
कैंसर जांच की नई उम्र सीमाएं और वैश्विक पहल: क्या भारत सीख सकता है?
ओंटारियो ने कोलन कैंसर स्क्रीनिंग की उम्र घटाकर 45 कर दी, जबकि ईरान पुरुषों की अनिच्छा से जूझ रहा है और इटली-जर्मनी बेहतर परिणाम दिखा रहे हैं।
दुनिया भर में कैंसर की रोकथाम और शुरुआती पहचान को लेकर एक नई सोच उभर रही है, जिसमें जांच की उम्र सीमा को कम करना और जागरूकता बढ़ाना केंद्र में है। कनाडा के ओंटारियो प्रांत ने एक जुलाई से कोलोरेक्टल कैंसर स्क्रीनिंग की पात्रता उम्र 50 से घटाकर 45 वर्ष कर दी है। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि स्टीव स्लैक जैसे मरीज़, जिन्हें 48 की उम्र में लाइलाज कोलन कैंसर का पता चला, बताते हैं कि लक्षण 45 की उम्र से ही दिखने लगे थे, लेकिन डॉक्टरों ने शुरू में इसे नज़रअंदाज़ कर दिया। ओंटारियो का यह फ़ैसला वैश्विक रुझान को दर्शाता है जहाँ कम उम्र में कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल में बदलाव किया जा रहा है।
पुरुषों की सेहत के मोर्चे पर ईरान की तस्वीर चिंताजनक है। वहाँ 25 से 31 ख़ुर्दाद (जून) तक राष्ट्रीय पुरुष स्वास्थ्य सप्ताह मनाया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर ईरानी पुरुष नियमित जांच को नज़रअंदाज़ करते हैं और तब डॉक्टर के पास पहुँचते हैं जब बीमारी बढ़ चुकी होती है। प्रोस्टेट कैंसर और मूत्राशय कैंसर पुरुषों में सबसे आम हैं और अगर जल्दी पकड़ में आ जाएँ तो क़ाबू में रहते हैं। पारिवारिक इतिहास वालों को पहले ही जांच शुरू करने की सलाह दी जाती है। ब्राज़ील के यूरोलॉजिस्ट रोड्रिगो लौरेइरो बताते हैं कि 50 के बाद प्रोस्टेट का सामान्य बढ़ना (बीपीएच) कैंसर न होकर भी पेशाब की कमज़ोर धार, बार-बार वॉशरूम जाने और रात में नींद टूटने जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है, जो आदमी की आज़ादी और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। यह संकेत है कि पुरुषों को लक्षणों के दैनिक जीवन में हस्तक्षेप करने से पहले ही सचेत हो जाना चाहिए।
यूरोप से उम्मीद जगाने वाले आँकड़े आ रहे हैं। इटली में कैंसर से बचने की पाँच साल की दर यूरोपीय औसत से बेहतर है: स्तन कैंसर में 89.5% बनाम 83%, कोलोरेक्टल में 67% बनाम 59.8% और फेफड़ों के कैंसर में 15.9% बनाम 15%। यह सफलता दशकों की रोकथाम, शुरुआती निदान और एआईआरसी फ़ाउंडेशन जैसे शोध संस्थानों के निवेश का नतीजा है। जर्मनी में तो लक्ष्य और भी महत्वाकांक्षी है। बर्लिन में हुए 'विज़न ज़ीरो' समिट में कैंसर विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं ने टाली जा सकने वाली कैंसर मौतों को शून्य तक लाने का संकल्प लिया। ऑन्कोलॉजिस्ट प्रो. क्रिस्टोफ़ फ़ॉन काल्ले ने कहा कि चिकित्सा एक क्रांतिकारी बदलाव के मुहाने पर है। जर्मनी में पिछले 20 सालों में हर साल दसियों हज़ार अधिक लोग कैंसर से बच रहे हैं, और सिर्फ़ आंत के कैंसर में ही सालाना 7,000 जीवन-वर्ष बचाए जा सकते हैं।
महिलाओं की सेहत पर भी ध्यान केंद्रित हो रहा है। घाना की एक रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में हर साल लगभग 11,500 महिलाएँ सर्वाइकल कैंसर से ग्रसित होती हैं, और यह ख़तरनाक इसलिए है क्योंकि प्री-कैंसरस कोशिकाएँ बिना लक्षण के पनपती हैं। नियमित पैप टेस्ट और एचपीवी जाँच से असामान्यताएँ जल्दी पकड़ी जा सकती हैं। अर्जेंटीना के विशेषज्ञ 40 से ऊपर की महिलाओं में आंतों की पारगम्यता (लीकी गट) की समस्या पर रोशनी डाल रहे हैं, जो पोषक तत्वों को रोकते हुए हानिकारक पदार्थों को रक्त में जाने देती है और कई बीमारियों से जुड़ सकती है। हालाँकि यह सीधे कैंसर नहीं है, लेकिन यह समग्र स्वास्थ्य जागरूकता की ज़रूरत को रेखांकित करता है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए ये वैश्विक पहल एक खाका पेश करती हैं। यहाँ पुरुषों में जाँच के प्रति सांस्कृतिक उदासीनता ईरान जैसी ही है, और सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग की पहुँच सीमित है। ओंटारियो की घटी उम्र सीमा, इटली का शोध-आधारित मॉडल और जर्मनी का 'विज़न ज़ीरो' जैसा साहसिक लक्ष्य बताते हैं कि नीतिगत इच्छाशक्ति और जन-जागरूकता अभियानों से कैंसर का बोझ कम किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में व्यक्तिगत जोखिम आकलन और सुलभ स्क्रीनिंग तकनीकों पर ज़ोर बढ़ेगा, बशर्ते सरकारें और समाज इस दिशा में निवेश करें।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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एक स्वीडिश अध्ययन के अनुसार, एआई अब ट्यूमर प्रकट होने से छह साल पहले तक स्तन कैंसर के संकेतों का पता लगा सकता है। यह सफलता मानव आंखों से अदृश्य विवरणों को पकड़कर प्रारंभिक निदान में क्रांति लाने का वादा करती है। यह कैंसर के खिलाफ लड़ाई में एक निर्णायक कदम है।
ओंटारियो पेट के कैंसर की जांच के लिए अनुशंसित आयु 50 से घटाकर 45 कर रहा है, ताकि मामलों को पहले पकड़ा जा सके। एक उत्तरजीवी अधिक निवेश का आग्रह करता है ताकि सिस्टम बढ़ी हुई मांग को संभाल सके। यह कदम पहले पता लगाने की ओर एक व्यावहारिक बदलाव को दर्शाता है।
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