
एशियाई टीमों का विश्व कप में अजेय आगाज़, यूरोप और लैटिन अमेरिका की मुश्किलें बढ़ीं
2026 फीफा विश्व कप के पहले दौर में छह एशियाई देशों ने कोई हार नहीं झेली, जबकि ब्राजील और उरुग्वे जैसी दिग्गज टीमें जीत से वंचित रहीं।
2026 फीफा विश्व कप के शुरुआती मुकाबलों ने वैश्विक फुटबॉल के पारंपरिक सत्ता संतुलन को हिलाकर रख दिया है। अब तक मैदान में उतरी सभी छह एशियाई टीमें—जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ईरान, सऊदी अरब और कतर—अपने पहले मैच में अजेय रही हैं। जापान ने नीदरलैंड्स जैसी मजबूत यूरोपीय टीम को 2-2 की बराबरी पर रोका, जबकि दक्षिण कोरिया ने चेक गणराज्य को 2-1 से हराकर पूरे तीन अंक हासिल किए। ईरान ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 2-2 का ड्रॉ खेला और सऊदी अरब ने उरुग्वे को 1-1 की बराबरी पर रोककर बड़ा उलटफेर किया। ऑस्ट्रेलिया ने भी जीत दर्ज की, जबकि कतर ने अपना मुकाबला ड्रॉ कराया। यह पहली बार है जब एशियाई फुटबॉल परिसंघ (एएफसी) की इतनी सारी टीमों ने एक साथ विश्व कप के शुरुआती चरण में हार का मुंह नहीं देखा।
इसके ठीक उलट, यूरोप और दक्षिण अमेरिका की बड़ी टीमों का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। सात यूरोपीय टीमों में से केवल दो जीत दर्ज कर सकीं—जर्मनी ने कुराकाओ को 7-1 से रौंदा, लेकिन बाकी दिग्गज या तो ड्रॉ पर अटके या हार गए। दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल महासंघ (कोनमेबोल) की स्थिति और भी खराब रही: ब्राजील को मोरक्को के खिलाफ 1-1 की बराबरी से संतोष करना पड़ा, जबकि उरुग्वे सऊदी अरब के हाथों हारते-हारते बचा। अभी तक कोनमेबोल की कोई भी टीम जीत हासिल नहीं कर पाई है, जो विश्व कप इतिहास में एक दुर्लभ नजारा है।
यह सामूहिक नतीजे महज संयोग नहीं हैं, बल्कि एशियाई फुटबॉल के ढांचागत विकास की ओर इशारा करते हैं। पिछले एक दशक में जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया ने यूरोपीय लीगों में खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या बढ़ाई है, जबकि सऊदी अरब और कतर ने घरेलू लीग में भारी निवेश कर प्रतिस्पर्धी स्तर ऊंचा किया है। ईरान ने राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद अनुशासित रक्षापंक्ति और तेज पलटवार की अपनी पहचान बनाई है। इन टीमों की सफलता केवल एक मैच तक सीमित नहीं है—यह एएफसी के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो अब यूरोप और दक्षिण अमेरिका की टीमों को केवल सम्मानजनक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि हराने योग्य लक्ष्य मानता है।
दूसरी ओर, यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी टीमों की कठिनाइयाँ टूर्नामेंट के विस्तारित 48-टीम प्रारूप और भीषण गर्मी में खेले जा रहे मैचों से भी जुड़ी हो सकती हैं। ब्राजील के स्टार खिलाड़ी मोरक्को की संगठित रक्षा को भेदने में नाकाम रहे, जबकि उरुग्वे को सऊदी अरब के खिलाफ अंतिम क्षणों में बराबरी का गोल करना पड़ा। यूरोप की कई टीमें उन प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अंक गंवा रही हैं जिन्हें पहले ‘छोटी टीम’ समझा जाता था। इससे साफ है कि वैश्विक फुटबॉल का अंतर तेजी से घट रहा है और अब कोई भी मैच पूर्वानुमान के आधार पर नहीं जीता जा सकता।
आगे की राह में एशिया के पास अपनी इस ऐतिहासिक शुरुआत को और मजबूत करने का मौका है। जॉर्डन, उज्बेकिस्तान और इराक अभी अपना पहला मैच खेलने वाले हैं, और यदि वे भी अंक हासिल करते हैं तो एशियाई टीमों का समूह चरण में दबदबा और गहरा सकता है। हालांकि, असली परीक्षा अगले दौर में होगी, जब यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी टीमें अपनी रणनीति में सुधार करेंगी। फिलहाल, एशियाई फुटबॉल ने यह संदेश दे दिया है कि उसे हल्के में लेना अब किसी भी बड़ी टीम के लिए भारी पड़ सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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एशियाई टीमों ने 2026 विश्व कप के पहले दौर में इतिहास रच दिया है, छह देशों ने उच्च रैंकिंग वाले विरोधियों के खिलाफ हार से बचते हुए। यह सामूहिक प्रदर्शन वैश्विक फुटबॉल में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत देता है, जहां एशियाई अनुशासन और सामरिक तैयारी अब पुरानी सत्ता संरचनाओं को चुनौती दे रही है।
इस टूर्नामेंट में अभी तक किसी एशियाई टीम को हार का स्वाद नहीं चखना पड़ा है, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने पूरे अंक हासिल किए जबकि अन्य ने मजबूत विरोधियों को ड्रॉ पर रोका। इस अपराजित क्रम को महाद्वीप की बढ़ती फुटबॉल परिपक्वता का एक शांत लेकिन दृढ़ बयान माना जा रहा है।
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