
जलवायु परिवर्तन ने यूरोप की लू को बनाया 50 साल पहले असंभव: अध्ययन
वैज्ञानिकों ने पाया कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के बिना जून की यह भीषण गर्मी लगभग असंभव थी, और रात का तापमान अब 2003 की तुलना में 100 गुना अधिक संभावित है।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) समूह के एक तीव्र अध्ययन के अनुसार, इस जून में पश्चिमी और मध्य यूरोप को झुलसाने वाली रिकॉर्ड-तोड़ लू मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के बिना व्यावहारिक रूप से असंभव थी। शोधकर्ताओं ने वर्तमान तापमान आंकड़ों की तुलना 1976 और 2003 की ऐतिहासिक लू घटनाओं से की और पाया कि 1976 की जलवायु में ऐसी ही लू दिन में 3.5 डिग्री सेल्सियस और रात में 2.4 डिग्री सेल्सियस कम गर्म होती। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 30 यूरोपीय देशों के 854 शहरों में से 45 प्रतिशत ने ‘वेट-बल्ब ग्लोब तापमान’ (गर्मी और आर्द्रता से शरीर पर पड़ने वाले तनाव का माप) के नए रिकॉर्ड या तो तोड़ दिए हैं या जल्द ही तोड़ने वाले हैं।
इस अभूतपूर्व गर्मी का तंत्र स्पष्ट है: जीवाश्म ईंधनों के जलने और वनों की कटाई से पिछले 50 वर्षों में ग्रह का औसत तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। WWA के वैज्ञानिकों ने गणना की कि वर्ष 2003 की घातक लू की तुलना में अब रात का अत्यधिक गर्म होना लगभग 100 गुना अधिक संभावित हो गया है, जबकि दिन का चरम तापमान 10 गुना अधिक संभावित है। अफ्रीका से आई गर्म हवा और ऊपरी वायुमंडल में उच्च दबाव के ‘हीट डोम’ पैटर्न को असामान्य नहीं माना गया, लेकिन तापमान का स्तर अब मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के कारण सामान्य सीमा से कहीं अधिक है। शोधकर्ताओं ने अल नीनो जैसे प्राकृतिक चक्रों की कोई भूमिका नहीं पाई।
यूरोप दुनिया का सबसे तेज़ी से गर्म होता महाद्वीप है, जहाँ 1980 के दशक से तापमान वैश्विक औसत से दोगुनी गति से बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पिछले चार वर्षों में यूरोप में गर्मी-संबंधी कारणों से 2 लाख से अधिक मौतें हुई हैं, और 2022 की गर्मियों में अकेले 60,000 लोगों की जान गई। इस बार फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और ब्रिटेन में स्कूल बंद करने पड़े, खेल आयोजन रद्द हुए और बिजली आपूर्ति बाधित हुई। रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट जलवायु केंद्र की शोधकर्ता कैरोलिना परेरा ने रेखांकित किया कि “बहुत से लोग अब भी ऐसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में रहते हैं जो इन तापमानों के लिए नहीं बने हैं।” फ्रांस में गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों-नहरों में डूबने की दर्जनों घटनाएँ सामने आईं।
यह अध्ययन तीव्र गति से जारी किया गया और अभी तक सहकर्मी-समीक्षा से नहीं गुज़रा है, लेकिन इसकी पद्धति वैज्ञानिक समुदाय द्वारा पहले से मान्य है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने कहा कि “कोयला, तेल और गैस जलाने की लत के कारण जलवायु परिवर्तन बेकाबू हो रहा है,” और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ने का आग्रह किया। दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम एक चेतावनी है: भारत और पड़ोसी देश पहले से ही घातक लू का सामना कर रहे हैं, और एट्रिब्यूशन अध्ययनों से पुष्टि होती है कि यहाँ भी जोखिम तेज़ी से बढ़ रहा है। अगला ठोस कदम राष्ट्रीय स्तर पर शीतलन अवसंरचना, ताप कार्य योजनाओं का विस्तार और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने की नीतियों का क्रियान्वयन होगा, जिसकी समीक्षा आगामी जलवायु वार्ताओं में होने की संभावना है।
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विज्ञान स्पष्ट है: जलवायु परिवर्तन ने इस गर्मी की लहर का कारण बना। संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।
एक प्रतिष्ठित आरोपण अध्ययन का हवाला देकर, लेख दावे को निर्विवाद वैज्ञानिक तथ्य के रूप में वैध बनाता है।
लेख में यूरोपीय सरकारों द्वारा अपनाए गए आपातकालीन उपायों का उल्लेख नहीं है, जो जलवायु संकट पर जोर को कम कर सकते हैं।
अत्यधिक गर्मी अधिकारियों से तत्काल कार्रवाई की मांग करती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम में है।
तत्काल परिणामों और आपातकालीन उपायों पर ध्यान केंद्रित करके, लेख संकट की भावना पैदा करता है जो राज्य के हस्तक्षेप को उचित ठहराता है।
लेख में गर्मी की लहर को जलवायु परिवर्तन से जोड़ने वाले जलवायु आरोपण अध्ययन को छोड़ दिया गया है, इस प्रकार दीर्घकालिक कारणों की चर्चा से बचा गया है।
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गर्मी को उपभोक्ता अवसर में बदलकर, लेख संरचनात्मक कारणों से ध्यान हटाकर व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर केंद्रित करता है।
लेख जलवायु आरोपण और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों दोनों को अनदेखा करता है, केवल व्यक्तिगत उपभोग पर ध्यान केंद्रित करता है।
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