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राजनीतिमंगलवार, 16 जून 2026

पेरू चुनाव: 99% मतगणना के बाद भी अनिश्चितता, कीको फुजीमोरी को बेहद मामूली बढ़त

विदेशी मतों ने कीको को बढ़त दिलाई, लेकिन 1,661 विवादित मतपत्रों और पुनर्मतगणना के कारण अंतिम परिणाम जुलाई मध्य तक टल सकता है।

पेरू के राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर की मतगणना 99 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी है, फिर भी देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा यह तय नहीं है। दक्षिणपंथी उम्मीदवार कीको फुजीमोरी को वामपंथी प्रतिद्वंद्वी रोबेर्तो सांचेज़ पर बेहद संकीर्ण बढ़त हासिल है, जो विभिन्न चरणों में 9,000 से लेकर 30,000 मतों के बीच रही। राष्ट्रीय चुनावी प्रक्रिया कार्यालय (ONPE) ने लगभग सभी मतपत्रों की गिनती कर ली है, लेकिन अंतिम निर्णय राष्ट्रीय चुनावी जूरी (JNE) के हाथ में है, जिसे 1,661 विवादित मतपत्रों (आक्तास ओब्सेर्वादास) का निपटारा करना है और तीन विदेशी शहरों में पुनर्मतगणना के आदेश दिए गए हैं। चुनाव प्रवक्ता के अनुसार, आधिकारिक घोषणा जुलाई के मध्य तक ही संभव हो पाएगी, जो 28 जुलाई को शपथ ग्रहण से लगभग दो सप्ताह पहले का समय है।

यह कड़ा मुकाबला पूर्व तानाशाह अल्बेर्तो फुजीमोरी की बेटी कीको और वाम गठबंधन ‘खुन्तोस पोर एल पेरू’ के सांचेज़ के बीच 7 जून को हुए मतदान के बाद से जारी है। आरंभिक रुझानों में सांचेज़ को घरेलू मतों में स्पष्ट बढ़त मिली थी, लेकिन जैसे-जैसे विदेशी मतपत्रों की गिनती आगे बढ़ी, कीको ने बढ़त बना ली। 11 जून तक वह लगभग 18,300 मतों से आगे थीं, और 15 जून की रात तक यह अंतर बढ़कर 30,921 मतों तक पहुंच गया। हालांकि, कुछ अपडेट में यह अंतर घटकर महज 9,000 रह गया, जो दर्शाता है कि हर नए आंकड़े के साथ समीकरण बदल रहे हैं। विदेशी मतदाताओं, खासकर अमेरिका और यूरोप में बसे पेरूवासियों ने भारी संख्या में कीको का समर्थन किया, जबकि देश के भीतर सांचेज़ को ग्रामीण और दक्षिणी क्षेत्रों से अधिक वोट मिले।

संस्थागत दृष्टि से देखें तो ONPE की भूमिका मतगणना तक सीमित है, जबकि विवादों के निपटारे और अंतिम प्रमाणन का अधिकार JNE के पास है। 1,661 विवादित मतपत्र ऐसे हैं जिनमें हस्ताक्षर मिलान, मतदाता पहचान या प्रक्रियागत त्रुटियों पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। इनके अलावा, तीन विदेशी शहरों—जिनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए—में पूर्ण पुनर्मतगणना का आदेश दिया गया है। ये कदम चुनाव की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए उठाए गए हैं, लेकिन इन्हीं के चलते परिणाम में हफ्तों का विलंब हो रहा है। दोनों खेमों ने अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण गहराने की आशंका है।

