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स्वास्थ्य और विज्ञानबुधवार, 17 जून 2026

सेहत के भ्रम और छिपी सच्चाइयाँ: वजन घटाने से लेकर नींद और दिल की बीमारी तक

दुनियाभर के शोध और विशेषज्ञ बता रहे हैं कि स्वास्थ्य संबंधी आम धारणाएँ कितनी भ्रामक हो सकती हैं, चाहे वह वजन घटाने के उत्पाद हों, नींद की अवधि हो या महिलाओं में दिल के दौरे के लक्षण।

तेजी से वजन घटाने के वादे करने वाले उत्पादों के दुष्प्रभावों को लेकर इंडोनेशिया के चिकित्सकों ने गंभीर चेतावनी जारी की है। जकार्ता के आरएससीएम अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डिकी तहापारी के अनुसार, अत्यधिक तेजी से घटा वजन शरीर से केवल चर्बी नहीं, बल्कि पानी और मांसपेशियाँ भी छीन लेता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इसके विपरीत, एक नए वैश्विक अध्ययन ने संकेत दिया है कि मोटापे की दवाओं की क्रियाविधि स्तन कैंसर के जोखिम को समझने और घटाने में अप्रत्याशित सुराग दे सकती है। ईरानी विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि बिना कठोर डाइटिंग के, प्रोटीन, फाइबर, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन जैसी सरल आदतें स्थायी वजन नियंत्रण का वैज्ञानिक आधार हैं। इंडोनेशिया में ही किशोरों में शक्कर, नमक और वसा के अत्यधिक सेवन से बढ़ते मोटापे ने दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट को गहरा दिया है, जिससे स्पष्ट होता है कि त्वरित समाधान के बजाय जीवनशैली में बदलाव ही वास्तविक कुंजी है।

नींद को लेकर भी दुनियाभर में भ्रांतियाँ व्याप्त हैं। स्विट्जरलैंड में आसन्न उष्णकटिबंधीय रातों के मद्देनजर एक बहस छिड़ी है: क्या पाँच-छह घंटे सोने वाले वाकई डिमेंशिया और अकाल मृत्यु का जोखिम उठा रहे हैं, या यह एक अतिसरलीकरण है? ज्यूरिख की नींद शोधकर्ता क्रिस्टीना ब्लूमे का कहना है कि अच्छी नींद सीखी जा सकती है, लेकिन हर किसी के लिए सात-नौ घंटे का फॉर्मूला लागू नहीं होता। बांग्लादेश में फुटबॉल विश्व कप के कारण रात-रात भर जागने से नींद का कर्ज चुकाने के लिए चिकित्सकों ने आयु-आधारित सिफारिशें दी हैं: किशोरों को 8-10 घंटे, 6-12 साल के बच्चों को 9-12 घंटे और प्रौढ़ों को 7-9 घंटे की नींद जरूरी है। इंडोनेशियाई और अर्जेंटीनी पोषण विशेषज्ञ रात के भोजन में ट्रिप्टोफैन, मैग्नीशियम और विटामिन बी6 से भरपूर खाद्य पदार्थों, जैसे लेट्यूस रोल, चिकन और दही, को शामिल करने की सलाह देते हैं ताकि मेलाटोनिन उत्पादन बढ़े और नींद गहरी हो।

