
स्टेडियम में झाड़ू, घर में आराम: जापानी प्रशंसकों की सफाई पर उठे सवाल
विश्व कप मैचों के बाद स्टेडियम की सफाई करने वाले जापानी समर्थकों की वैश्विक प्रशंसा के बीच, एक व्यंग्यपूर्ण पोस्ट ने घरेलू कामों में पुरुषों की न्यूनतम भागीदारी को उजागर कर नई बहस छेड़ दी।
डलास स्टेडियम की नीली सीटों के बीच, जापान की राष्ट्रीय टीम के रंग पहने कुछ युवक झुक-झुककर प्लास्टिक के गिलास और खाने के पैकेट उठा रहे थे। नीदरलैंड के खिलाफ मैच खत्म हो चुका था, भीड़ जा चुकी थी, लेकिन ‘सामुराई ब्लू’ के ये समर्थक अपने हाथों में कचरे के थैले लिए हर कोने को खंगाल रहे थे। यह दृश्य कोई नया नहीं था—कतर और रूस के पिछले विश्व कपों से ही जापानी प्रशंसकों की यह आदत दुनिया भर में सुर्खियां बटोरती रही है। फीफा ने भी इस बार उनके ‘त्रुटिहीन शिष्टाचार’ की सराहना की।
लेकिन इस बार तस्वीरों के साथ एक और छवि वायरल हुई: एक व्यंग्यात्मक चित्रण, जिसमें वही स्टेडियम-सफाई करता मुस्कुराता प्रशंसक घर पर सोफे पर पसरा हुआ है, पास ही कपड़ों का ढेर पड़ा है, और उसकी पत्नी या मां बर्तन मांज रही है। बीच में बड़े अक्षरों में लिखा था—‘प्लीज डू इट एट होम’। यह पोस्ट, जो टोक्यो मेट्रो के शिष्टाचार-संकेतों की याद दिलाती है, प्लेटफॉर्म एक्स पर 1.9 मिलियन बार देखी गई और हजारों बार साझा की गई।
यह तंज महज एक चुटकुला नहीं था। इसके पीछे एक गहरी सांस्कृतिक विडंबना है: जापान में सार्वजनिक स्थलों की स्वच्छता को लेकर एक सामूहिक अनुशासन है, जिसे अक्सर परोपकार और नागरिक कर्तव्य का प्रमाण माना जाता है। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर अवैतनिक काम का बंटवारा बिल्कुल अलग कहानी कहता है। ओईसीडी के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, जापानी महिलाएं घरेलू काम, खरीदारी और देखभाल जैसे अवैतनिक कार्यों पर पुरुषों की तुलना में 5.5 गुना अधिक समय बिताती हैं—महिलाएं रोजाना औसतन तीन घंटे से अधिक, जबकि पुरुष मात्र 47 मिनट। यह अंतर ब्रिटेन (1.8 गुना), फ्रांस (1.7 गुना) और अमेरिका (1.6 गुना) से कहीं अधिक चौड़ा है। छह साल से कम उम्र के बच्चों वाले दोहरी-आय वाले परिवारों में तो महिलाएं सात घंटे से अधिक घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरुष दो घंटे से भी कम।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं बंटी हुई थीं। कुछ ने इसे प्रासंगिक सामाजिक आलोचना बताया—एक यूजर ने लिखा, ‘जिन पत्नियों के पति घर में बिल्कुल सफाई नहीं करते, उन्हें चाहिए कि वे घर पर भी उन्हें सामुराई जापान की जर्सी पहना दें।’ वहीं दूसरों ने इसे अति-सामान्यीकरण करार दिया। कुछ ने यह भी याद दिलाया कि बड़े आयोजनों के बाद जापान के अपने सार्वजनिक स्थल भी अक्सर कचरे से पट जाते हैं। लेकिन कई लोगों ने इस परंपरा का बचाव करते हुए कहा कि इसकी आलोचना करने के बजाय इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए—एक टिप्पणी थी, ‘इसमें शर्मिंदा होने की क्या बात है? यह इससे कहीं बेहतर है कि खबरें कहें कि जापानी विदेश में कचरा फैला रहे हैं।’
दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा अब दूसरे देशों के प्रशंसकों को भी प्रभावित कर रही है। हाल ही में एक वीडियो में पुर्तगाली समर्थक भी बड़े-बड़े प्लास्टिक थैलों के साथ स्टेडियम की सीटों से कचरा उठाते दिखे, और कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इस प्रवृत्ति की शुरुआत का श्रेय जापानियों को दिया। इस तरह, स्टेडियम की सीढ़ियों पर झुका एक नीली जर्सी वाला युवक एक साथ दो सच्चाइयों का प्रतीक बन गया है—एक वैश्विक प्रशंसा की वस्तु, और दूसरी घर के भीतर अदृश्य श्रम की याद दिलाने वाला दर्पण।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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जापानी फुटबॉल प्रशंसकों की मैचों के बाद स्टेडियम साफ करने की आदत की लंबे समय से प्रशंसा होती रही है, लेकिन इस बार एक वायरल पोस्ट ने इस तारीफ को घरेलू आलोचना में बदल दिया। महिलाएं पुरुषों से कह रही हैं कि वही सफाई घर पर भी लाएं, जहां घर का काम अब भी काफी हद तक पत्नियों पर पड़ता है।
महाद्वीपीय यूरोप में यह कहानी जापानी प्रशंसकों के पाखंड को उजागर करती है जो स्टेडियम साफ करते हैं लेकिन घर के काम की अनदेखी करते हैं। इतालवी कवरेज इसे महिलाओं की इच्छा के रूप में पेश करती है कि पुरुष घर पर भी सफाई करें, जो गहरे बैठे लैंगिक असंतुलन की ओर इशारा करता है।
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