
तेल भंडार खत्म होने के दबाव में ट्रंप का ईरान समझौते का संकेत, बाजारों में तेजी
अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान से कच्चे तेल की कीमतें गिरीं और एशियाई शेयर सूचकांक उछले, जबकि वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी, जब उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान आने वाले दिनों में युद्धविराम के लिए एक ‘बहुत मजबूत समझौता ज्ञापन’ पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। इस खबर के साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने की रिपोर्टों ने कच्चे तेल की कीमतों को नीचे धकेल दिया। ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 83 से 86 डॉलर के दायरे में सिमट गया। एशियाई शेयर बाजारों ने तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी: जापान का निक्केई 225 सूचकांक 2.81 प्रतिशत चढ़ा, दक्षिण कोरिया का कॉस्पी 7 प्रतिशत उछला और हांगकांग का हैंगसेंग 0.65 प्रतिशत मजबूत हुआ।
इस आशावाद के पीछे एक गहराता ऊर्जा संकट भी है। दुनिया भर की सरकारों और कंपनियों ने अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध से पैदा हुई आपूर्ति की कमी को पूरा करने के लिए अपने विशाल तेल भंडारों का इस्तेमाल किया, लेकिन अब ये भंडार तेजी से खाली हो रहे हैं। अमेरिका का सरकारी रणनीतिक तेल भंडार इसी सप्ताह 1983 के बाद के सबसे निचले स्तर को छूने की कगार पर था। दुनिया भर में स्टील के टैंकों और भूमिगत नमक गुफाओं में जमा ईंधन का स्टॉक घटने से वाशिंगटन पर यह दबाव बढ़ गया है कि वह जल्द से जल्द ईरान के साथ कोई ऐसा समझौता करे, जिससे खाड़ी क्षेत्र से तेल का प्रवाह फिर से शुरू हो सके।
होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति में किसी भी रुकावट का असर सीधे दक्षिण एशिया पर पड़ता है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपना अधिकांश कच्चा तेल खाड़ी क्षेत्र से मंगाता है, कीमतों में गिरावट और समुद्री मार्ग की सुरक्षा दोहरी राहत लेकर आती है। सस्ते तेल से न केवल चालू खाते का घाटा कम होता है, बल्कि घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव भी घटता है, जिससे मुद्रास्फीति को काबू में रखने में मदद मिलती है।
हालांकि, ट्रंप ने जिस समझौते का संकेत दिया, उसकी रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि वास्तव में कोई समझौता होता है, तो तेल की कीमतों में और गिरावट आ सकती है और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का दबाव कम होगा। लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर बुनियादी मतभेद अब भी बरकरार हैं। बाजार फिलहाल उम्मीदों पर सवार हैं, लेकिन कोई भी ठोस समझौता न होने पर तेल की कीमतों में फिर से उछाल आ सकता है, जिसका सीधा असर भारत समेत तमाम तेल आयातक अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका-ईरान समझौते की संभावना से वैश्विक बाजारों में तेजी आई, शेयर सूचकांक उछले और कच्चे तेल की कीमत 88 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गई। व्हाइट हाउस द्वारा एक मजबूत समझौता ज्ञापन और होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने की चर्चा ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया।
तेजी से घटते वैश्विक तेल भंडार वाशिंगटन पर तेहरान के साथ समझौता करने का दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि ईरान का कच्चा तेल एक रणनीतिक लीवर के रूप में काम करता है। अमेरिकी रणनीतिक भंडार 1983 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के साथ, फारस की खाड़ी से ऊर्जा प्रवाह बहाल करने की तात्कालिकता बढ़ गई है।
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