पोषण के क्षेत्र में ‘स्वस्थ’ का लेबल अक्सर धोखा देता है। इंडोनेशिया के सुपरमार्केट गलियारों में बिकने वाले नाश्ते के सीरियल्स पर ‘होल ग्रेन’ और ‘विटामिन से भरपूर’ के दावे होते हैं, लेकिन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरियन नेस्ले के अनुसार इनमें चीनी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड सामग्री की भरमार होती है। इसी तरह, इंस्टेंट नूडल्स को डिमेंशिया और हृदय रोग से जोड़ने वाले अध्ययनों के बावजूद वैश्विक बाजार 2032 तक 98 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, क्योंकि इसकी लत लगाने वाली प्रकृति उपभोक्ताओं को बाँधे रखती है। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों में कीट-आधारित भोजन को लेकर घृणा के बावजूद, एक अध्ययन से पता चला कि जो लोग इसे चखते हैं, उन्हें इसका स्वाद अपेक्षा से कहीं बेहतर लगता है—मनोवैज्ञानिक बाधा ही सबसे बड़ी चुनौती है। भारतीय संदर्भ में भी, अंडे के विकल्प के रूप में ग्रीक योगर्ट, दलिया, टोफू और चिया पुडिंग जैसे उच्च प्रोटीन नाश्ते लोकप्रिय हो रहे हैं, जबकि विटामिन डी के सेवन का समय मायने नहीं रखता, नियमितता जरूरी है।

महिलाओं के स्वास्थ्य और तंत्रिका-विकास संबंधी विकारों में भी जागरूकता का अभाव घातक सिद्ध हो रहा है। रूसी हृदय रोग विशेषज्ञ लेतिसिया फर्नांडीस फ्रिएरा इस मिथक को खारिज करती हैं कि महिलाओं में दिल का दौरा बिना दर्द के होता है—सीने में दर्द ही पहला लक्षण है, लेकिन पेट दर्द, जबड़े की तकलीफ, अचानक बेहोशी और अत्यधिक थकान जैसे संकेत अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। घाना और इंडोनेशिया की रिपोर्टें भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि महिलाएँ अपने लक्षणों को गैस्ट्राइटिस या सामान्य कमजोरी समझकर टाल देती हैं। इसी तरह, एडीएचडी से ग्रस्त बच्चों की अतिसक्रियता और ध्यान की कमी को केवल ‘शरारत’ मानकर अनुशासित करने की कोशिश की जाती है, जबकि दरअसल उनका मस्तिष्क अलग ढंग से काम कर रहा होता है और उन्हें चिकित्सीय सहायता की जरूरत होती है।

यह वैश्विक परिदृश्य स्पष्ट करता है कि एक-माप-सबके-लिए स्वास्थ्य सलाह विफल हो रही है। जकार्ता से ढाका और तेहरान से ब्यूनस आयर्स तक, लोगों को भ्रामक विज्ञापनों, सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों और अधूरी जानकारी के जाल से निकलकर साक्ष्य-आधारित, व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। भविष्य में, बेहतर निदान उपकरण, पोषण पारदर्शिता और नींद के प्रति लचीली समझ ही जनस्वास्थ्य को नई दिशा दे सकती है।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
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दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस में, अनिद्रा, थकान और ध्यान की कमी जैसे सामान्य लक्षणों को व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि एडीएचडी, हृदय रोग या पुरानी नींद विकारों जैसी गंभीर स्थितियों की चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेख उम्र के अनुसार आदर्श नींद अवधि, लक्षणों को अनदेखा करने के जोखिम और मस्तिष्क की कार्यक्षमता सुधारने के लिए डायरी लेखन जैसे सरल उपाय बताते हैं। सुर सूचनात्मक और सावधान करने वाला है, जो आत्म-दोष के बजाय चिकित्सीय जांच को प्रोत्साहित करता है।

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scetticismopragmatismo

लैटिन अमेरिकी कवरेज में, एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक इस पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हैं कि स्वस्थ नींद का मतलब आठ घंटे लगातार सोना है, और तर्क देते हैं कि यह मानक प्राकृतिक नहीं है तथा अधिकांश अनिद्रा के मामलों की जड़ें मनोवैज्ञानिक होती हैं। यह ढाँचा आराम की आदतों पर पुनर्विचार करने और नींद से जुड़ी चिंता को कम करने के लिए प्रोत्साहित करता है, बजाय इसके कि सामान्य भिन्नताओं को बीमारी मान लिया जाए। यह सामाजिक नींद मानदंडों पर एक संशयपूर्ण और चिंतनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