यह चुनावी गतिरोध पेरू की राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा को आगे बढ़ाता है, जहां हाल के वर्षों में कई राष्ट्रपति भ्रष्टाचार या संसदीय टकराव के कारण पद छोड़ चुके हैं। नई सरकार 2026-2031 के कार्यकाल के लिए शपथ लेगी, लेकिन इतने कम अंतर से जीतने वाले नेता के सामने शासन की चुनौती बड़ी होगी। कीको के समर्थक उदार आर्थिक नीतियों की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि सांचेज़ संविधान सभा और सामाजिक खर्च बढ़ाने का वादा कर चुके हैं। दक्षिण एशिया के लिए पेरू प्रशांत गठबंधन और खनिज व्यापार में एक महत्वपूर्ण साझेदार है; भारत जैसे देशों की नजर स्थिरता पर टिकी होगी, क्योंकि राजनीतिक अनिश्चितता निवेश और तांबा-सोने जैसे संसाधनों की आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

आगे का रास्ता कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। JNE के निर्णय के बाद भी, हारने वाला पक्ष संवैधानिक अदालत का रुख कर सकता है, जिससे अनिश्चितता और बढ़ सकती है। लैटिन अमेरिका में वाम-दक्षिण संतुलन पर भी इस चुनाव का असर पड़ेगा, क्योंकि क्षेत्र में पहले से ही वैचारिक ध्रुवीकरण गहरा है। फिलहाल पेरू के मतदाता और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक जूरी के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो महज कुछ हजार मतों के अंतर से देश की दशा और दिशा तय करेगा।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa giapponese-coreana
Stampa latinoamericana/ mercato
pragmatismodistacco

दक्षिणपंथी उम्मीदवार कीको फुजीमोरी ने अपनी बढ़त को लगभग 30,000 वोटों तक बढ़ा दिया है, 99% मतपत्रों की गिनती के साथ। अंतिम परिणाम अभी भी कुछ विवादित मतगणना पत्रकों की समीक्षा पर निर्भर है, लेकिन अंतर धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।

Stampa giapponese-coreana
distaccopragmatismo

98.5% से अधिक वोटों की गिनती के साथ, कीको फुजीमोरी केवल 18,478 मतों या 0.1 प्रतिशत अंक से आगे हैं। यह हाल के लैटिन अमेरिकी इतिहास के सबसे करीबी चुनावों में से एक है।

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पेरू चुनाव: 99% मतगणना के बाद भी अनिश्चितता, कीको फुजीमोरी को बेहद मामूली बढ़त

विदेशी मतों ने कीको को बढ़त दिलाई, लेकिन 1,661 विवादित मतपत्रों और पुनर्मतगणना के कारण अंतिम परिणाम जुलाई मध्य तक टल सकता है।

पेरू के राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर की मतगणना 99 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी है, फिर भी देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा यह तय नहीं है। दक्षिणपंथी उम्मीदवार कीको फुजीमोरी को वामपंथी प्रतिद्वंद्वी रोबेर्तो सांचेज़ पर बेहद संकीर्ण बढ़त हासिल है, जो विभिन्न चरणों में 9,000 से लेकर 30,000 मतों के बीच रही। राष्ट्रीय चुनावी प्रक्रिया कार्यालय (ONPE) ने लगभग सभी मतपत्रों की गिनती कर ली है, लेकिन अंतिम निर्णय राष्ट्रीय चुनावी जूरी (JNE) के हाथ में है, जिसे 1,661 विवादित मतपत्रों (आक्तास ओब्सेर्वादास) का निपटारा करना है और तीन विदेशी शहरों में पुनर्मतगणना के आदेश दिए गए हैं। चुनाव प्रवक्ता के अनुसार, आधिकारिक घोषणा जुलाई के मध्य तक ही संभव हो पाएगी, जो 28 जुलाई को शपथ ग्रहण से लगभग दो सप्ताह पहले का समय है।

