
एक बच्चे की पेंसिल बॉक्स पर चमकता सुपरहीरो और कुरआन की भूली-बिसरी मिसालें
जब एक बच्चा स्टेशनरी की दुकान पर कार्टून नायक को चुनता है, तो यह दृश्य इस्लामी परंपरा में निहित चरित्र-निर्माण, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा की उस गहरी समझ को याद दिलाता है जो आज भी प्रासंगिक है।
तेहरान की एक स्टेशनरी की दुकान में एक छोटा बच्चा बार-बार उसी पेंसिल बॉक्स की ओर हाथ बढ़ा रहा था जिस पर एक चमकीले कवच वाला कार्टून सुपरहीरो बना था। धार्मिक विद्वान हुज्जत-अल-इस्लाम सज्जाद रजबी ने जब यह दृश्य देखा, तो उन्होंने इस ओर इशारा किया कि बच्चों ने इन काल्पनिक किरदारों को अपना आदर्श इसलिए बना लिया है क्योंकि इन्हें बेहद आकर्षक ढंग से चित्रित किया गया है। उनके अनुसार, यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है कि हम अपने आस-पास के आदर्शों से प्रभावित होते हैं, और ठीक इसीलिए कुरआन ने अनेक वास्तविक चरित्रों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है।
इन्हीं कुरआनी मिसालों में से एक है हज़रत मूसा की माँ की कहानी, जिसे सूरह क़सस में विस्तार से बयान किया गया है। जब उन्हें अपने नवजात शिशु को नील नदी में छोड़ देने का कठिन आदेश मिला, तो इस मिशन से पहले ही ईश्वर ने उनके दिल को सुकून से भर दिया—‘ना डरो और ना शोक करो’। रजबी बताते हैं कि यह ईश्वरीय व्यवहार दिखाता है कि किसी भी बड़ी ज़िम्मेदारी से पहले बंदे के दिल को सांत्वना देना कितना ज़रूरी है। यह कहानी सिर्फ़ एक ऐतिहासिक वाक़या नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के उस पहलू की ओर इशारा है जिसे आज ‘आत्म-चिंतन’ या ‘मुहासबा’ कहा जाता है—एक ऐसी प्रक्रिया जो इंसान को अपनी भावनाओं को समझने और कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखने में मदद करती है।
इंडोनेशिया और बांग्लादेश के इस्लामी विमर्श में यही अवधारणा एक व्यापक सामाजिक ढाँचे के रूप में उभरती है। ढाका से प्रकाशित एक विश्लेषण में कुरआन की उस समग्र शिक्षा को रेखांकित किया गया है जो ‘हुकूकुल्लाह’ (ईश्वर के अधिकार) और ‘हुकूक-उल-इबाद’ (बंदों के अधिकार) को एक-दूसरे से अलग नहीं करती। इसका सबसे पुराना प्रमाण हब्शा (वर्तमान इथियोपिया) के शासक नज्जाशी के दरबार में सहाबी जाफ़र बिन अबू तालिब का वह ऐतिहासिक भाषण है, जिसमें उन्होंने इस्लाम के प्रारंभिक संदेश को यूँ बयान किया: ‘हमें सच बोलने, अमानत निभाने, रिश्तेदारी जोड़ने, पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करने और कमज़ोरों का शोषण न करने का हुक्म दिया गया है।’ यह भाषण बताता है कि आस्था का पहला परिचय ही सामाजिक न्याय और सेवा की भावना से ओत-प्रोत था।
इसी परंपरा में शारीरिक स्वास्थ्य और पवित्रता को भी ईमान का हिस्सा बताया गया है। पैग़ंबर मुहम्मद की जीवनशैली से जुड़े अनेक प्रसंग इस बात की गवाही देते हैं—वे तेज़ क़दमों से चलते थे, कुश्ती लगाते थे, और अपनी पत्नी आयशा के साथ दौड़ प्रतियोगिता भी करते थे। अबू हुरैरा का कथन है कि ‘मैंने नबी से अधिक तेज़ गति से किसी को चलते नहीं देखा।’ यह सक्रियता एक ऐसे जीवन-दर्शन का हिस्सा थी जो पौष्टिक भोजन, साफ़-सफ़ाई और बीमारी में तुरंत इलाज को प्रोत्साहित करता था। नाइजीरिया के एक लेख में हिजरत (प्रवास) की उस घटना का भी ज़िक्र है जब एक व्यक्ति ने केवल एक महिला से विवाह करने के लिए मक्का से मदीना का सफ़र किया, जिसके बाद यह सिद्धांत सामने आया कि हर कर्म का मूल्यांकन उसकी नीयत पर निर्भर करता है।
इन सब विवरणों के बीच, एक स्थायी छवि बार-बार उभरती है—वह है माँ के दिल का सुकून। कुरआन में हज़रत मूसा की माँ के बारे में आया है कि ‘उनका दिल ख़ाली हो गया था’, यानी हर डर और बेचैनी से मुक्त। यह शून्यता कोई रिक्तता नहीं, बल्कि एक ऐसी परिपूर्ण शांति थी जिसने उन्हें सबसे बड़ी क़ुर्बानी की ताक़त दी। आज जब एक बच्चा किसी सुपरहीरो की तस्वीर पर मोहित होता है, तो शायद वह भी अनजाने में उसी आंतरिक शक्ति और नैतिक स्पष्टता की तलाश कर रहा है, जिसकी असल मिसालें सदियों से हमारी साझा विरासत में मौजूद हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The Iranian press frames the story of intention in Islamic ethics as a philosophical inquiry that balances intellectual rigor with respect for religious authority. It connects self-knowledge to broader ethical frameworks, emphasizing critical thinking within Islamic tradition.
The Southeast Asian press presents Islamic ethics as a protective and guiding system, where intention is central to understanding the wisdom behind rules. It highlights the epistemological foundations of Shafi'i jurisprudence, portraying Islamic law as a path to self-knowledge and societal benefit.
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