
कक्षा में मोबाइल रखने की पेटी और मिस्र की 'चाइल्ड चिप': बदलते डिजिटल बचपन की कहानी
ब्राज़ील, इंडोनेशिया, मिस्र और अर्जेंटीना में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और शिक्षा को लेकर उठाए जा रहे कदम एक वैश्विक सांस्कृतिक बदलाव की ओर इशारा करते हैं।
ब्राज़ील के एक पब्लिक स्कूल की कक्षा में पुर्तगाली भाषा की शिक्षिका जेनेसी रिबेरो पाडिल्हा ने एक लकड़ी की पेटी मेज़ पर रखी। यह पेटी मोबाइल फोन जमा करने के लिए थी। कानून लागू हुए एक साल बीत चुका है, लेकिन अब भी कई छात्र फोन छोड़ने से कतराते हैं। 'यह एक अहम पहला कदम है,' पाडिल्हा कहती हैं। पूरे देश में 95 प्रतिशत शिक्षकों का मानना है कि फोन पर प्रतिबंध से छात्रों की एकाग्रता बढ़ी है, और 97 प्रतिशत निदेशकों ने कक्षा में भागीदारी में सुधार देखा।
यह बदलाव सिर्फ स्कूलों तक सीमित नहीं है। ब्राज़ील में पहली बार 10 साल से ऊपर की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी इंटरनेट का उपयोग करती है, लेकिन 10-13 साल के बच्चों में फोन रखने की दर 2024 के 56.7% से घटकर 2025 में 55.2% हो गई। इसी आयु वर्ग में इंटरनेट इस्तेमाल भी 84.9% से गिरकर 84.4% पर आ गया। अभिभावक अब गोपनीयता और सुरक्षा को सबसे बड़ी चिंता मानते हैं। यह आंकड़े एक नई सांस्कृतिक सोच की ओर इशारा करते हैं, जहां तकनीक की उपलब्धता के बावजूद परिवार बच्चों को डिजिटल दुनिया से कुछ दूरी देना चाहते हैं।
दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इसी तरह के प्रयोग चल रहे हैं। मिस्र सरकार ने 'इतमान' और 'इतमान अला अल-आखर' नामक सेवाएं शुरू की हैं, जिन्हें आम भाषा में 'चाइल्ड चिप' कहा जा रहा है। यह चिप बच्चों के फोन में लगाई जाती है और हानिकारक सामग्री को रोकने के साथ-साथ सोशल मीडिया तक पहुंच को भी सीमित कर सकती है। वहीं इंडोनेशिया में सरकार दूरदराज के इलाकों में डिजिटल शिक्षा का विस्तार कर रही है। 2025 में 2,88,865 स्कूलों को इंटरैक्टिव डिजिटल बोर्ड और लैपटॉप दिए गए, और 2026 में 16,557 स्कूलों को इंटरनेट कनेक्शन देने का लक्ष्य है। साथ ही, 'स्कूल राक्यत' जैसे आवासीय विद्यालय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और लैपटॉप दे रहे हैं।
अर्जेंटीना में चिंता का एक अलग आयाम सामने आया है। वहां के बाल अधिकार संरक्षण विभाग और बाल रोग सोसायटी ने एक अभियान शुरू किया है, जिसमें बच्चों और किशोरों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का सहारा लेने से रोकने की कोशिश की जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि 9 से 17 साल के आधे से अधिक बच्चे AI का इस्तेमाल करते हैं, और पहले फोन की औसत उम्र 9 साल है। अभियान का केंद्रीय संदेश है: 'AI जवाब देती है, लेकिन साथ नहीं देती।' विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्लेटफॉर्म सहानुभूति का आभास तो कराते हैं, लेकिन असली इंसानी संवाद की जगह नहीं ले सकते।
ये सब पहल एक ही वैश्विक कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं। ब्राज़ील की कक्षा में रखी वह लकड़ी की पेटी, मिस्र की चाइल्ड चिप, इंडोनेशिया के दूरदराज के स्कूल में चमकता डिजिटल बोर्ड, और अर्जेंटीना की सड़कों पर लगा पोस्टर—ये सब एक ऐसी दुनिया की तस्वीर पेश करते हैं जो कनेक्टिविटी के फायदों और बचपन की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। इस कोशिश में कोई एक जीत या हार नहीं है, बल्कि एक सामूहिक सीख है कि तकनीक को इंसानी रिश्तों और संवेदनाओं के आगे झुकना पड़ रहा है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ
The Chinese press frames the global rethinking of digital childhood as a vindication of its own strict internet regulations, presenting the 'box at the classroom door' as a prudent measure that protects children from harmful content and addiction. It highlights China's early adoption of such policies as a model for the world, without acknowledging the societal costs of extensive control.
European press, especially Nordic outlets, frame the digital childhood debate as a pragmatic balancing act between safety and children's rights. They emphasize evidence-based policies and caution against overregulation, highlighting the need for digital literacy alongside restrictions. The 'phone box' approach is seen as a tool, not a panacea.
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