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बुधवार, 17 जून 2026

सेहत के भ्रम और छिपी सच्चाइयाँ: वजन घटाने से लेकर नींद और दिल की बीमारी तक

दुनियाभर के शोध और विशेषज्ञ बता रहे हैं कि स्वास्थ्य संबंधी आम धारणाएँ कितनी भ्रामक हो सकती हैं, चाहे वह वजन घटाने के उत्पाद हों, नींद की अवधि हो या महिलाओं में दिल के दौरे के लक्षण।

तेजी से वजन घटाने के वादे करने वाले उत्पादों के दुष्प्रभावों को लेकर इंडोनेशिया के चिकित्सकों ने गंभीर चेतावनी जारी की है। जकार्ता के आरएससीएम अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डिकी तहापारी के अनुसार, अत्यधिक तेजी से घटा वजन शरीर से केवल चर्बी नहीं, बल्कि पानी और मांसपेशियाँ भी छीन लेता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इसके विपरीत, एक नए वैश्विक अध्ययन ने संकेत दिया है कि मोटापे की दवाओं की क्रियाविधि स्तन कैंसर के जोखिम को समझने और घटाने में अप्रत्याशित सुराग दे सकती है। ईरानी विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि बिना कठोर डाइटिंग के, प्रोटीन, फाइबर, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन जैसी सरल आदतें स्थायी वजन नियंत्रण का वैज्ञानिक आधार हैं। इंडोनेशिया में ही किशोरों में शक्कर, नमक और वसा के अत्यधिक सेवन से बढ़ते मोटापे ने दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट को गहरा दिया है, जिससे स्पष्ट होता है कि त्वरित समाधान के बजाय जीवनशैली में बदलाव ही वास्तविक कुंजी है।

नींद को लेकर भी दुनियाभर में भ्रांतियाँ व्याप्त हैं। स्विट्जरलैंड में आसन्न उष्णकटिबंधीय रातों के मद्देनजर एक बहस छिड़ी है: क्या पाँच-छह घंटे सोने वाले वाकई डिमेंशिया और अकाल मृत्यु का जोखिम उठा रहे हैं, या यह एक अतिसरलीकरण है? ज्यूरिख की नींद शोधकर्ता क्रिस्टीना ब्लूमे का कहना है कि अच्छी नींद सीखी जा सकती है, लेकिन हर किसी के लिए सात-नौ घंटे का फॉर्मूला लागू नहीं होता। बांग्लादेश में फुटबॉल विश्व कप के कारण रात-रात भर जागने से नींद का कर्ज चुकाने के लिए चिकित्सकों ने आयु-आधारित सिफारिशें दी हैं: किशोरों को 8-10 घंटे, 6-12 साल के बच्चों को 9-12 घंटे और प्रौढ़ों को 7-9 घंटे की नींद जरूरी है। इंडोनेशियाई और अर्जेंटीनी पोषण विशेषज्ञ रात के भोजन में ट्रिप्टोफैन, मैग्नीशियम और विटामिन बी6 से भरपूर खाद्य पदार्थों, जैसे लेट्यूस रोल, चिकन और दही, को शामिल करने की सलाह देते हैं ताकि मेलाटोनिन उत्पादन बढ़े और नींद गहरी हो।

पोषण के क्षेत्र में ‘स्वस्थ’ का लेबल अक्सर धोखा देता है। इंडोनेशिया के सुपरमार्केट गलियारों में बिकने वाले नाश्ते के सीरियल्स पर ‘होल ग्रेन’ और ‘विटामिन से भरपूर’ के दावे होते हैं, लेकिन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरियन नेस्ले के अनुसार इनमें चीनी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड सामग्री की भरमार होती है। इसी तरह, इंस्टेंट नूडल्स को डिमेंशिया और हृदय रोग से जोड़ने वाले अध्ययनों के बावजूद वैश्विक बाजार 2032 तक 98 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, क्योंकि इसकी लत लगाने वाली प्रकृति उपभोक्ताओं को बाँधे रखती है। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों में कीट-आधारित भोजन को लेकर घृणा के बावजूद, एक अध्ययन से पता चला कि जो लोग इसे चखते हैं, उन्हें इसका स्वाद अपेक्षा से कहीं बेहतर लगता है—मनोवैज्ञानिक बाधा ही सबसे बड़ी चुनौती है। भारतीय संदर्भ में भी, अंडे के विकल्प के रूप में ग्रीक योगर्ट, दलिया, टोफू और चिया पुडिंग जैसे उच्च प्रोटीन नाश्ते लोकप्रिय हो रहे हैं, जबकि विटामिन डी के सेवन का समय मायने नहीं रखता, नियमितता जरूरी है।

