
स्कूलों में मोबाइल पर रोक से घटी बेचैनी, समावेशी शिक्षा के नए सबूत
ब्राज़ील, अर्जेंटीना, जर्मनी और बांग्लादेश से आए ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि कक्षाओं में डिजिटल अनुशासन और समावेशी नीतियों से सीखने का माहौल बदल रहा है।
ढाका के महाखाली स्थित ब्रैक सेंटर के एक सभागार में मंगलवार को जब शोधकर्ताओं ने स्लाइड बदली, तो सामने आया कि पिछले तीन वर्षों में बांग्लादेश के 122 स्कूलों में दिव्यांग बच्चों की उपस्थिति 15 प्रतिशत बढ़ गई है। यह आंकड़ा ‘शिखबो सबाई’ (सब सीखेंगे) नामक एक समावेशी शिक्षा कार्यक्रम के मूल्यांकन का हिस्सा था, जिसे ब्रैक इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया। उसी दिन, हज़ारों किलोमीटर दूर ब्राज़ील की राजधानी ब्रासीलिया में शिक्षा मंत्रालय ने एक सर्वेक्षण जारी किया जिसमें 86 प्रतिशत स्कूल प्रबंधकों ने माना कि मोबाइल फ़ोन पर प्रतिबंध लगाने के बाद छात्रों की बेचैनी कम हुई है। अर्जेंटीना से ‘अप्रेंडर 2025’ परीक्षाओं के नतीजे आए, जिनमें 70 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी पढ़ने में अपेक्षित स्तर पर पहुँच गए। यूरोप में जर्मनी के मानवाधिकार संस्थान ने अभिभावकों के अनुभवों पर एक अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत ने ही यह महसूस किया कि उनका दिव्यांग बच्चा सामान्य स्कूल में उतना ही स्वीकार्य है जितना बिना दिव्यांगता वाले बच्चे।
ये चारों दृश्य एक ही वैश्विक क्षण को रेखांकित करते हैं: कक्षाओं में डिजिटल व्यवधान और सामाजिक बहिष्कार के ख़िलाफ़ ठोस नीतिगत प्रयोग अब आँकड़ों में दिखने लगे हैं। ब्राज़ील में क़ानून लागू होने से पहले 13 प्रतिशत स्कूलों में बिना रोक-टोक मोबाइल इस्तेमाल की अनुमति थी; अब ऐसी कोई छूट नहीं बची है। 62 प्रतिशत संस्थानों में फ़ोन बच्चों के बैग में रखे जाते हैं, 33 प्रतिशत उन्हें कार्यालय में जमा कराते हैं। सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत प्रबंधकों ने शारीरिक झगड़ों में कमी और 88 प्रतिशत ने साइबर बुलिंग में गिरावट दर्ज की। अर्जेंटीना के शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, ‘अल्फ़ा स्कूल’ कार्यक्रम के तहत सबसे कमज़ोर सामाजिक तबके के स्कूलों ने भाषा में 17.6 अंकों का सुधार करते हुए अंतर को कम किया।
यह बदलाव एक गहरे सांस्कृतिक तनाव को छूता है—सीखने में प्रौद्योगिकी की भूमिका और समावेश की वास्तविक कीमत। जर्मनी के अध्ययन में 68.7 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि अच्छी परिस्थितियाँ होतीं तो वे अपने दिव्यांग बच्चे को सामान्य स्कूल भेजना पसंद करते; फ़िलहाल विशेष स्कूल उनके लिए एक ‘मजबूरी का विकल्प’ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि शिक्षक समावेशी शिक्षा के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं और अभिभावकों को स्कूल परिवहन व सहायक जैसी व्यवस्थाएँ स्वयं करनी पड़ती हैं, जिससे ‘भागीदारी का निजीकरण’ हो रहा है। बांग्लादेश का ‘शिखबो सबाई’ कार्यक्रम इसके विपरीत एक समग्र मॉडल प्रस्तुत करता है: घर-घर जाकर पढ़ाई, फ़िज़ियोथेरेपी, शिक्षक प्रशिक्षण और सामुदायिक जागरूकता के ज़रिए दिव्यांग बच्चों के साथ होने वाली बुलिंग में 8 प्रतिशत की कमी आई और छात्राओं की परीक्षा भागीदारी बढ़ी।
इन नतीजों ने अलग-अलग समाजों में अलग-अलग प्रतिध्वनियाँ पैदा की हैं। ब्राज़ील की शिक्षा सचिव ने क़ानून को ‘जीवित’ बताया, क्योंकि यह समाज में पहले से मौजूद चिंता से मेल खाता था और राजनीतिक सहमति से तेज़ी से आत्मसात हुआ। अर्जेंटीना सरकार ने परीक्षा परिणामों को साक्ष्य-आधारित नीतियों की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया। ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मोहम्मद माहबुबुर रहमान ने आगाह किया कि दाता संस्थाओं के वित्तपोषण के बाद सरकारी स्तर पर इस मॉडल की स्थिरता सुनिश्चित करना ज़रूरी है। जर्मनी में अध्ययन की सह-लेखिका ने कहा कि स्कूल प्रवेश से पहले मिलने वाली परामर्श सेवाएँ अक्सर बच्चों को विशेष स्कूलों की ओर धकेलती हैं, जिससे अलगाव की प्रवृत्ति मज़बूत होती है।
ढाका के उसी सभागार में प्रोफ़ेसर नारायण चंद्र दास ने एक और तथ्य साझा किया—दिव्यांग लड़कियों पर कार्यक्रम का सकारात्मक प्रभाव लड़कों से अधिक रहा, और उनके परीक्षा देने की दर व घर पर पढ़ाई का समय उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। ब्राज़ील के एक स्कूल में घंटी बजने पर बच्चे अपने मोबाइल बैग में रखकर मैदान की ओर दौड़ पड़ते हैं। ये दोनों दृश्य एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: सीखने के लिए कभी-कभी स्क्रीन से दूरी और साथ की निकटता ज़रूरी होती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लैटिन अमेरिका में, शांत क्रांतियाँ ठोस परिणाम दे रही हैं। अर्जेंटीना में, 70% से अधिक छात्र पढ़ने के अपेक्षित स्तर तक पहुँच गए हैं और गणित में भी सुधार हो रहा है, जिसका श्रेय हाल की नीतियों को दिया जाता है। ब्राज़ील में, स्कूलों में मोबाइल फ़ोन पर प्रतिबंध को 92% संस्थानों ने अपना लिया है, और 86% प्रशासकों का कहना है कि छात्र कम चिंतित और अधिक सहभागी हो गए हैं।
जर्मनी में समावेशन पर एक अध्ययन से पता चलता है कि कई माता-पिता के लिए विशेष स्कूल एक 'अंतिम विकल्प' हैं क्योंकि मुख्यधारा के स्कूलों में पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। समावेशी शिक्षा का अधिकार व्यवहार में अधूरा रह जाता है, जो प्रणालीगत कमियों को उजागर करता है।
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