हुए हैं। उनके सामने महंगाई को काबू करने और आर्थिक वृद्धि को सहारा देने का नाजुक संतुलन साधने की चुनौती है, जिसका बोझ अंततः सबसे गरीब तबके की रसोई पर ही पड़ेगा।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

50%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa latinoamericana
Stampa europea continentale/ nordica
pragmatismodistacco

स्वीडन में अप्रैल में भोजन पर वैट 12 से घटाकर 6 प्रतिशत किए जाने के बाद खाद्य कीमतों में स्पष्ट गिरावट आई है। पेंशनभोगियों की टोकरी की कीमत एक साल में छह प्रतिशत से अधिक घट गई, हालाँकि देश के विभिन्न हिस्सों के बीच बड़ी मूल्य असमानताएँ बनी हुई हैं।

Stampa latinoamericana/ mercato
allarmescetticismo

पूरे लैटिन अमेरिका में सूखे, भारी बारिश और आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य महंगाई बढ़ रही है। अर्जेंटीना में चार लोगों के परिवार को मई में गरीबी रेखा से ऊपर रहने के लिए करीब 15 लाख पेसो की जरूरत पड़ी, जबकि कोलंबिया की मूल मुद्रास्फीति फिर से 6 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे केंद्रीय बैंक की दर नीति पर संदेह पैदा हो गया है।

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खाद्य कीमतों का वैश्विक विरोधाभास: विकासशील देशों में दबाव, स्वीडन में राहत

एक ओर स्वीडन में कर कटौती से खाद्य कीमतें गिरी हैं, वहीं भारत, ईरान, कोलंबिया और अर्जेंटीना में मौसम व मुद्रा के झटकों से मुद्रास्फीति बढ़ रही है।

दुनिया के अलग-अलग कोनों से आ रहे खाद्य मूल्यों के आंकड़े एक गहराते विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं। जहाँ स्वीडन में पेंशनभोगियों के संगठन प्रो के सर्वेक्षण में मक्खन, संतरे और दुग्ध उत्पादों की कीमतों में स्पष्ट गिरावट दर्ज हुई है, वहीं भारत से लेकर लैटिन अमेरिका और मध्य-पूर्व तक अधिकतर विकासशील अर्थव्यवस्थाएं खाद्य महंगाई की चपेट में हैं। इस दोहरी तस्वीर के केंद्र में जलवायु अनिश्चितता, मुद्रा विनिमय दरों के झटके और नीतिगत सीमाएं हैं।

दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व में दबाव विशेष रूप से गहरा है। भारत में मई की खुदरा मुद्रास्फीति 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो मौजूदा सूचकांक शृंखला का सर्वोच्च स्तर है, और खाद्य मुद्रास्फीति की रफ्तार बढ़कर 4.78 प्रतिशत हो गई। माल ढुलाई की लागत में 7.63 प्रतिशत का उछाल संकेत देता है कि कीमतों का दबाव अब परिवहन जैसे सेवा क्षेत्रों में भी फैल रहा है। ईरान में हालात कहीं अधिक चिंताजनक हैं। पिछले पांच वर्षों में खाद्य तेल के दाम 20 गुना बढ़ चुके हैं, और इस कमोडिटी की 90 प्रतिशत से अधिक आयात निर्भरता इसे हर मुद्रा झटके के सामने बेहद कमज़ोर बना देती है। आधी सदी के उच्चतम स्तर पर पहुंची ईरान की समग्र मुद्रास्फीति आम नागरिकों की थाली तक सिमट कर रह गई है।

लैटिन अमेरिका में कोलंबिया और अर्जेंटीना अलग-अलग तरीके से कीमतों की मार झेल रहे हैं। कोलंबिया में बारिश और सूखे के अदला-बदली भरे मौसम ने फल-सब्जी जैसी जल्द खराब होने वाली वस्तुओं की कीमतों में इस वर्ष 14.8 प्रतिशत का उछाल दिया, जबकि मुख्य मुद्रास्फीति छह प्रतिशत के पार पहुंचकर बैंको डे ला रिपब्लिका पर ब्याज दरों को सख्त बनाए रखने का दबाव डाल रही है। अर्जेंटीना में मई में एक औसत चार सदस्यीय परिवार को गरीबी रेखा से ऊपर रहने के लिए लगभग 15 लाख पेसो की आवश्यकता पड़ी, और बुनियादी खाद्य टोकरी के दाम में दो प्रतिशत की मासिक वृद्धि आम बजट पर लगातार दबाव बना रही है।

इसके विपरीत स्वीडन एक दुर्लभ राहत की तस्वीर पेश करता है। इस वर्ष एक अप्रैल से खाद्य पदार्थों पर मूल्य वर्धित कर (वैट) को 12 प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत कर देने के बाद प्रो की खाद्य टोकरी की औसत कीमत छह महीनों में छह प्रतिशत से अधिक गिर गई। प्रो के उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ इस गिरावट को अपने अब तक के सर्वेक्षणों में सबसे स्पष्ट मूल्य कटौती बताते हैं, हालांकि उन्हें आशंका है कि कुछ उत्पादों में अंतर बरकरार रह सकता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि नीतिगत हस्तक्षेप उपभोक्ता की थाली को राहत दे सकता है, परंतु अधिकांश विकासशील देशों की राजकोषीय सीमाएं ऐसे कर रियायतों की गुंजाइश नहीं देतीं।

आगे की राह असमान बनी रहेगी। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मौसमी अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को झटके देते रहेंगे। विकसित देश जहाँ कर नीतियों के ज़रिए कीमतों की गर्मी कम करने की कोशिश कर सकते हैं, वहीं बोगोटा से मुंबई तक केंद्रीय बैंक मुख्य मुद्रास्फीति के लगातार बने रहने वाले दूसरे दौर के प्रभावों पर कड़ी निगाह रखे हुए हैं। उनके सामने महंगाई को काबू करने और आर्थिक वृद्धि को सहारा देने का नाजुक संतुलन साधने की चुनौती है, जिसका बोझ अंततः सबसे गरीब तबके की रसोई पर ही पड़ेगा।

स्रोतों में मतभेद

अर्थव्यवस्था · 10 स्रोत · 1 भाषा

50%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक64%
न्यूनत्र7%
निंदक29%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa latinoamericana
Stampa europea continentale/ nordica
pragmatismodistacco

स्वीडन में अप्रैल में भोजन पर वैट 12 से घटाकर 6 प्रतिशत किए जाने के बाद खाद्य कीमतों में स्पष्ट गिरावट आई है। पेंशनभोगियों की टोकरी की कीमत एक साल में छह प्रतिशत से अधिक घट गई, हालाँकि देश के विभिन्न हिस्सों के बीच बड़ी मूल्य असमानताएँ बनी हुई हैं।

Stampa latinoamericana/ mercato
allarmescetticismo

पूरे लैटिन अमेरिका में सूखे, भारी बारिश और आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य महंगाई बढ़ रही है। अर्जेंटीना में चार लोगों के परिवार को मई में गरीबी रेखा से ऊपर रहने के लिए करीब 15 लाख पेसो की जरूरत पड़ी, जबकि कोलंबिया की मूल मुद्रास्फीति फिर से 6 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे केंद्रीय बैंक की दर नीति पर संदेह पैदा हो गया है।

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