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दक्षिण अफ्रीकी जैज़ के शिखर पुरुष अब्दुल्ला इब्राहिम का 91 वर्ष की आयु में निधन

रंगभेद विरोधी संघर्ष का प्रतीक बनी 'मैननबर्ग' जैसी रचनाओं के सृजनकर्ता ने जर्मनी में अंतिम सांस ली, उनका संगीत दक्षिण अफ्रीका की आत्मा में सदा गूंजता रहेगा।

दक्षिण अफ्रीका के महान जैज़ पियानोवादक और संगीतकार अब्दुल्ला इब्राहिम का सोमवार को जर्मनी में 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके परिवार ने एक बयान में कहा कि वे एक संक्षिप्त बीमारी के बाद शांतिपूर्वक अपने परिजनों के बीच चल बसे। राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं ने उस दक्षिण अफ्रीका को सम्मानित किया जिसने उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और संगीत प्रतिभा को आकार दिया। इसी वर्ष मार्च में इब्राहिम ने केप टाउन अंतरराष्ट्रीय जैज़ महोत्सव में अपना अंतिम दक्षिण अफ्रीकी प्रदर्शन किया था, मानो अपनी जन्मभूमि को अंतिम विदाई दे रहे हों।

9 अक्टूबर 1934 को केप टाउन में जन्मे अडॉल्फ जोहान्स ब्रांड ने डिस्ट्रिक्ट सिक्स जैसे बहुसांस्कृतिक इलाके में आंखें खोलीं, जिसे रंगभेदी शासन ने बाद में 'श्वेत क्षेत्र' घोषित कर 1982 में पूरे समुदाय को बलपूर्वक हटा दिया। सात वर्ष की आयु में पियानो पर धुनें बजाना शुरू करने वाले इस किशोर ने 1950 के दशक में डॉलर ब्रांड के नाम से बीबॉप जैज़ में पहचान बनाई। 1959 में उनके सेप्टेट जैज़ एपिस्टल्स ने दक्षिण अफ्रीका का पहला जैज़ एल्बम रिकॉर्ड किया जो पूर्णतः अश्वेत संगीतकारों द्वारा तैयार किया गया था। 1968 में इस्लाम धर्म अपनाने के बाद वे अब्दुल्ला इब्राहिम बन गए और उनकी गहरी आध्यात्मिकता उनके संगीत का अनिवार्य अंग बन गई।

रंगभेद की क्रूरताओं ने उन्हें दशकों तक यूरोप और अमेरिका में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर किया। 1963 में ज्यूरिख में ड्यूक एलिंगटन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया। इसी दौरान 1974 में रचित 'मैननबर्ग' रंगभेद विरोधी आंदोलन का अनौपचारिक गान बन गया—एक ऐसी धुन जिसने केप टाउन की एक मजदूर वर्गीय बस्ती के नाम को प्रतिरोध की सार्वभौमिक भाषा में बदल दिया। उनकी शैली सादगी और आत्मीयता से भरी थी; अफ्रीकी लय, अमेरिकी जैज़ और इस्लामी रहस्यवाद का ऐसा संगम जो श्रोता को ध्यान की मुद्रा में ले जाता था। फ्रांसीसी निर्देशक क्लेयर डेनिस की फिल्मों 'चॉकलेट' और 'नो फियर, नो डाई' के लिए उन्होंने साउंडट्रैक भी रचे।

सात दशकों के करियर में 70 से अधिक एल्बमों के सृजनकर्ता इब्राहिम ने जर्मनी में अपने अंतिम वर्ष बिताए, लेकिन उनका हृदय सदा दक्षिण अफ्रीका में धड़कता रहा। उनके प्रतिनिधि के अनुसार, "उनका अपने देश के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रहे हों।" रामाफोसा का शोक संदेश इस बात का प्रमाण है कि इब्राहिम का संगीत महज मनोरंजन नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की सामूहिक स्मृति और अस्मिता का दस्तावेज है। उनका जाना एक युग का अंत है, पर 'मैननबर्ग' की गूंज और उनकी विनम्र ध्वनि आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती रहेगी।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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दक्षिण अफ्रीकी जैज़ पियानोवादक अब्दुल्ला इब्राहिम का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने जर्मनी में एक छोटी बीमारी के बाद परिवार के बीच शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। वे 70 से अधिक एल्बमों की विरासत छोड़ गए हैं।

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trionfoindignazione

अब्दुल्ला इब्राहिम, मंडेला जैसी छरहरी काया वाले सुंदर दक्षिण अफ्रीकी पियानोवादक, 91 वर्ष की आयु में जर्मनी में चल बसे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के प्रतीक, उनके संगीत में निर्वासन की महक थी और वह स्वतंत्रता की आवाज़ बन गया। उन्होंने आखिरी बार मार्च में अपने गृहनगर केप टाउन अंतरराष्ट्रीय जैज़ महोत्सव में प्रस्तुति दी थी।

