
अमेरिकी मुद्रास्फीति और ईरान तनाव के बीच सोने में उतार-चढ़ाव, तेल की बढ़त ने बढ़ाई चिंता
अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में अपेक्षा से अधिक गिरावट के बाद सोना दो सप्ताह के निचले स्तर से उछला, लेकिन ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ते कच्चे तेल के दामों ने मुद्रास्फीति की आशंका को फिर हवा दे दी।
वैश्विक सोने के भाव में मंगलवार को जोरदार तेजी देखी गई, जब अमेरिका के जून महीने के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो बाजार के 0.2 प्रतिशत के अनुमान से कहीं अधिक थी। हाजिर सोना 4,100 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गया, जो दो सप्ताह के निचले स्तर से उबरने का संकेत था। इस आंकड़े ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और वृद्धि की संभावना को कम कर दिया, जिससे डॉलर और ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई और बिना ब्याज वाली सोने जैसी परिसंपत्तियों को समर्थन मिला।
हालांकि, बुधवार को यह तेजी टिक नहीं पाई। तेहरान और वाशिंगटन के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को लगातार तीसरे सत्र में ऊपर धकेल दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर रोक की धमकी के बाद ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। तेल की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति के लंबे समय तक ऊंचे रहने की चिंता पैदा कर दी, जिससे बाजार ने फेड द्वारा ब्याज दरों को लंबी अवधि तक सख्त रखने की संभावना को फिर से आंकना शुरू कर दिया। इसके चलते हाजिर सोना 0.5 प्रतिशत गिरकर 4,035 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गया।
तेहरान के बाजार में इस उथल-पुथल का सीधा असर देखने को मिला। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ईरानी रियाल में कमजोरी और भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम ने स्थानीय सोने और सिक्कों की कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। बुधवार को 18 कैरेट सोना 1.78 करोड़ रियाल (17.84 मिलियन तोमान) प्रति ग्राम और अमामी सिक्का 17.97 करोड़ रियाल पर पहुंच गया। डॉलर की कालाबाजारी दर 183,000 तोमान के पार चली गई, जबकि टीथर (USDT) जैसी स्थिर मुद्राएं 184,000 तोमान से ऊपर कारोबार कर रही थीं, जो पूंजी नियंत्रण के बीच विदेशी मुद्रा की भारी मांग को दर्शाता है।
भारतीय विश्लेषकों का मानना है कि निकट अवधि में सोना 3,950-4,200 डॉलर के दायरे में समेकित रह सकता है। आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स की वेदिका नार्वेकर के अनुसार, अमेरिकी उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) और खुदरा बिक्री के आंकड़े अगली दिशा तय करेंगे। वहीं, ओआंडा के विश्लेषक केल्विन वोंग ने कहा कि बाजार अब सीपीआई डेटा को पीछे छोड़ चुका है और ट्रंप की होर्मुज नाकेबंदी की धमकी से तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है, जो सोने के लिए प्रतिकूल है।
अब सबकी निगाहें गुरुवार को आने वाले अमेरिकी पीपीआई आंकड़ों और फेड अधिकारियों के बयानों पर टिकी हैं। साथ ही, ईरान-अमेरिका वार्ता या सैन्य कार्रवाई में कोई भी ठोस प्रगति तेल और सोने दोनों बाजारों की दिशा को तेजी से बदल सकती है।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.70 | aligned |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
Iran suffers from American aggression: the naval blockade and sanctions hit the people, while gold prices rise due to imposed devaluation.
It emphasizes the external threat (USA) as the sole cause of the crisis, omitting the role of domestic policies or global market factors.
It does not mention that the drop in gold in dollars is also due to US inflation data, nor does it compare with other markets.
The market rewards macroeconomic data: inflation falls, rates drop, gold rises. Geopolitical tensions are irrelevant.
It selects a favorable time window (Tuesday's rise) and omits the next day's drop, creating a partial narrative.
It makes no mention of the rise in oil or tensions in the Strait of Hormuz, which caused the subsequent decline.
The gold market is influenced by multiple factors: geopolitics, yields, oil. The investor must consider the full picture.
It presents an integrated view of multiple causes, balancing macro and geopolitical factors without taking sides.
It does not delve into the specific impact of Strait of Hormuz tensions on oil logistics, nor does it provide local data.
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