
विश्व कप में पहचान का संगम: ज़िदान का बेटा अर्जेंटीना के सामने, भारतीय-पाकिस्तानी मूल के सितारे चमके
2026 फीफा विश्व कप में प्रवासी पहचान की कहानियाँ हावी हैं, जहाँ ज़िनेदिन ज़िदान का बेटा अल्जीरिया के लिए खेल रहा है और दक्षिण एशियाई मूल के खिलाड़ी न्यूज़ीलैंड व इराक का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
कैनसस सिटी में मंगलवार को जब अर्जेंटीना और अल्जीरिया विश्व कप के अपने पहले मैच में आमने-सामने होंगे, तो सबकी निगाहें एक अनोखे गोलकीपर पर टिकी होंगी। लूका ज़िदान, दिग्गज फ्रांसीसी चैंपियन ज़िनेदिन ज़िदान का बेटा, अल्जीरिया के गोल की रक्षा करते हुए लियोनेल मेसी जैसे दिग्गजों का सामना करेंगे। फ्रांस में जन्मे और वहीं की युवा टीमों में प्रशिक्षित लूका ने अपने पिता की विरासत से अलग राह चुनते हुए अल्जीरिया का प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया — वही देश जहाँ से उनके दादा-दादी आए थे। यह मैच महज एक खेल नहीं, बल्कि पहचान और जड़ों की ओर लौटने की एक मार्मिक कहानी है।
यह प्रवासी गाथा अकेली नहीं है। अल्जीरिया के कप्तान रियाद महरेज़ भी फ्रांस के सार्सेल में पले-बढ़े, जहाँ उन्होंने अपने दिवंगत पिता के सपने को पूरा करने के लिए अल्जीरिया की जर्सी पहनने का संकल्प लिया था। दूसरी ओर, न्यूज़ीलैंड के सरप्रीत सिंह — जिनके माता-पिता पंजाब के जालंधर से आकर ऑकलैंड में किराने की दुकान चलाते थे — ईरान के खिलाफ 92 मिनट खेलकर विश्व कप मैच शुरू करने वाले पहले भारतीय मूल के फुटबॉलर बन गए। सरप्रीत पहले भारत में इंटरकांटिनेंटल कप भी खेल चुके हैं, जहाँ उन्होंने सुनील छेत्री की टीम के खिलाफ मैदान में कदम रखा था।
दक्षिण एशियाई संपर्क यहीं नहीं रुकता। इराक की राष्ट्रीय टीम में ज़िदान इकबाल ने पाकिस्तानी विरासत का झंडा बुलंद किया है। मैनचेस्टर यूनाइटेड की अकादमी से निकले इस 23 वर्षीय मिडफील्डर ने चैंपियंस लीग खेलने वाले पहले ब्रिटिश दक्षिण एशियाई बनने के बाद अब इराक के लिए विश्व कप में इतिहास रचा है। उन्होंने बीबीसी को बताया कि जब उन्हें एहसास हुआ कि वे पाकिस्तानी मूल के पहले पुरुष विश्व कप खिलाड़ी बनने जा रहे हैं, तो सबसे पहले अपने पिता को फोन किया।
इन कहानियों के बीच, पाकिस्तान का सियालकोट शहर चुपचाप हर मैच की धड़कन बन रहा है। ख्वाजा मसूद अख्तर ने 1991 में एक कमरे और 20 कर्मचारियों से फॉरवर्ड स्पोर्ट्स की शुरुआत की थी, और अब उनकी कंपनी लगातार चौथे विश्व कप — ब्राज़ील 2014 से लेकर 2026 तक — के लिए आधिकारिक मैच बॉल बना रही है। सालाना लगभग दो करोड़ फुटबॉल का उत्पादन करने वाली यह फैक्ट्री बताती है कि दक्षिण एशिया भले ही मैदान पर न हो, पर खेल के केंद्र में है।
यह विश्व कप महज राष्ट्रों का नहीं, बल्कि प्रवास, पहचान और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का संगम है। भारत और पाकिस्तान की टीमें भले ही क्वालीफाई न कर सकी हों, लेकिन उनकी मौजूदगी खिलाड़ियों के चेहरों, गेंद की सिलाई और उन सपनों में जीवित है जो सीमाओं से परे जाकर पनपते हैं। आने वाले वर्षों में यह प्रवासी लहर और गहरी होगी, और शायद एक दिन दक्षिण एशिया की कोई टीम भी इस मंच पर अपनी कहानी खुद लिखेगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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2026 विश्व कप प्रवासी पहचानों की कहानियों का मंच है: लुका जिदान, जिनेदिन के बेटे, ने अपने दादा-दादी की मातृभूमि अल्जीरिया के गोल की रक्षा करना चुना और मेसी की अर्जेंटीना का सामना करेंगे। रियाद महरेज़, फ्रांस में जन्मे अल्जीरियाई पिता और मोरक्को की मां के बेटे, विश्व चैंपियन के खिलाफ एक तरह के 'अंतिम नृत्य' में डेजर्ट फॉक्स का नेतृत्व करते हैं। यह संयोग पारिवारिक विरासत और व्यक्तिगत चुनावों का जाल बुनता है।
2026 विश्व कप प्रवासी सफलता का जश्न मनाता है: भारतीय मूल के सरप्रीत सिंह चमकने वाले नवीनतम दक्षिण एशियाई मूल के खिलाड़ी हैं, जबकि एक पाकिस्तानी उद्यमी हर मैच की गेंद बनाता है। जिदान इकबाल, पूर्व मैनचेस्टर यूनाइटेड, इराक का प्रतिनिधित्व करते हुए पुरुष विश्व कप में पाकिस्तानी विरासत के पहले खिलाड़ी बन गए। ये कहानियाँ एक छोटे से कमरे या यूरोपीय अकादमी से शुरू होकर वैश्विक मंच तक पहुँचती हैं।
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