
यूएई ने अमेरिका-ईरान समझौते पर पूर्ण अनुपालन की अपील की, हरमुज मार्ग की सुगमता पर बल
युद्धविराम के बाद खाड़ी देशों ने कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के सख्त पालन को क्षेत्रीय स्थिरता का आधार बताते हुए भारत जैसी ऊर्जा-आयातक अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत के संकेत दिए।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त करने वाले प्रारंभिक समझौता ज्ञापन की घोषणा के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने सबसे पहले और सबसे स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। अबू धाबी ने बातचीत, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को क्षेत्रीय सुरक्षा की आधारशिला बताते हुए इस समझौते की सभी शर्तों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने का आह्वान किया है। विदेश मंत्रालय के बयान में तत्काल और व्यापक रूप से शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों पर रोक, राज्यों की संप्रभुता का सम्मान, अच्छे पड़ोसी सिद्धांतों का पालन और समुद्री गलियारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। यह ऐसे समय में आया है जब छह सप्ताह से अधिक चले सैन्य टकराव ने खाड़ी की अर्थव्यवस्थाओं को गहरा झटका दिया था।
यूएई का जोर विशेष रूप से हरमुज जलडमरूमध्य में निर्बाध आवाजाही पर है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार की जीवन रेखा है। युद्ध के दौरान ईरानी हमलों ने यूएई से जुड़े जहाजरानी और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया, जिससे अबू धाबी को प्रत्यक्ष क्षति उठानी पड़ी। खाड़ी क्षेत्र के लिए यह मार्ग न केवल तेल और गैस निर्यात का प्रमुख रास्ता है, बल्कि एशिया और यूरोप के बीच कारोबार का भी अहम जरिया है। यूएई ने अपनी संप्रभुता की रक्षा “दृढ़ता और सक्षमता” से करने की बात कहते हुए यह भी रेखांकित किया कि उसने युद्ध को टालने के लिए राजनयिक और विश्वसनीय प्रयास किए, जिससे देश पहले से अधिक मजबूत और आत्मविश्वास से भरा उभरा है। राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार डॉ. अनवर गरगाश ने सोशल मीडिया पर यह संदेश साझा किया।
यह रुख केवल खाड़ी तक सीमित नहीं है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच हुए इस समझौता ज्ञापन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली कूटनीति की भूमिका की सराहना करते हुए यूएई ने अन्य संबंधित पक्षों के योगदान को भी स्वीकार किया है। यह इस बात का संकेत है कि समझौते की जमीन तैयार करने में ओमान, कतर या तुर्की जैसे मध्यस्थों की भी सक्रियता रही होगी। हालाँकि, असली परीक्षा तो अनुपालन और स्थायी नतीजों की होगी, जिसके लिए खाड़ी देश लगातार दबाव बनाए रखने के पक्षधर हैं।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री कारोबार के नजरिए से बेहद अहम है। भारत अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर प्राप्त करता है और हालिया युद्ध के दौरान जहाजरानी बीमा और माल ढुलाई की लागत में भारी उछाल देखा गया था। स्थायी शांति न केवल आपूर्ति श्रृंखलाओं को सामान्य करेगी, बल्कि चाबहार और दुकम जैसी वैकल्पिक परियोजनाओं पर अनिश्चितता के बादल भी हटाएगी। फिलहाल खाड़ी से आ रहे सकारात्मक संकेत पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के लिए आर्थिक उम्मीदों को फिर से हरा करने का मौका देते हैं, बशर्ते पक्ष समझौते की भावना के अनुरूप व्यवहार करें और बातचीत को अगले ठोस चरण तक ले जाएँ।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका-ईरान समझौते के पूर्ण अनुपालन और शत्रुता की तत्काल समाप्ति तथा समुद्री मार्गों की सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया। बयान में समझौते तक पहुँचने में शामिल पक्षों के योगदान को स्वीकार किया गया।
संयुक्त अरब अमीरात ने राजनयिक मार्ग की सराहना की जिससे युद्ध टला और वह और मजबूत तथा सहनशील बनकर उभरा। उसने समझौते के पूर्ण अनुपालन और होर्मुज जलडमरूमध्य में निर्बाध यातायात पर जोर दिया ताकि क्षेत्रीय आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित हो सके।
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