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दक्षिण अफ्रीकी जैज़ के शिखर पुरुष अब्दुल्ला इब्राहिम का 91 वर्ष की आयु में निधन

रंगभेद विरोधी संघर्ष का प्रतीक बनी 'मैननबर्ग' जैसी रचनाओं के सृजनकर्ता ने जर्मनी में अंतिम सांस ली, उनका संगीत दक्षिण अफ्रीका की आत्मा में सदा गूंजता रहेगा।

दक्षिण अफ्रीका के महान जैज़ पियानोवादक और संगीतकार अब्दुल्ला इब्राहिम का सोमवार को जर्मनी में 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके परिवार ने एक बयान में कहा कि वे एक संक्षिप्त बीमारी के बाद शांतिपूर्वक अपने परिजनों के बीच चल बसे। राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं ने उस दक्षिण अफ्रीका को सम्मानित किया जिसने उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और संगीत प्रतिभा को आकार दिया। इसी वर्ष मार्च में इब्राहिम ने केप टाउन अंतरराष्ट्रीय जैज़ महोत्सव में अपना अंतिम दक्षिण अफ्रीकी प्रदर्शन किया था, मानो अपनी जन्मभूमि को अंतिम विदाई दे रहे हों।

9 अक्टूबर 1934 को केप टाउन में जन्मे अडॉल्फ जोहान्स ब्रांड ने डिस्ट्रिक्ट सिक्स जैसे बहुसांस्कृतिक इलाके में आंखें खोलीं, जिसे रंगभेदी शासन ने बाद में 'श्वेत क्षेत्र' घोषित कर 1982 में पूरे समुदाय को बलपूर्वक हटा दिया। सात वर्ष की आयु में पियानो पर धुनें बजाना शुरू करने वाले इस किशोर ने 1950 के दशक में डॉलर ब्रांड के नाम से बीबॉप जैज़ में पहचान बनाई। 1959 में उनके सेप्टेट जैज़ एपिस्टल्स ने दक्षिण अफ्रीका का पहला जैज़ एल्बम रिकॉर्ड किया जो पूर्णतः अश्वेत संगीतकारों द्वारा तैयार किया गया था। 1968 में इस्लाम धर्म अपनाने के बाद वे अब्दुल्ला इब्राहिम बन गए और उनकी गहरी आध्यात्मिकता उनके संगीत का अनिवार्य अंग बन गई।

रंगभेद की क्रूरताओं ने उन्हें दशकों तक यूरोप और अमेरिका में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर किया। 1963 में ज्यूरिख में ड्यूक एलिंगटन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया। इसी दौरान 1974 में रचित 'मैननबर्ग' रंगभेद विरोधी आंदोलन का अनौपचारिक गान बन गया—एक ऐसी धुन जिसने केप टाउन की एक मजदूर वर्गीय बस्ती के नाम को प्रतिरोध की सार्वभौमिक भाषा में बदल दिया। उनकी शैली सादगी और आत्मीयता से भरी थी; अफ्रीकी लय, अमेरिकी जैज़ और इस्लामी रहस्यवाद का ऐसा संगम जो श्रोता को ध्यान की मुद्रा में ले जाता था। फ्रांसीसी निर्देशक क्लेयर डेनिस की फिल्मों 'चॉकलेट' और 'नो फियर, नो डाई' के लिए उन्होंने साउंडट्रैक भी रचे।

सात दशकों के करियर में 70 से अधिक एल्बमों के सृजनकर्ता इब्राहिम ने जर्मनी में अपने अंतिम वर्ष बिताए, लेकिन उनका हृदय सदा दक्षिण अफ्रीका में धड़कता रहा। उनके प्रतिनिधि के अनुसार, "उनका अपने देश के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रहे हों।" रामाफोसा का शोक संदेश इस बात का प्रमाण है कि इब्राहिम का संगीत महज मनोरंजन नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की सामूहिक स्मृति और अस्मिता का दस्तावेज है। उनका जाना एक युग का अंत है, पर 'मैननबर्ग' की गूंज और उनकी विनम्र ध्वनि आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती रहेगी।

स्रोतों में मतभेद

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स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

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अब्दुल्ला इब्राहिम, मंडेला जैसी छरहरी काया वाले सुंदर दक्षिण अफ्रीकी पियानोवादक, 91 वर्ष की आयु में जर्मनी में चल बसे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के प्रतीक, उनके संगीत में निर्वासन की महक थी और वह स्वतंत्रता की आवाज़ बन गया। उन्होंने आखिरी बार मार्च में अपने गृहनगर केप टाउन अंतरराष्ट्रीय जैज़ महोत्सव में प्रस्तुति दी थी।

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