
लेबनान-इज़राइल रूपरेखा समझौते पर हिज़्बुल्लाह का कड़ा विरोध, सेना ने आंतरिक स्थिरता की चेतावनी दी
अमेरिकी मध्यस्थता में हुए समझौते को हिज़्बुल्लाह ने 'अस्तित्वहीन' बताया, जबकि लेबनानी सेना ने किसी भी सुरक्षा व्यवधान को रोकने की प्रतिबद्धता जताई।
लेबनान और इज़राइल ने शुक्रवार को वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की उपस्थिति में एक त्रिपक्षीय रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य दशकों पुराने संघर्ष को समाप्त करना और स्थायी शांति की दिशा में कदम बढ़ाना है। समझौते के तहत, गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण और उनके बुनियादी ढांचे को खत्म करने के बाद लेबनानी सेना पूरे देश में प्रभावी संप्रभुता स्थापित करेगी, जिससे इज़राइली रक्षा बलों की चरणबद्ध वापसी संभव होगी। हालांकि, हस्ताक्षर के तुरंत बाद हिज़्बुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने इसे 'भयावह चूक' और 'संप्रभुता का आत्मसमर्पण' करार देते हुए अस्वीकार कर दिया, और इसे 'अस्तित्वहीन व अमान्य' बताया।
विभिन्न पक्षों की स्थिति स्पष्ट रूप से विभाजित है। लेबनानी सरकार के अनुसार, यह समझौता राज्य की पूर्ण संप्रभुता बहाल करने और सभी क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने का पहला कदम है। इज़राइली रक्षा मंत्री यिसराइल कात्ज़ और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि जब तक हिज़्बुल्लाह पूरी तरह निरस्त्र नहीं हो जाता, इज़राइल दक्षिणी लेबनान में अपना सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखेगा; उन्होंने इसे 'ईरानी धुरी के लिए रणनीतिक आघात' बताया। हिज़्बुल्लाह ने इसके विपरीत, ईरान-अमेरिका समझौता ज्ञापन (एमओयू) को ही एकमात्र वैध आधार माना, जिसमें कथित तौर पर 60 दिनों के भीतर पूर्ण इज़राइली वापसी का प्रावधान है। ईरानी मीडिया ने भी समझौते को 'समझौतापरस्त' बताते हुए हिज़्बुल्लाह के रुख का समर्थन किया, जबकि फ्रांस ने इसका स्वागत करते हुए पूर्ण लेबनानी संप्रभुता और इज़राइली सेना की वापसी की आवश्यकता पर बल दिया।
समझौते के प्रावधानों ने आंतरिक लेबनानी राजनीति में गहरी दरारें उजागर की हैं। 'राष्ट्रीय धारा' जैसे दलों ने इज़राइली वापसी के लिए स्पष्ट समय-सीमा के अभाव और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों से बचने की शर्त पर आपत्ति जताई, जिसे वे कानूनी अधिकारों का त्याग मानते हैं। हिज़्बुल्लाह से जुड़े वकीलों के समूह ने इसे संवैधानिक शक्तियों के विरुद्ध विद्रोह करार दिया। इस बीच, लेबनानी सेना ने एक बयान में नागरिकों से जिम्मेदारी दिखाने की अपील की और चेतावनी दी कि वह किसी भी सुरक्षा व्यवधान, सड़क अवरोध या सार्वजनिक-निजी संपत्ति पर हमले की अनुमति नहीं देगी, जो संभावित अशांति की आशंका को दर्शाता है।
यह घटनाक्रम मार्च 2026 में शुरू हुए युद्ध के बाद सामने आया है, जिसमें भारी जनहानि और विस्थापन हुआ। क्षेत्रीय संदर्भ में, ईरान-अमेरिका वार्ता के बीच हिज़्बुल्लाह लेबनानी मोर्चे को ईरानी परमाणु मुद्दे से जोड़े रखना चाहता है, जबकि अमेरिका और इज़राइल दोनों मार्गों को अलग-अलग देखते हैं। समझौते के तहत, दो 'पायलट क्षेत्रों' में लेबनानी सेना की तैनाती से शुरुआत होगी, और एक त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह कार्यान्वयन की निगरानी करेगा। अमेरिका ने पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का वादा किया है, लेकिन यह सहायता सशस्त्र समूहों को धन हस्तांतरण रोकने की शर्त से जुड़ी है। अगले चरण में विस्तृत सुरक्षा अनुबंध पर बातचीत और व्यापक शांति समझौते की दिशा में कार्य समूहों का गठन अपेक्षित है, हालांकि हिज़्बुल्लाह के विरोध के कारण कार्यान्वयन की राह अनिश्चित बनी हुई है।
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | +0.30 | aligned |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | 0.00 | neutral |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
France welcomes the agreement as a basis for full Lebanese sovereignty and state monopoly on arms, while President Aoun thanks Trump for mediation. The Arab Parliament rejects Israeli attacks, reaffirming support for Lebanon.
The bloc uses official statements from international and regional actors to present the agreement as a legitimate and necessary step, without giving voice to Hezbollah's criticisms, which are omitted.
Hezbollah's rejection of the agreement, as per the original headline, and Israeli insistence on disarmament are not mentioned.
Iran does not acknowledge the US-mediated agreement, focusing instead on its own security threatened by American attacks and nuclear issues.
The total omission of the agreement allows not legitimizing a process that excludes Iran and could strengthen the position of Israel and the US in the region.
The agreement itself, as well as reactions from Hezbollah or the Lebanese government, are not reported, avoiding giving space to an event that could be seen as a success of American mediation.
Attention shifts to Israeli arms sales to Arab countries and corruption in Iraq, ignoring the Lebanon-Israel agreement.
By covering news that show Israel as a security provider and regional partner, the bloc avoids discussing an agreement that might imply Israeli concessions or criticism.
The framework agreement and its implications for Hezbollah disarmament and Israeli withdrawal are completely absent.
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