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राजनीतिमंगलवार, 16 जून 2026

लुकाशेंको का बड़ा खुलासा: वैटिकन और इज़राइली लॉबी ने 2022 में रूस को धोखा देकर युद्ध लंबा खींचा

बेलारूस के राष्ट्रपति ने अल अरबिया को दिए साक्षात्कार में कीव से रूसी सेना हटाने के पीछे वैटिकन और यहूदी लॉबी की साजिश का आरोप लगाया, साथ ही यूक्रेन को बेलारूस से किसी खतरे से इनकार किया और समझौते की पैरवी की।

बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ांडर लुकाशेंको ने एक विस्फोटक दावे में कहा है कि 2022 में रूसी सेना की कीव पर तेज़ जीत को वैटिकन और इज़राइली-यहूदी लॉबी ने जानबूझकर विफल कर दिया। अल अरबिया टेलीविज़न को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि तत्कालीन यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के नाम पर इन ताकतों ने शांति वार्ता और समझौते का झूठा आश्वासन देकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को सेना पीछे हटाने के लिए राज़ी कर लिया। लुकाशेंको के अनुसार, यदि मॉस्को उस समय आगे बढ़ता तो “वहाँ न ज़ेलेंस्की बचते, न कोई और”, लेकिन पुतिन ने मानवीय क्षति और युद्ध के अपेक्षित परिदृश्य से भटकने को देखते हुए कदम पीछे खींच लिए, जिसके बाद वे वादे कभी पूरे नहीं हुए।

इसी साक्षात्कार में लुकाशेंको ने यूक्रेन को आश्वस्त किया कि बेलारूस से उसे “बिल्कुल कोई खतरा नहीं” है। उन्होंने कहा कि उन्होंने पुतिन के साथ कई बार इस मुद्दे पर चर्चा की है और दोनों इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि बेलारूस का युद्ध में शामिल होना “बिल्कुल अस्वीकार्य” है, इससे फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान होगा। लुकाशेंको ने बेलारूस की सैन्य दृष्टि से संवेदनशीलता का हवाला देते हुए कहा कि उसके महत्वपूर्ण ठिकाने यूक्रेनी सेना की निगाह में “हथेली की तरह साफ़” हैं। ज़ेलेंस्की द्वारा बेलारूस पर हमले की धमकियों पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जैसा गाओगे, वैसा ही अंतिम संस्कार होगा” वाली कहावत याद रखनी चाहिए, हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शायद उनका जवाब कुछ ज़्यादा कठोर हो गया था।

लुकाशेंको ने युद्ध के भविष्य पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि दोनों पक्षों के लिए युद्धक्षेत्र में पूर्ण विजय अवास्तविक है और समझौता ही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि रूस और यूक्रेन ही नहीं, बल्कि यूरोपीय नेताओं को भी समझ लेना चाहिए कि स्थिति गतिरोध में फँस चुकी है और आगे बढ़ने का अर्थ परमाणु संघर्ष तक की भयावह वृद्धि हो सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ज़ेलेंस्की के पास अब लोगों की भारी कमी है और पश्चिम भी उन्हें हथियारों के बजाय मोर्चे पर जवान भेजने की सलाह दे रहा है। साथ ही उन्होंने यह आकलन पेश किया कि नाटो और अमेरिका के लिए यूक्रेन में सीधे हस्तक्षेप करना फ़ायदेमंद नहीं है, क्योंकि इससे यूरोप और पूरी दुनिया के विनाश का ख़तरा पैदा हो जाएगा; केवल कुछ गिने-चुने गठबंधन देश ही आग भड़काने में लगे हैं।

दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम कई स्तरों पर अहम है। लुकाशेंको का यह खुलासा उस दौर की याद दिलाता है जब इस्तांबुल वार्ता के ज़रिए शांति की उम्मीद जगी थी और भारत ने बातचीत का लगातार समर्थन किया था। आज जब युद्ध चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं पर इसका दबाव पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। भारत की तटस्थ कूटनीति, जो रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम के साथ बढ़ती साझेदारी के बीच संतुलन साधती है, ऐसे किसी भी शांति प्रयास में मध्यस्थ की भूमिका के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। लुकाशेंको ने स्वयं वाशिंगटन के साथ बेहतर होते संबंधों और डोनाल्ड ट्रंप से संभावित मुलाकात का ज़िक्र कर यह संकेत दिया कि कूटनीतिक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि लुकाशेंको का यह साक्षात्कार केवल अतीत की व्याख्या नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक रणनीतिक संदेश भी है। एक ओर वह रूस के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में मॉस्को की नाराज़गी को वैटिकन और इज़राइल जैसे अप्रत्याशित पक्षों की ओर मोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर मिन्स्क को युद्ध से बाहर रखने की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित कर रहे हैं। उनका समझौते का आह्वान और यह स्वीकारोक्ति कि दोनों सेनाओं के सामने जनशक्ति का संकट है, यह दर्शाता है कि लंबे संघर्ष ने सभी पक्षों को थका दिया है। ऐसे में भारत जैसी उभरती शक्तियों के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है कि वे वैश्विक स्थिरता की दिशा में ठोस पहल की माँग करें और बहुपक्षीय मंचों पर शांति का रोडमैप तैयार करने में योगदान दें।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa russa e CSIStampa cinese
Stampa russa e CSI
scetticismopragmatismo

बेलारूसी राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि वैटिकन और इज़राइली लॉबी ने पुतिन को धोखा दिया, जिससे युद्ध लंबा खिंच गया। उनका कहना है कि रूस जल्दी जीत सकता था, लेकिन बाहरी ताकतों ने शांति वार्ता को पटरी से उतार दिया। फिर भी वह समझौते की अपील करते हैं, चेतावनी देते हैं कि मिन्स्क के सीधे हस्तक्षेप से यह नाटो के साथ युद्ध बन जाएगा।

Stampa cinese
pragmatismodistacco

पुतिन के करीबी सहयोगी बेलारूस के राष्ट्रपति ने रूस और यूक्रेन से समझौता करने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि युद्धक्षेत्र में जीत दोनों पक्षों के लिए अवास्तविक है। एक साक्षात्कार में, उन्होंने वाशिंगटन के साथ बेहतर होते संबंधों पर जोर दिया और अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात की संभावना से इनकार नहीं किया, बाहरी हस्तक्षेप के दावों को कम महत्व दिया।

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लुकाशेंको का बड़ा खुलासा: वैटिकन और इज़राइली लॉबी ने 2022 में रूस को धोखा देकर युद्ध लंबा खींचा

बेलारूस के राष्ट्रपति ने अल अरबिया को दिए साक्षात्कार में कीव से रूसी सेना हटाने के पीछे वैटिकन और यहूदी लॉबी की साजिश का आरोप लगाया, साथ ही यूक्रेन को बेलारूस से किसी खतरे से इनकार किया और समझौते की पैरवी की।

बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ांडर लुकाशेंको ने एक विस्फोटक दावे में कहा है कि 2022 में रूसी सेना की कीव पर तेज़ जीत को वैटिकन और इज़राइली-यहूदी लॉबी ने जानबूझकर विफल कर दिया। अल अरबिया टेलीविज़न को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि तत्कालीन यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के नाम पर इन ताकतों ने शांति वार्ता और समझौते का झूठा आश्वासन देकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को सेना पीछे हटाने के लिए राज़ी कर लिया। लुकाशेंको के अनुसार, यदि मॉस्को उस समय आगे बढ़ता तो “वहाँ न ज़ेलेंस्की बचते, न कोई और”, लेकिन पुतिन ने मानवीय क्षति और युद्ध के अपेक्षित परिदृश्य से भटकने को देखते हुए कदम पीछे खींच लिए, जिसके बाद वे वादे कभी पूरे नहीं हुए।

इसी साक्षात्कार में लुकाशेंको ने यूक्रेन को आश्वस्त किया कि बेलारूस से उसे “बिल्कुल कोई खतरा नहीं” है। उन्होंने कहा कि उन्होंने पुतिन के साथ कई बार इस मुद्दे पर चर्चा की है और दोनों इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि बेलारूस का युद्ध में शामिल होना “बिल्कुल अस्वीकार्य” है, इससे फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान होगा। लुकाशेंको ने बेलारूस की सैन्य दृष्टि से संवेदनशीलता का हवाला देते हुए कहा कि उसके महत्वपूर्ण ठिकाने यूक्रेनी सेना की निगाह में “हथेली की तरह साफ़” हैं। ज़ेलेंस्की द्वारा बेलारूस पर हमले की धमकियों पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जैसा गाओगे, वैसा ही अंतिम संस्कार होगा” वाली कहावत याद रखनी चाहिए, हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शायद उनका जवाब कुछ ज़्यादा कठोर हो गया था।

