
वैश्विक अर्थव्यवस्था में चुनौतियाँ: भारत, बांग्लादेश, कोलंबिया और युगांडा के बजट और सुधारों पर नज़र
भारत में आर्थिक सुस्ती, बांग्लादेश में महत्वाकांक्षी बजट, कोलंबिया में राजकोषीय संकट और युगांडा में तेल आधारित विकास की उम्मीदें — विभिन्न देशों की आर्थिक चुनौतियों का एक सिंहावलोकन।
भारत में आर्थिक सुस्ती के संकेत स्पष्ट हैं: रुपया कमजोर है, पूंजी पलायन हो रहा है, निजी निवेश ठप है, और उपभोग मांग सुस्त है। रामचंद्र गुहा जैसे विश्लेषकों के अनुसार, मोदी सरकार को इन चुनौतियों से निपटने के लिए तत्काल सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि सरकार इस दिशा में गंभीर है। शेयर बाजार भी दो साल पहले के स्तर पर है, जो अर्थव्यवस्था की खराब सेहत का संकेत है।
बांग्लादेश में, बीएनपी सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया है, जिसे जनतुष्टिमूलक बताया जा रहा है। 9.38 लाख करोड़ टका के इस बजट में 6.5% विकास दर का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बैंकिंग क्षेत्र की खराब स्थिति और राजस्व का कमजोर आधार इसे चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। बजट में पूंजी बाजार को मजबूत करने के उपायों का स्वागत किया गया है, लेकिन घाटा 2.43 लाख करोड़ टका रहने का अनुमान है, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को बैंकों पर निर्भर रहना होगा। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बजट में सुधारों की बात तो की गई है, लेकिन उन्हें लागू करने का रास्ता स्पष्ट नहीं है।
कोलंबिया में, अगली सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती राजकोषीय घाटे को कम करना होगा, जो वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7% है। विशेषज्ञों का कहना है कि विकास दर बढ़ाने और खर्च में कटौती करने की तत्काल आवश्यकता है। निवेश दर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 15% है, जबकि इसे 22-23% तक पहुंचाना चाहिए। सरकार द्वारा प्रस्तुत मध्यम अवधि के राजकोषीय ढांचे को कुछ विशेषज्ञों ने 'धुआं और खुशहाल आंकड़े' बताते हुए खारिज कर दिया है। जुलाई में बांड पर 4,200-4,400 मिलियन डॉलर के भुगतान के लिए सरकार ने एक विविध रणनीति तैयार की है, जिसमें बोनर 2028 की नीलामी से 300 मिलियन डॉलर जुटाना शामिल है।
युगांडा में, सरकार ने 84.4 ट्रिलियन शिलिंग का बजट पेश किया है, जिसमें 10.2% की विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। यह विकास तेल उत्पादन, बुनियादी ढांचा, कृषि और औद्योगिक विस्तार पर आधारित है। वित्त मंत्री हेनरी मुसासिजी ने कहा कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, मुद्रास्फीति कम है, और निवेश बढ़ रहा है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि क्या ये लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
कुल मिलाकर, विभिन्न देशों की आर्थिक चुनौतियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन एक समानता यह है कि सभी को राजकोषीय अनुशासन, सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। भारत में सुधारों की कमी, बांग्लादेश में बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरी, कोलंबिया में राजकोषीय असंतुलन और युगांडा में तेल पर निर्भरता — ये सभी मुद्दे आने वाले वर्षों में इन देशों की आर्थिक दिशा तय करेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The Indian subcontinental press echoes Guha's critique of the Modi-Shah government, highlighting economic stagnation, capital flight, and failure to implement structural reforms. It contrasts electoral promises with anemic growth, expressing disappointment in current leadership. The analysis focuses on banking sector weaknesses and lack of private investment, painting a picture of urgent need for reform.
Market-oriented Latin American press interprets Guha's critique as a warning for countries facing similar challenges: fiscal deficits, public debt, and need for reforms. It stresses urgency to stabilize public finances and attract investment, with an alarmed yet pragmatic tone. The piece links India's situation to Latin America's structural problems, suggesting that without decisive reforms, growth will remain elusive.
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