यह कड़ा मुकाबला पूर्व तानाशाह अल्बेर्तो फुजीमोरी की बेटी कीको और वाम गठबंधन ‘खुन्तोस पोर एल पेरू’ के सांचेज़ के बीच 7 जून को हुए मतदान के बाद से जारी है। आरंभिक रुझानों में सांचेज़ को घरेलू मतों में स्पष्ट बढ़त मिली थी, लेकिन जैसे-जैसे विदेशी मतपत्रों की गिनती आगे बढ़ी, कीको ने बढ़त बना ली। 11 जून तक वह लगभग 18,300 मतों से आगे थीं, और 15 जून की रात तक यह अंतर बढ़कर 30,921 मतों तक पहुंच गया। हालांकि, कुछ अपडेट में यह अंतर घटकर महज 9,000 रह गया, जो दर्शाता है कि हर नए आंकड़े के साथ समीकरण बदल रहे हैं। विदेशी मतदाताओं, खासकर अमेरिका और यूरोप में बसे पेरूवासियों ने भारी संख्या में कीको का समर्थन किया, जबकि देश के भीतर सांचेज़ को ग्रामीण और दक्षिणी क्षेत्रों से अधिक वोट मिले।

संस्थागत दृष्टि से देखें तो ONPE की भूमिका मतगणना तक सीमित है, जबकि विवादों के निपटारे और अंतिम प्रमाणन का अधिकार JNE के पास है। 1,661 विवादित मतपत्र ऐसे हैं जिनमें हस्ताक्षर मिलान, मतदाता पहचान या प्रक्रियागत त्रुटियों पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। इनके अलावा, तीन विदेशी शहरों—जिनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए—में पूर्ण पुनर्मतगणना का आदेश दिया गया है। ये कदम चुनाव की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए उठाए गए हैं, लेकिन इन्हीं के चलते परिणाम में हफ्तों का विलंब हो रहा है। दोनों खेमों ने अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण गहराने की आशंका है।

यह चुनावी गतिरोध पेरू की राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा को आगे बढ़ाता है, जहां हाल के वर्षों में कई राष्ट्रपति भ्रष्टाचार या संसदीय टकराव के कारण पद छोड़ चुके हैं। नई सरकार 2026-2031 के कार्यकाल के लिए शपथ लेगी, लेकिन इतने कम अंतर से जीतने वाले नेता के सामने शासन की चुनौती बड़ी होगी। कीको के समर्थक उदार आर्थिक नीतियों की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि सांचेज़ संविधान सभा और सामाजिक खर्च बढ़ाने का वादा कर चुके हैं। दक्षिण एशिया के लिए पेरू प्रशांत गठबंधन और खनिज व्यापार में एक महत्वपूर्ण साझेदार है; भारत जैसे देशों की नजर स्थिरता पर टिकी होगी, क्योंकि राजनीतिक अनिश्चितता निवेश और तांबा-सोने जैसे संसाधनों की आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

आगे का रास्ता कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। JNE के निर्णय के बाद भी, हारने वाला पक्ष संवैधानिक अदालत का रुख कर सकता है, जिससे अनिश्चितता और बढ़ सकती है। लैटिन अमेरिका में वाम-दक्षिण संतुलन पर भी इस चुनाव का असर पड़ेगा, क्योंकि क्षेत्र में पहले से ही वैचारिक ध्रुवीकरण गहरा है। फिलहाल पेरू के मतदाता और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक जूरी के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो महज कुछ हजार मतों के अंतर से देश की दशा और दिशा तय करेगा।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa giapponese-coreana
Stampa latinoamericana/ mercato
pragmatismodistacco

दक्षिणपंथी उम्मीदवार कीको फुजीमोरी ने अपनी बढ़त को लगभग 30,000 वोटों तक बढ़ा दिया है, 99% मतपत्रों की गिनती के साथ। अंतिम परिणाम अभी भी कुछ विवादित मतगणना पत्रकों की समीक्षा पर निर्भर है, लेकिन अंतर धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।

Stampa giapponese-coreana
distaccopragmatismo

98.5% से अधिक वोटों की गिनती के साथ, कीको फुजीमोरी केवल 18,478 मतों या 0.1 प्रतिशत अंक से आगे हैं। यह हाल के लैटिन अमेरिकी इतिहास के सबसे करीबी चुनावों में से एक है।

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