लुकाशेंको ने युद्ध के भविष्य पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि दोनों पक्षों के लिए युद्धक्षेत्र में पूर्ण विजय अवास्तविक है और समझौता ही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि रूस और यूक्रेन ही नहीं, बल्कि यूरोपीय नेताओं को भी समझ लेना चाहिए कि स्थिति गतिरोध में फँस चुकी है और आगे बढ़ने का अर्थ परमाणु संघर्ष तक की भयावह वृद्धि हो सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ज़ेलेंस्की के पास अब लोगों की भारी कमी है और पश्चिम भी उन्हें हथियारों के बजाय मोर्चे पर जवान भेजने की सलाह दे रहा है। साथ ही उन्होंने यह आकलन पेश किया कि नाटो और अमेरिका के लिए यूक्रेन में सीधे हस्तक्षेप करना फ़ायदेमंद नहीं है, क्योंकि इससे यूरोप और पूरी दुनिया के विनाश का ख़तरा पैदा हो जाएगा; केवल कुछ गिने-चुने गठबंधन देश ही आग भड़काने में लगे हैं।

दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम कई स्तरों पर अहम है। लुकाशेंको का यह खुलासा उस दौर की याद दिलाता है जब इस्तांबुल वार्ता के ज़रिए शांति की उम्मीद जगी थी और भारत ने बातचीत का लगातार समर्थन किया था। आज जब युद्ध चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं पर इसका दबाव पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। भारत की तटस्थ कूटनीति, जो रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम के साथ बढ़ती साझेदारी के बीच संतुलन साधती है, ऐसे किसी भी शांति प्रयास में मध्यस्थ की भूमिका के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। लुकाशेंको ने स्वयं वाशिंगटन के साथ बेहतर होते संबंधों और डोनाल्ड ट्रंप से संभावित मुलाकात का ज़िक्र कर यह संकेत दिया कि कूटनीतिक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि लुकाशेंको का यह साक्षात्कार केवल अतीत की व्याख्या नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक रणनीतिक संदेश भी है। एक ओर वह रूस के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में मॉस्को की नाराज़गी को वैटिकन और इज़राइल जैसे अप्रत्याशित पक्षों की ओर मोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर मिन्स्क को युद्ध से बाहर रखने की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित कर रहे हैं। उनका समझौते का आह्वान और यह स्वीकारोक्ति कि दोनों सेनाओं के सामने जनशक्ति का संकट है, यह दर्शाता है कि लंबे संघर्ष ने सभी पक्षों को थका दिया है। ऐसे में भारत जैसी उभरती शक्तियों के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है कि वे वैश्विक स्थिरता की दिशा में ठोस पहल की माँग करें और बहुपक्षीय मंचों पर शांति का रोडमैप तैयार करने में योगदान दें।

स्रोतों में मतभेद

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28%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक83%
न्यूनत्र17%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa russa e CSIStampa cinese
Stampa russa e CSI
scetticismopragmatismo

बेलारूसी राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि वैटिकन और इज़राइली लॉबी ने पुतिन को धोखा दिया, जिससे युद्ध लंबा खिंच गया। उनका कहना है कि रूस जल्दी जीत सकता था, लेकिन बाहरी ताकतों ने शांति वार्ता को पटरी से उतार दिया। फिर भी वह समझौते की अपील करते हैं, चेतावनी देते हैं कि मिन्स्क के सीधे हस्तक्षेप से यह नाटो के साथ युद्ध बन जाएगा।

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पुतिन के करीबी सहयोगी बेलारूस के राष्ट्रपति ने रूस और यूक्रेन से समझौता करने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि युद्धक्षेत्र में जीत दोनों पक्षों के लिए अवास्तविक है। एक साक्षात्कार में, उन्होंने वाशिंगटन के साथ बेहतर होते संबंधों पर जोर दिया और अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात की संभावना से इनकार नहीं किया, बाहरी हस्तक्षेप के दावों को कम महत्व दिया।

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