
हिजरी 1448: नाइजीरिया से यमन तक देशभक्ति, प्रतिरोध और आत्मचिंतन के सुर
इस्लामी नववर्ष पर वैश्विक नेताओं ने हिजरत की भावना को राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समावेशिता और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष से जोड़ा।
इस्लामी कैलेंडर के 1448वें वर्ष के आगमन पर दुनिया भर के मुस्लिम समुदायों और उनके नेताओं ने हिजरत की ऐतिहासिक घटना को समकालीन चुनौतियों से जोड़ते हुए विविध संदेश दिए। नाइजीरिया से लेकर यमन और इंडोनेशिया तक, एक ही चांद के नीचे मनाए जा रहे इस अवसर पर जहां कुछ नेताओं ने नागरिक कर्तव्य और राष्ट्रप्रेम पर जोर दिया, वहीं अन्य ने वैश्विक शक्तियों के खिलाफ प्रतिरोध और सामूहिक जिहाद का आह्वान किया।
पश्चिम अफ्रीका के नाइजीरिया में राष्ट्रपति बोला टीनुबू ने मुस्लिम उम्माह को हिजरी नववर्ष की बधाई देते हुए पैगंबर मुहम्मद के मक्का से मदीना प्रवास से सीखने का आग्रह किया। उन्होंने त्याग, नवीनीकरण और ईश्वरीय योजना में आस्था जैसे गुणों को शांतिपूर्ण व समृद्ध राष्ट्र निर्माण का आधार बताया। यह संदेश एक ऐसे देश में देशभक्ति और सुशासन की आवश्यकता को रेखांकित करता है जो अक्सर सांप्रदायिक तनावों से जूझता रहा है।
इसके विपरीत, यमन के हूती नेता अब्दुल मलिक अल-हूती ने हिजरी नववर्ष को एक सैन्य-राजनीतिक रंग देते हुए ईरान को अमेरिका और इजरायल के खिलाफ उसकी 'महान विजय' पर बधाई दी। उन्होंने यमन की पूर्ण तैयारी की घोषणा करते हुए किसी भी अमेरिकी या इजरायली आक्रमण का मुकाबला करने की चेतावनी दी और पूरे इस्लामी जगत से 'जिहाद और प्रतिरोध की धुरी' में शामिल होने का आह्वान किया। यह बयान गाजा युद्ध के बाद उपजे क्षेत्रीय तनावों के बीच एक स्पष्ट वैचारिक लामबंदी का प्रयास है।
दक्षिण-पूर्व एशिया के इंडोनेशिया में सरकार और धार्मिक संस्थाओं ने हिजरत को आत्मपरीक्षण और सामाजिक रूपांतरण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उपधर्ममंत्री रोमो मुहम्मद स्यफी ने 'मुहासबाह' यानी ईमानदार आत्ममूल्यांकन पर बल दिया, जबकि धर्ममंत्री नसरुद्दीन उमर ने हिजरत को कबीलाई मानसिकता से निकलकर समावेशी, सभ्य और वैश्विक समाज की ओर बढ़ने का माध्यम बताया। इंडोनेशियाई उलमा परिषद ने युवाओं को सोशल मीडिया के दौर में पैगंबर को आदर्श मानने की सीख दी, ताकि लोकप्रियता के भ्रम से बचा जा सके।
ये विविध संदेश बताते हैं कि हिजरत की अवधारणा कितनी लचीली है—एक ओर यह व्यक्तिगत नैतिक सुधार और राष्ट्र-निर्माण का मंत्र बनती है, तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक प्रतिरोध का हथियार। भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए, जहां मुस्लिम आबादी बहुलतावादी समाज में रहती है, इंडोनेशियाई मॉडल अधिक प्रासंगिक है—आत्मचिंतन, संवाद और सामाजिक समरसता पर जोर। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यमन का प्रतिरोध-केंद्रित आख्यान क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहराता है, या इंडोनेशिया और नाइजीरिया के सुधारवादी स्वर मुस्लिम जगत में शांति व समावेश की नई लहर को जन्म देते हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इस्लामी नया साल पैगंबर के प्रवास पर चिंतन का समय है, जो व्यक्तिगत और सामाजिक बदलाव पर जोर देता है। यह दान और सहिष्णुता के कार्यों के माध्यम से आस्था, नैतिक अखंडता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का आह्वान करता है।
नया हिजरी वर्ष आशावाद और विश्वास के साथ स्वागत किया जाता है, हिजरा से सबक लेकर बुद्धिमान नेतृत्व में एक सुरक्षित और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण किया जाता है। यह शांति, स्थिरता और प्रगति के प्रति प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का क्षण है।
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