
ईरान: पेंशन निधि का मासिक घाटा 90 हजार अरब टोमन, सड़कों पर उतरे बुजुर्ग, सुधार की चेतावनी
सामाजिक सुरक्षा संस्था का खर्च 210 हजार अरब टोमन पहुंचा, जबकि प्रीमियम आय 120 हजार अरब भी नहीं—घाटे और महंगाई के बीच पेंशनभोगियों ने कई शहरों में विरोध प्रदर्शन किए।
ईरान की सामाजिक सुरक्षा संस्था (एसएसओ) हर महीने 210 हजार अरब टोमन खर्च कर रही है, लेकिन प्रीमियम वसूली से आय 120 हजार अरब से भी कम है। यह 90 हजार अरब का विशाल अंतर संगठन की वित्तीय सेहत पर सवाल खड़े कर रहा है। इसी बीच तेहरान, अहवाज, शुश, करमानशाह और गीलान समेत कई शहरों में पेंशनभोगी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने बढ़ती महंगाई, दवाओं के दामों में उछाल और पर्याप्त इलाज न मिलने के खिलाफ नारे लगाए। एसएसओ प्रमुख मुस्तफा सालारी ने माना कि सरकार पेंशन की गारंटी तो देती है, लेकिन ढांचागत सुधार न हुए तो सारा बोझ सरकार पर पड़ेगा और अर्थव्यवस्था में महंगाई फैल सकती है।
सालारी ने 12-सूत्रीय सुधार कार्यक्रम और 32 कार्यकारी योजनाओं का जिक्र किया, जो बिना श्रमिकों या नियोक्ताओं पर नया बोझ डाले घाटा शून्य कर सकती हैं। इनमें डिजिटलीकरण और स्मार्ट बीमा प्रणाली प्रमुख हैं, जिससे शाखाओं की संख्या घटेगी और सेवाएं घर बैठे मिलेंगी। संगठन ने राइड-हेलिंग ड्राइवरों और ऑनलाइन कामगारों को बीमा दायरे में लाने का भी बचाव किया—इसे राजस्व जुटाने का जरिया नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 29 का कानूनी दायित्व बताया। इधर, प्रदर्शनकारियों ने ‘जंगअफरोजी काफी है, हमारी थाली खाली है’ जैसे नारों से सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।
केवल ईरान ही नहीं, इंडोनेशिया की स्वास्थ्य सामाजिक सुरक्षा संस्था बीपीजेएस केशेहतन भी दावों के अनुपात को 108% तक पहुंचता देख रही है। वहां रोकथाम पर जोर दिया जा रहा है—उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियों की निगरानी के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सक्रिय किया गया है, ताकि भारी-भरकम इलाज खर्च को रोका जा सके। यह निवारक मॉडल एसएसओ के लिए भी सीख बन सकता है, क्योंकि इसका 40 हजार अरब टोमन मासिक इलाज पर खर्च हो रहा है। भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह चेतावनी है कि बढ़ती उम्र और आर्थिक झटकों से पेंशन कोष का संकट गहरा सकता है, जहां पहले से ईपीएफओ और ईएसआईसी संतुलन साध रहे हैं।
एसएसओ के सुधार प्रस्ताव सरकार और संसद की मंजूरी के इंतजार में हैं। डिजिटल परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं, लेकिन पेंशनभोगियों के साप्ताहिक प्रदर्शन रुकने के संकेत नहीं देते—वे कानूनी रूप से तय पेंशन वृद्धि की मांग कर रहे हैं। भारत के लिए ईरान की यह स्थिति अपने सामाजिक सुरक्षा ढांचे की दीर्घकालिक स्थिरता पर विचार करने का अवसर हो सकती है।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.80 | critical |
The Iranian government presents itself as the ultimate guarantor of the pension system, absorbing concerns with statements of stability and corrective measures.
It ascribes a paternal role to the state that protects citizens from crises, downplaying the deficit through trust in institutions.
It omits the street protests by retirees and the chronic resource shortfall, which emerge in independent reports.
Retirees are victims of an indifferent government, forced to protest for basic denied rights.
It emphasizes personal stories of hardship and protest imagery to generate empathy and moral condemnation, presenting the crisis as a matter of social justice.
It omits government guarantees and reform plans, as well as the macroeconomic context affecting the deficit.
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