
हंगरी ने संविधान में जोड़ा 'एंटी-ऑर्बन संशोधन': प्रधानमंत्री पद के लिए अधिकतम आठ साल की सीमा, ऑर्बन की वापसी का रास्ता बंद
पीटर मग्यार की सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन को स्थायी रूप से सत्ता से बाहर रखने के लिए संविधान में ऐतिहासिक बदलाव किया, जो लोकतांत्रिक मर्यादा की बहाली का प्रतीक है।
हंगरी की संसद ने सोमवार शाम एक ऐतिहासिक संविधान संशोधन पारित किया, जिसके तहत अब कोई भी व्यक्ति अधिकतम आठ साल या दो कार्यकाल तक ही प्रधानमंत्री रह सकेगा। यह प्रावधान पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होगा, जिसका सीधा अर्थ है कि 16 साल तक लगातार शासन करने वाले विक्टर ऑर्बन दोबारा इस पद पर नहीं लौट सकते। नई सत्तारूढ़ पार्टी तिसा के 135 सांसदों ने संशोधन के पक्ष में मतदान किया, जबकि ऑर्बन की फिदेस पार्टी के 50 सदस्यों ने विरोध किया और छह ने मतदान से परहेज रखा। तिसा के पास अप्रैल के चुनावों में मिला दो-तिहाई बहुमत संविधान बदलने के लिए पर्याप्त था।
यह कदम प्रधानमंत्री पीटर मग्यार के उस चुनावी वादे को पूरा करता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि असीमित सत्ता हर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला कर देती है। मग्यार ने न केवल ऑर्बन की वापसी पर रोक लगाई, बल्कि उस संवैधानिक पहचान की रक्षा के नाम पर बनाए गए राज्य निकाय का संरक्षण भी समाप्त कर दिया, जिसका इस्तेमाल विपक्षी संगठनों और मीडिया की जांच के लिए किया जाता था। इसके अलावा, मग्यार सरकार ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से हटने के ऑर्बन के फैसले को पलट दिया और बुडापेस्ट के महापौर के साथ प्राइड परेड को लेकर सुलह कर ली—ये सब एक व्यवस्थित विध्वंस की ओर इशारा करते हैं।
यूरोपीय मीडिया में इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि कुछ विश्लेषकों ने विडंबना पर ध्यान दिलाया है कि मग्यार भी उसी दो-तिहाई बहुमत के हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे ऑर्बन ने वर्षों तक अपने पक्ष में भुनाया। जर्मन अखबार फ्रैंकफुर्टर आलगेमाइने और स्विस एनजेडजेड ने लिखा कि यह अपनी ही सत्ता को सीमित करने का दुर्लभ उदाहरण है। वहीं अमेरिकी पत्रिका टाइम ने तुर्की के रेचेप तैयप एर्दोआन से तुलना करते हुए रेखांकित किया कि ऑर्बन की हार ने साबित कर दिया कि अलोकतांत्रिक माहौल में भी ताकतवर नेता गिर सकते हैं। रूसी सेवा बीबीसी ने इसे सीधे 'एंटी-ऑर्बन पॉपरावका' का नाम दिया।
अब यह संशोधन राष्ट्रपति तमाश सुल्योक के हस्ताक्षर की प्रतीक्षा में है, जो ऑर्बन के करीबी माने जाते हैं, लेकिन संसदीय बहुमत के आगे उनके पास वीटो की गुंजाइश नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भविष्य में किसी भी नेता के हाथों सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ एक संस्थागत दीवार खड़ी करेगा। फिर भी, ऑर्बन अभी भी फिदेस के अध्यक्ष बने हुए हैं और उनका वैचारिक प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों के लिए, जहां लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की प्रवृत्ति पर अक्सर सवाल उठते हैं, हंगरी का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है कि चुनावी हार के बाद भी संवैधानिक अवरोध किसी तानाशाही प्रवृत्ति की वापसी को रोक सकते हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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हंगरी की संसद ने प्रधानमंत्री के कार्यकाल को अधिकतम आठ वर्ष तक सीमित करने वाला संवैधानिक संशोधन पारित किया, जिससे विक्टर ओर्बान की सत्ता में वापसी प्रभावी रूप से रुक गई। यह कदम पीटर मग्यार के नेतृत्व वाली नई सरकार ने उठाया, जिसने 16 वर्षों तक सत्ता में रहे ओर्बान को हटाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है।
हंगरी की संसद ने भारी बहुमत से प्रधानमंत्री के कार्यकाल को आठ वर्ष तक सीमित करने वाला संवैधानिक संशोधन पारित किया, जो रूढ़िवादी और यूरोपीय संघ समर्थक प्रधानमंत्री पीटर मग्यार के चुनावी वादे को पूरा करता है। यह सुधार राष्ट्रवादी पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की वापसी को रोकता है, जिन्होंने 16 वर्षों तक देश का नेतृत्व किया।
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