महिलाओं के स्वास्थ्य और तंत्रिका-विकास संबंधी विकारों में भी जागरूकता का अभाव घातक सिद्ध हो रहा है। रूसी हृदय रोग विशेषज्ञ लेतिसिया फर्नांडीस फ्रिएरा इस मिथक को खारिज करती हैं कि महिलाओं में दिल का दौरा बिना दर्द के होता है—सीने में दर्द ही पहला लक्षण है, लेकिन पेट दर्द, जबड़े की तकलीफ, अचानक बेहोशी और अत्यधिक थकान जैसे संकेत अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। घाना और इंडोनेशिया की रिपोर्टें भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि महिलाएँ अपने लक्षणों को गैस्ट्राइटिस या सामान्य कमजोरी समझकर टाल देती हैं। इसी तरह, एडीएचडी से ग्रस्त बच्चों की अतिसक्रियता और ध्यान की कमी को केवल ‘शरारत’ मानकर अनुशासित करने की कोशिश की जाती है, जबकि दरअसल उनका मस्तिष्क अलग ढंग से काम कर रहा होता है और उन्हें चिकित्सीय सहायता की जरूरत होती है।

यह वैश्विक परिदृश्य स्पष्ट करता है कि एक-माप-सबके-लिए स्वास्थ्य सलाह विफल हो रही है। जकार्ता से ढाका और तेहरान से ब्यूनस आयर्स तक, लोगों को भ्रामक विज्ञापनों, सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों और अधूरी जानकारी के जाल से निकलकर साक्ष्य-आधारित, व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। भविष्य में, बेहतर निदान उपकरण, पोषण पारदर्शिता और नींद के प्रति लचीली समझ ही जनस्वास्थ्य को नई दिशा दे सकती है।

स्रोतों में मतभेद

स्वास्थ्य और विज्ञान · 10 स्रोत · 7 भाषाएँ

28%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

न्यूनत्र83%
निंदक17%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa sud-est asiaticaStampa latinoamericana
Stampa sud-est asiatica
allarmepragmatismo

दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस में, अनिद्रा, थकान और ध्यान की कमी जैसे सामान्य लक्षणों को व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि एडीएचडी, हृदय रोग या पुरानी नींद विकारों जैसी गंभीर स्थितियों की चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेख उम्र के अनुसार आदर्श नींद अवधि, लक्षणों को अनदेखा करने के जोखिम और मस्तिष्क की कार्यक्षमता सुधारने के लिए डायरी लेखन जैसे सरल उपाय बताते हैं। सुर सूचनात्मक और सावधान करने वाला है, जो आत्म-दोष के बजाय चिकित्सीय जांच को प्रोत्साहित करता है।

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लैटिन अमेरिकी कवरेज में, एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक इस पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हैं कि स्वस्थ नींद का मतलब आठ घंटे लगातार सोना है, और तर्क देते हैं कि यह मानक प्राकृतिक नहीं है तथा अधिकांश अनिद्रा के मामलों की जड़ें मनोवैज्ञानिक होती हैं। यह ढाँचा आराम की आदतों पर पुनर्विचार करने और नींद से जुड़ी चिंता को कम करने के लिए प्रोत्साहित करता है, बजाय इसके कि सामान्य भिन्नताओं को बीमारी मान लिया जाए। यह सामाजिक नींद मानदंडों पर एक संशयपूर्ण और चिंतनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

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