
शून्य-चीनी आहार का चूहों पर उल्टा असर, मेटाबॉलिज्म बिगड़ा; आहार विज्ञान की पुरानी धारणाओं पर सवाल
एक नए पशु अध्ययन में बिना चीनी वाला आहार चयापचय को नुकसान पहुंचाता पाया गया, जबकि स्वीडन, ब्रिटेन और अमेरिका के शोध अब कैलोरी गिनने की जगह भोजन के समय, आंत के सूक्ष्मजीवों और फाइबर की भूमिका पर जोर दे रहे हैं।
चीनी को पूरी तरह त्यागने की सलाह को एक नए पशु अध्ययन ने चुनौती दी है। चूहों पर किए गए इस प्रयोग में, जहां हर समूह में केवल छह चूहे थे, शून्य-चीनी आहार लेने वाले चूहों का वजन तो नहीं बढ़ा, लेकिन उनका ग्लूकोज सहन करने की क्षमता खत्म हो गई और आंत की अवरोधक परत टूटने लगी। आंत में मौजूद लाभकारी जीवाणु, जो साधारण शर्करा पर निर्भर रहते हैं, भूखे मर गए और उनकी जगह हानिकारक जीवाणुओं ने ले ली, जिससे ‘लीकी गट’ की स्थिति बनी। यह निष्कर्ष इस व्यापक धारणा को कमजोर करता है कि हर हाल में चीनी घटाना ही स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम है।
इसके समानांतर, स्वीडन के ओरेब्रो विश्वविद्यालय के शोधकर्ता आहारीय फाइबर की तीन-स्तरीय भूमिका को रेखांकित कर रहे हैं: फाइबर आंत में तरल सोखकर पाचन को सुचारू बनाते हैं, उनके टूटने से बनने वाले वसा अम्ल कैंसररोधी होते हैं और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकते हैं, तथा कुछ विशेष फाइबर अणु आंत की प्रतिरक्षा प्रणाली को सीधे सक्रिय कर देते हैं। स्वीडन में औसत फाइबर सेवन 25 ग्राम प्रतिदिन है, जबकि सिफारिश 30-35 ग्राम की है। ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन के पोषण वैज्ञानिक इस बात पर बल दे रहे हैं कि भोजन का समय और खाने की गति भी कैलोरी उपयोग को प्रभावित करती है—देर रात का नाश्ता खराब कोलेस्ट्रॉल और मोटापे के जोखिम से जुड़ा है, जबकि धीरे-धीरे खाने से भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन जीएलपी-1 का स्राव बढ़ता है।
बच्चों के खान-पान पर केंद्रित ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स की शोधकर्ता मैरियन हेदरिंगटन का कहना है कि पूर्वस्कूली उम्र में सब्जियों से बार-बार परिचय कराना सबसे कारगर होता है, और पांच वर्ष की आयु तक यह अवसर लगभग समाप्त हो जाता है। वहीं अमेरिका की यूसी बर्कले की एक टीम ने नींद के दौरान वृद्धि हार्मोन के स्राव को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका सर्किट की पहचान की है, जो बताता है कि नींद की कमी से न केवल वृद्धि रुकती है बल्कि मोटापे और मधुमेह का खतरा भी बढ़ता है। इंडोनेशिया के मीडिया में प्रकाशित एक दस-वर्षीय अध्ययन के अनुसार, अनियमित सोने-जागने का समय हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा देता है, क्योंकि इससे शरीर की जैविक घड़ी बिगड़ती है।
ये सभी निष्कर्ष एक समान संदेश देते हैं: केवल कैलोरी गिनना या किसी एक पोषक तत्व को पूरी तरह हटा देना पर्याप्त नहीं है। ओरेब्रो विश्वविद्यालय के नेतृत्व में चल रही एक बड़ी यूरोपीय संघ परियोजना अब इसी दिशा में अगला कदम उठा रही है—शोधकर्ता सांस की जांच के जरिए व्यक्ति की आंत के जीवाणु संरचना का पता लगाकर वैयक्तिक फाइबर सिफारिशें विकसित कर रहे हैं, ताकि बिना पेट फूले स्वास्थ्य लाभ मिल सके। यह तकनीक अभी विकासाधीन है और इसके नैदानिक परीक्षण आगामी मील का पत्थर होंगे।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.20 | neutral |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
The study's authors and cautious observers warn that zero-sugar diets may backfire, but they also stress the need for more research before drawing human conclusions.
By highlighting the study's limitations (small sample, animal model) while still reporting the surprising result, the narrative balances alarm with skepticism, making the warning seem credible yet not definitive.
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