
जम्मू-कश्मीर में राज्य की मांग और पाक अधिकृत क्षेत्र में जनाक्रोश: दिल्ली से मुज़फ़्फ़राबाद तक सियासी हलचल
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन से पहले नागरिक समाज का प्रस्ताव पारित किया, वहीं पाक अधिकृत कश्मीर में 29 दिनों से जारी प्रदर्शनों ने आर्थिक घेराबंदी और अधिकारों की मांग को लेकर इस्लामाबाद को अल्टीमेटम दे दिया है।
जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले श्रीनगर में नागरिक समाज के 150 से अधिक प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से बिना किसी और देरी के पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का आह्वान किया गया। नेकां अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मौजूदगी में पारित इस प्रस्ताव को जम्मू-कश्मीर के नागरिक समाज की सामूहिक आवाज़ बताया गया। पार्टी प्रवक्ता के अनुसार, यह प्रदर्शन संसद के मानसून सत्र के पहले दिन होगा और इसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के दिसंबर 2023 के उस आदेश पर अमल की मांग करना है, जिसमें केंद्र को 'यथाशीघ्र' राज्य का दर्जा बहाल करने को कहा गया था।
दूसरी ओर, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में पाकिस्तानी प्रशासन के खिलाफ जनाक्रोश 29वें दिन भी जारी रहा। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में हजारों प्रदर्शनकारी, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, रावलाकोट के ईदगाह मैदान और मुज़फ़्फ़राबाद की सड़कों पर डटे हैं। आयोजकों ने पाकिस्तान सरकार को 8 जुलाई तक अपनी 38 सूत्री मांगों को मानने का अल्टीमेटम दिया है, जिसमें राशन और बिजली पर सब्सिडी, सड़क-अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास और विधानसभा की 12 आरक्षित शरणार्थी सीटों को समाप्त करना शामिल है। अवामी एक्शन कमेटी के सरदार इम्तियाज असलम ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई की निंदा करते हुए 9 जुलाई को मुज़फ़्फ़राबाद की ओर बड़े जनमार्च की घोषणा की है, जिसे आंदोलन का 'सब कुछ या कुछ नहीं' वाला चरण बताया जा रहा है।
इस बीच, पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत में हिंसा की एक अलग घटना में ज़ियारत ज़िले में मांगी बांध निर्माण स्थल की सुरक्षा में तैनात पुलिस चौकी पर हमले में कम से कम नौ पुलिसकर्मी मारे गए और कई लापता हैं। स्थानीय अधिकारियों ने इस हमले के लिए प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को जिम्मेदार ठहराया है, हालांकि अभी तक किसी समूह ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है। बलूचिस्तान सरकार के प्रवक्ता के अनुसार, सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में 15 संदिग्ध आतंकवादियों को मार गिराया और इलाके में सर्च ऑपरेशन जारी है। यह हमला उस क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता को दर्शाता है, जहां स्थानीय उग्रवादी समूह दशकों से पाकिस्तानी राज्य से अधिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं।
ये घटनाक्रम दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय अधिकारों और राजनीतिक पुनर्गठन की मांगों के व्यापक संदर्भ में सामने आए हैं। जम्मू-कश्मीर में 2019 में अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा समाप्त कर राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से क्षेत्रीय दल लगातार राज्य की बहाली की मांग कर रहे हैं। नेकां नेताओं ने केंद्र की 'उचित समय' वाली भाषा को अस्पष्ट बताते हुए देरी को अनुचित करार दिया है। वहीं, पीओजेके में विरोध आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक अधिकारों की मांग से उपजा है, जिसे प्रशासन द्वारा इंटरनेट सेवाएं बंद करने और खाद्य आपूर्ति रोकने जैसे कदमों ने और भड़का दिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 14 जून से सीमा पर दर्जनों ट्रकों में फंसी आटा, चावल और दूध जैसी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई है, जिससे आर्थिक घेराबंदी जैसे हालात पैदा हो गए हैं।
फिलहाल, नेकां 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शन की तैयारी कर रही है, जबकि पीओजेके में 9 जुलाई को प्रस्तावित जनमार्च आंदोलन की दिशा तय करेगा। बलूचिस्तान में सुरक्षा अभियान जारी है और पाकिस्तानी गृह मंत्री ने हमले की निंदा करते हुए मारे गए पुलिसकर्मियों को राष्ट्र का गौरव बताया है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि क्षेत्र में राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति संवेदनशील बनी हुई है, और आने वाले दिनों में विभिन्न पक्षों की ओर से ठोस कदम उठाए जाने की संभावना है।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.30 | critical |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
Indian Kashmir demands statehood restoration and denounces Pakistani repression in PoJK.
The unanimous civil society resolution legitimizes the statehood demands, and the PoJK protests are portrayed as a popular rebellion against Pakistani rule.
It omits the Balochistan attack that killed nine police officers, focusing solely on Kashmir protests.
Pakistani authorities and Gulf media condemn the terrorist attack and praise the security operation.
The term 'terrorist' delegitimizes the attackers and justifies the military response.
It makes no mention of the Kashmir protests in Indian and Pakistani Kashmir, focusing only on the Balochistan attack.
The Pakistani government and security forces report the attack and search operations.
Official sources provide the facts without assigning political blame, maintaining a detached tone.
It does not report the Kashmir protests or statehood demands, limiting itself to the Balochistan attack.
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