
हंगरी की संसद ने प्रधानमंत्री पद के लिए आठ वर्ष की सीमा तय की, ओर्बान की वापसी का रास्ता बंद
संविधान संशोधन के तहत अब कोई भी नेता कुल आठ साल से अधिक प्रधानमंत्री नहीं रह सकता, जो सीधे तौर पर विक्टर ओर्बान के राजनीतिक भविष्य पर प्रहार है।
हंगरी की संसद ने सोमवार को एक ऐतिहासिक संविधान संशोधन पारित किया, जो प्रधानमंत्री पद पर किसी भी व्यक्ति के कुल कार्यकाल को अधिकतम आठ वर्ष तक सीमित कर देता है। 135 मतों के भारी बहुमत से स्वीकृत यह संशोधन, 50 के विरोध और 6 अनुपस्थितियों के साथ, स्पष्ट रूप से पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की सत्ता में वापसी की किसी भी संभावना को समाप्त करने के लिए तैयार किया गया है। नए प्रावधान के अनुसार, यह सीमा 1990 के बाद प्रधानमंत्री रह चुके सभी नेताओं पर लागू होगी, और ओर्बान एकमात्र ऐसे पूर्व प्रधानमंत्री हैं जो 1998-2002 और 2010-2026 के बीच कुल 16 वर्षों तक इस पद पर रह चुके हैं।
यह संविधान संशोधन अप्रैल में हुए चुनावों में भारी जीत हासिल करने वाले प्रधानमंत्री पेटर माग्यार के प्रमुख चुनावी वादों में से एक था। यूरोपीय संघ समर्थक रूढ़िवादी नेता माग्यार ने ओर्बान की फिदेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया, जिससे वे संविधान सहित बड़े विधायी बदलाव करने में सक्षम हुए। माग्यार ने इसे 'शासन परिवर्तन' का हिस्सा बताया, जो हंगरी को ओर्बान के 16 वर्षों के राष्ट्रवादी शासन से दूर ले जाकर यूरोपीय मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास है।
दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री ओर्बान ने हाल ही में एक साक्षात्कार में अपनी सरकार पर लगे आरोपों का जवाब दिया। माग्यार ने पिछली सरकार पर ब्रसेल्स के साथ गुप्त समझौते के तहत हंगरी में प्रवासी शिविर बनाने की योजना का आरोप लगाया था, जिसे ओर्बान ने 'सबसे बड़ा झूठ' करार दिया। ओर्बान ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार ने ब्रसेल्स को 'चकमा देने' की रणनीति अपनाई थी, लेकिन जोर देकर कहा कि देश में कोई प्रवासी शिविर नहीं है और न ही कोई अवैध प्रवासी। यह बयान ओर्बान के उस राजनीतिक अंदाज को दर्शाता है जो लंबे समय तक हंगरी की घरेलू और यूरोपीय राजनीति का केंद्र रहा।
हंगरी का यह कदम यूरोपीय संघ के साथ संबंधों में एक नए अध्याय का संकेत देता है। ओर्बान के कार्यकाल में ब्रसेल्स के साथ लगातार तनाव, विशेषकर प्रवासन और कानून के शासन पर, ने हंगरी को अलग-थलग कर दिया था। माग्यार सरकार अब उसी संविधान संशोधन के जरिए ओर्बान द्वारा स्थापित 'संप्रभुता संरक्षण कार्यालय' को भी भंग करने की राह खोल रही है, जिसकी यूरोपीय संघ में व्यापक आलोचना हुई थी। यह संस्थागत सफाया हंगरी को यूरोपीय मूल्यों के करीब लाने और ब्रसेल्स से जमे हुए धन को मुक्त कराने की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, यह घटनाक्रम दर्शाता है कि किस प्रकार लोकतांत्रिक संस्थाएं लंबे समय तक सत्ता में रहे नेताओं के प्रभाव को संवैधानिक उपायों से सीमित कर सकती हैं। भारत जैसे देशों के लिए, जहां कार्यकाल सीमा पर बहस समय-समय पर उठती रही है, हंगरी का यह मॉडल एक दिलचस्प उदाहरण प्रस्तुत करता है। हालांकि, हंगरी में यह बदलाव एक मजबूत विपक्षी जनादेश के बाद संभव हुआ, जो दर्शाता है कि संविधान संशोधन अक्सर राजनीतिक शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव के बाद ही संभव होते हैं। आने वाले वर्षों में, माग्यार सरकार के सामने आर्थिक सुधारों और यूरोपीय संघ के साथ विश्वास बहाली की दोहरी चुनौती होगी, जबकि ओर्बान की फिदेस पार्टी विपक्ष में बैठकर नई राजनीतिक वास्तविकता के अनुकूल ढलने का प्रयास करेगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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हंगरी की संसद ने प्रधानमंत्री के कार्यकाल को अधिकतम आठ वर्ष तक सीमित करने वाला संवैधानिक संशोधन पारित किया, जिससे विक्टर ओर्बान की सत्ता में वापसी प्रभावी रूप से रुक गई। यह कदम पीटर मग्यार के नेतृत्व वाली नई सरकार ने उठाया, जिसने 16 वर्षों तक सत्ता में रहे ओर्बान को हटाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है।
हंगरी की संसद ने भारी बहुमत से प्रधानमंत्री के कार्यकाल को आठ वर्ष तक सीमित करने वाला संवैधानिक संशोधन पारित किया, जो रूढ़िवादी और यूरोपीय संघ समर्थक प्रधानमंत्री पीटर मग्यार के चुनावी वादे को पूरा करता है। यह सुधार राष्ट्रवादी पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की वापसी को रोकता है, जिन्होंने 16 वर्षों तक देश का नेतृत्व किया।
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