
भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता: दशक भर की रुकावट के बाद नागरिक परमाणु सहयोग को मंजूरी
प्रधानमंत्री मोदी की मेलबर्न यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित प्रशासनिक व्यवस्था से भारत को ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ, साथ ही रक्षा और प्रौद्योगिकी में नई साझेदारियों की घोषणा हुई।
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने बृहस्पतिवार को मेलबर्न में एक प्रशासनिक व्यवस्था पर हस्ताक्षर कर 2015 के नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को क्रियान्वित कर दिया, जिससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को वाणिज्यिक यूरेनियम निर्यात का रास्ता साफ हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने संयुक्त रूप से इसकी घोषणा की। भारत सरकार के अनुसार, यह यूरेनियम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की सुरक्षा निगरानी में उपयोग किया जाएगा। यह समझौता 2014 में ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारत को यूरेनियम निर्यात की सैद्धांतिक सहमति के बाद लंबित था, जिसका प्रमुख कारण भारत का परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षरकर्ता न होना और ऑस्ट्रेलियाई पक्ष की यह आशंका थी कि सामग्री का सैन्य उपयोग हो सकता है।
भारतीय पक्ष ने इस कदम को अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों से जोड़ा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता स्थापित करने की योजना में ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की सीधी भूमिका होगी। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान में इसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और ऑस्ट्रेलियाई संसाधन क्षेत्र के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने वाला कदम बताया गया। वहीं, ऑस्ट्रेलियाई संरक्षण फाउंडेशन जैसे समूहों ने चिंता जताई कि भारत के NPT का हिस्सा न होने से घरेलू यूरेनियम भंडार के सैन्य कार्यक्रम में विवर्तन का जोखिम बना रहता है। भारत लगातार यह तर्क देता रहा है कि NPT भेदभावपूर्ण है क्योंकि वह केवल 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर चुके देशों को मान्यता देता है।
यूरेनियम समझौते के समानांतर, दोनों देशों ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया, जिसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियमित रणनीतिक परामर्श, सैन्य अभ्यासों की जटिलता बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा में सूचना साझेदारी को गहरा करने की प्रतिबद्धता शामिल है। संयुक्त वक्तव्य में समुद्री सहयोग रोडमैप, साइबर व महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर साझेदारी और भारत-ऑस्ट्रेलिया-कनाडा त्रिपक्षीय प्रौद्योगिकी नवाचार समझौते (ACITI) की भी घोषणा की गई। क्षेत्रीय विश्लेषकों के अनुसार, ये कदम हिंद-प्रशांत में बीजिंग की सैन्य मुद्रा को लेकर साझा चिंताओं की पृष्ठभूमि में उठाए गए हैं, हालांकि किसी भी नेता ने सार्वजनिक रूप से चीन का नाम नहीं लिया।
आर्थिक मोर्चे पर, ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी पेंशन निधि ऑस्ट्रेलियनसुपर ने भारत के राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष (NIIF) में 50 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के अतिरिक्त निवेश की घोषणा की, जिसे भारत सरकार ने वैश्विक भरोसे का प्रतीक बताया। दोनों पक्षों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) पर बातचीत तेज करने पर भी सहमति जताई। मेलबर्न के एक स्टेडियम में आयोजित सामुदायिक कार्यक्रम में लगभग 20,000 भारतीय प्रवासियों की उपस्थिति ने द्विपक्षीय संबंधों के जन-आधार को रेखांकित किया।
फिलहाल यूरेनियम आपूर्ति की मात्रा या समय-सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है। अगला कदम CECA वार्ता को गति देने और रक्षा अभ्यासों के विस्तार का है। प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया के बाद न्यूजीलैंड की यात्रा पर रवाना हुए, जहां व्यापार और रणनीतिक सहयोग के नए आयाम तय होने की संभावना है।
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भारत और ऑस्ट्रेलिया प्राकृतिक और विश्वसनीय भागीदार हैं, और यह यात्रा इसे साबित करती है। प्रवासी समुदाय जीवंत पुल है, और यूरेनियम सौदा पारस्परिक लाभ के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है।
यह ब्लॉक यात्रा को साझा आकांक्षाओं की परिणति के रूप में प्रस्तुत करता है, प्रवासी समुदाय के स्वागत को गहरे सांस्कृतिक संबंधों के प्रमाण और यूरेनियम सौदे को विश्वास के प्रतीक के रूप में उपयोग करता है, जिससे कोई भी आलोचना अप्रासंगिक लगती है।
यह ब्लॉक मानवाधिकार चिंताओं या हथियारों के लिए यूरेनियम के संभावित उपयोग का कोई उल्लेख नहीं करता, केवल सकारात्मक आर्थिक और रणनीतिक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करता है।
यूरेनियम सौदा व्यापार के लिए एक जीत है, लेकिन इसके साथ शर्तें जुड़ी हैं: मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रसार के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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भारत को स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता है, ऑस्ट्रेलिया के पास यूरेनियम है – यह सौदा विकास के लिए एक तार्किक कदम है।
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