
रात में जागने वालों की सेहत पर नया अध्ययन: मेटाबॉलिज्म और खानपान की आदतों पर असर
न्यूजीलैंड के एक अध्ययन में पाया गया कि देर रात तक जागने वाली महिलाओं में मोटापे और खराब मेटाबॉलिक स्वास्थ्य का खतरा अधिक होता है, भले ही वे समान कैलोरी लें।
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में स्वस्थ महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन ने रात के समय जागने की आदत और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) के बीच एक ठोस संबंध सामने रखा है। ‘फ्रंटियर्स इन न्यूट्रिशन’ में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, जो महिलाएं स्वाभाविक रूप से देर रात तक जागती हैं और सुबह देर से उठती हैं, उनका बॉडी मास इंडेक्स और शरीर में वसा प्रतिशत, जल्दी सोने-जागने वाली महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया। खास बात यह रही कि सभी समूहों ने लगभग बराबर कैलोरी और पोषक तत्व लिए, फिर भी रात में जागने वाली महिलाओं के मेटाबॉलिक बायोमार्कर और पोषण स्तर अपेक्षाकृत खराब रहे।
इस अंतर के पीछे भोजन का समय एक बड़ा कारक हो सकता है। अध्ययन में देखा गया कि देर रात जागने वाली महिलाएं सुबह बहुत कम खाती थीं और दिन का अधिकांश कैलोरी शाम और रात के समय लेती थीं। कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) की पोषण विशेषज्ञ मैरी-पियरे सेंट-ऑंज के अनुसार, भोजन का समय शरीर की आंतरिक घड़ी के लिए एक संकेत का काम करता है और इसका सीधा असर मेटाबॉलिज्म पर पड़ता है। वे बताती हैं कि भूमध्यसागरीय आहार के करीब का खानपान—फल, सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे और कम वसा वाला मांस—अनिद्रा की आशंका को कम करता है और नींद को गहरा बनाता है, जबकि अधिक मिठाइयां, संतृप्त वसा और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट बार-बार नींद टूटने से जुड़े हैं।
मनोवैज्ञानिक पक्ष भी इस पूरी तस्वीर को पुख्ता करता है। अर्जेंटीना और अन्य देशों के विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि दिन में अत्यधिक नींद आना हमेशा तनाव का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे खराब ‘स्लीप हाइजीन’ हो सकती है—अनियमित सोने-जागने का समय, सोने से ठीक पहले स्क्रीन का इस्तेमाल या शोर-रोशनी वाला कमरा। वहीं, दूसरी ओर, कनाडा और अमेरिका के शोधकर्ताओं के हवाले से बताया गया है कि अनिश्चितता भरे माहौल में रोज़ एक जैसा नाश्ता करने जैसी छोटी दिनचर्याएं मानसिक ऊर्जा बचाने और चिंता घटाने का एक अनुकूली उपाय हो सकती हैं। यह आदत कोई कठोरता नहीं, बल्कि भावनात्मक स्थिरता का एक छोटा-सा सहारा है।
व्यावहारिक स्तर पर, विशेषज्ञ सोने से कम-से-कम तीन घंटे पहले भोजन करने, नियमित समय पर नाश्ता और रात का खाना लेने, तथा सोने से पहले कैमोमाइल चाय, केला या बादाम जैसे हल्के विकल्प चुनने की सलाह देते हैं। ये खाद्य पदार्थ मेलाटोनिन, मैग्नीशियम या ट्रिप्टोफैन जैसे तत्वों के जरिए शरीर को विश्राम का संकेत दे सकते हैं। यदि पर्याप्त नींद के बावजूद दिन में अत्यधिक थकान बनी रहती है, तो इसे सामान्य मान लेने के बजाय चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराने की सिफारिश की गई है, ताकि किसी अंतर्निहित संक्रमण या चयापचय विकार का समय पर पता लगाया जा सके।
यह अध्ययन अवलोकनात्मक है और केवल महिलाओं पर केंद्रित है, इसलिए इसके निष्कर्षों को सभी पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी, यह इस दिशा में एक स्पष्ट संकेत है कि नींद का समय और खानपान की लय, कैलोरी की मात्रा से कहीं अधिक मायने रख सकते हैं। आगे का कदम इस बात पर शोध होगा कि क्या व्यक्ति की जैविक घड़ी के अनुसार आहार संबंधी हस्तक्षेप मोटापे और मेटाबॉलिक जोखिमों को कम कर सकते हैं।
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
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| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.20 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
पोषण विशेषज्ञ नींद में सुधार के लिए सोने से पहले विशिष्ट खाद्य पदार्थों की सलाह देते हैं, एक तत्काल और सुलभ समाधान प्रदान करते हैं।
ज्ञात लाभों वाले खाद्य पदार्थों को सूचीबद्ध करके, यह नींद पर तत्काल नियंत्रण की भावना पैदा करता है, रात की गड़बड़ी के गहरे कारणों से बचता है।
यह उल्लेख नहीं करता कि मूल अध्ययन रात में जागने वालों के चयापचय जोखिमों पर केंद्रित है, न कि सोने से पहले भोजन के लाभों पर।
पोषण विशेषज्ञ मैरी-पियरे सेंट-ओन्ज बताती हैं कि भूमध्य आहार नींद में सुधार करता है, स्थापित शोध पर आधारित।
एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ का हवाला देकर, यह दावे को अधिकार देता है कि दिन का आहार अच्छी नींद की कुंजी है, रात में जागने वालों से ध्यान हटाता है।
यह उल्लेख नहीं करता कि मूल अध्ययन विशेष रूप से रात में जागने वालों और उनके चयापचय जोखिमों से संबंधित है, सामान्य आहार से नहीं।
शोधकर्ता एक नए अध्ययन के आधार पर चेतावनी देते हैं कि रात में जागने वालों की जीवनशैली में विशिष्ट चयापचय जोखिम होते हैं।
'चयापचय संबंधी नुकसान' शब्द को दोहराकर और रात में जागने वालों की तुलना जल्दी उठने वालों से करके, यह रात में जागने को एक अपरिहार्य जोखिम से जोड़ता है और आदत को हतोत्साहित करता है।
यह उल्लेख नहीं करता कि अध्ययन में पद्धतिगत सीमाएँ हो सकती हैं या रात में जागने वालों के संज्ञानात्मक लाभ भी हैं।
मनोवैज्ञानिक इस बात पर जोर देते हैं कि दिन की नींद हमेशा तनाव नहीं बल्कि खराब नींद की स्वच्छता है, और दोहराए जाने वाले दिनचर्या अनुकूली हैं।
'नींद की स्वच्छता' की अवधारणा को सामान्यीकृत करके और दोहराए जाने वाली आदतों को सामान्य करके, यह रात में जागने वालों के चयापचय जोखिमों से ध्यान हटाकर नियंत्रणीय व्यक्तिगत विकल्पों पर केंद्रित करता है।
यह नींद की स्वच्छता की सलाह को रात में जागने वालों पर विशिष्ट अध्ययन से नहीं जोड़ता, न ही शोध द्वारा उजागर किए गए चयापचय जोखिमों का उल्लेख करता है।
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